हां, हां, पायो पायो...

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- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फ़िल्मः प्रेम रतन धन पायो
निर्देशकः सूरज बड़जात्या
अभिनेताः सलमान ख़ान, सोनम कपूर
रेटिंग: *
दुनिया भर में हर दूसरे हफ़्ते ऐसी बहुत सी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में बनाई जाती हैं जिनके फ़िल्मकार मानते हैं कि 'आलोचकों' का कोई मतलब नहीं है.
बदले में आलोचक मानते हैं कि फ़िल्म ही बेमतलब है. इस फ़िल्म पर चर्चा भी कुछ अलग नहीं रहने वाली.
लेकिन इसके कुछ हिस्से ऐसे हैं जो शायद इसलिए हैं कि दर्शकों से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता.
बहरहाल, पहली बात तो यह है कि यह कोई ऐतिहासिक फ़िल्म नहीं है.

सलमान ख़ान जिस नायक की भूमिका अदा कर रहे हैं वह एक अजीबोगरीब राज्य का राजकुमार है. एक राजकुमारी भी है (सोनम कपूर, जो सलमान से छोटी लग रही हैं), जिसे अंततः उससे शादी करनी है.
राजकुमार की राज्याभिषेक कुछ दिन बाद होना है. वह आईफ़ोन 6 इस्तेमाल करता है लेकिन चलता घोड़ा गाड़ी से है जो एक तीखी पहाड़ी से नीचे गिर जाती है. जैसा कि होना चाहिए था वह गंभीर रूप से जख़्मी हो जाता है.
इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ कि एक और आदमी, जो बेहद भोला-भाला है और न जाने किस वजह से बिल्कुल राजकुमार की तरह दिखता है, को परिदृश्य में लाया जाता है ताकि राज्याभिषेक बिना किसी झंझट के हो सके.
सलमान खान के पक्के प्रशंसकों के लिए उनकी फ़िल्म से अच्छा क्या हो सकता है? मुझे लगता है कि एक ऐसी फ़िल्म जिसमें सलमान ख़ान नाटकीय रूप से विरोधाभारी डबल रोल में हों. जैसे अमिताभ बच्चन (और बाद में शाहरुख ख़ान) डॉन में थे.

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नया सीधा-सादा सलमान ख़ान बिना किसी प्रयास के राजकुमार के भेस में ढल जाता है और पारिवारिक विवादोँ और सामंती ढांचे के पुराने रंग-ढंग को दुरुस्त कर देता है. क्या आपको यह राम और श्याम, सीता और गीता या ख़ूबसूरत टाइप की कहानी लगती है?
दोनों दावेदारों- राजकुमार और गरीब के लिए फ़िल्म में एक लड़की भी है. राजकुमारी एक छोटी सी काली ड्रेस भी पहनती है, इस उम्मीद में कि गरीब (जो राजकुमार की भूमिका निभा रहा है) अंततः उसके साथ बिस्तर पर जाएगा. वह नहीं जाता. एक ही हीरो को लड़की मिल सकती है.
आप सोच रहे होंगे, क्योंकि इसमें सलमान ख़ान हैं, हम दिल दे चुके सनम की तरह होगी? दर्शकों में से एक सज्जन ने मुझे कहा- संजीव कुमार की राजा और रंक, जो मार्क ट्वेन की 'द प्रिंस एंड दि पॉपर' पर आधारित थी.
मैंने इतने सारे उदाहरण इसलिए दिए ताकि किसी दूसरी फ़िल्म का उल्लेख लेखक-निर्देशक सूरज बड़जात्या की पूरी तरह पागलपन भरी दुनिया और कल्पना के लिए नुक़सानदेह हो सकता है.
उनकी हम आपके हैं कौन की तरह आप इसे पूरी तभी देख सकते हो जबकि आप इसे फ़िल्म मानो ही न.

अगर आप इस फ़िल्म के हीरो को अभिनेता के बजाय एक किरदार के रूप में ही देखें, तो सलमान का स्टारडम ज़्यादा समझ आता है.
ठीक बरखा दत्त का आकर्षण, बशर्ते आप उन्हें महज़ एक न्यूज़ एंकर/रिपोर्टर के बजाय ऑपरा विन्फ़्रे के रूप में देखें.
बड़जात्या की हम आपके हैं कौन दुनिया की अकेली तीन घंटे से लंबी फ़िल्म थी जिसकी कहानी में आखिरी घंटे तक कोई द्वंद्व नहीं है (और इसीलिए कोई कथानक भी नहीं).
उसमें अंताक्षरी है, क्रिकेट मैच है और बहुत सारे गाने हैं जो आपको अलग तरह के थिएटर के अनुभव से जोड़े रखते हैं.
यहां भी, मेरी रुचि फ़िल्म के बजाय जुहू (मुंबई) के लोकप्रिय सिंगल-स्क्रीन चंदन सिनेमा के दर्शकों में अधिक थी.
शुरुआत में तो वह सलमान के स्क्रीन पर आते ही चिल्लाने लगते थे लेकिन धीरे-धीरे मेरे बगल में बैठी लड़की ने अपने बाल बनाने शुरू कर दिए. फ्रंट स्टॉल की आवाज़ उल्लेखनीय रूप से कम हो गई और कुछ ने तो अपने सेलफ़ोन निकाल लिए.

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सलमान ख़ान के साथ सूरज बड़जात्या की यह फ़िल्म 16 साल बाद आई है लेकिन लगती कम से कम 32 साल पुरानी है.
परफ़ॉर्मेंस पुरानी लगती हैं. सेट बड़े और भड़कीले लगते हैं. हर कोई लंबे वाक्यों शब्दों पर अटकते हुए धीरे-धीरे बोलता है. संगीत लगातार दोयम दर्जे का है लेकिन फिर भी 'गुझिया' और अन्य चीज़ों पर बना गाना ठीक ही लगता है.
बस फिर रह क्या जाता है? टाइटल गीत जो आपके कानों में छेद करके एक महीने से बज रहा है, "प्रेम रतन धन पायो,पायो, पायो, पायो....". यह अब भी मेरे दिमाग में बज रहा है, आप कल्पना कर ही सकते हो...
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