ओह चार्ली...

इमेज स्रोत, Waves Cinemas
- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फ़िल्म: मैं और चार्ल्स
निर्देशक: प्रवाल रमन
कलाकार: रणदीप हुड्डा, आदिल हुसैन
रेटिंग: **
यह एक हार्डकोर हिंदी फ़िल्म है जिसका नायक ज़्यादातर समय फ़िल्म की भाषा में बात नहीं करता. और जब वो अंग्रेज़ी (या फिर हिंदी) में बात करता है तो उसकी ज़बान फ्रेंच की तरफ़ इतनी ऐंठी रहती है कि आप कुछ शब्द ज़रूर मिस कर जाएंगे.
वैसे नायक दिखता अच्छा है, थोड़ा थका लेकिन होशियार. बड़ी-बड़ी डींगें भी हैं. रणदीप हुड्डा की ज़्यादातर फ़िल्मों के लिए ये एक सच्चाई है भले ही फ़िल्म चले या ना चले.
कैमरा कई कोणों से रोशनी और छाया की अलग-अलग परतों में नायक को सिसली कोपला हैट में कैद करता है. ज़ाहिर है कि हर चीज़ काफ़ी स्टायलिश है.
बारीकियों पर काफ़ी ध्यान दिया गया है. ये एक पीरियड फ़िल्म भी है जिसका समय 70 और 80 के दशक का है जिसकी वजह से काफ़ी खर्चीली है और कारोबारी नज़रिया रखने वाले इसे जोख़िमभरा कहेंगे.

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क्या यह अच्छी बात है? निश्चित रूप से जबकि फ़िल्म एक बेहद कम जानी जाने वाली बात को सच्ची कहानी बना कर पेश करे और बहाने ना बनाए.
आप एक नायक को और कैसे दिखाएंगे जो असल ज़िंदगी में कुख्यात ठग हो. आधा भारतीय और आधा वियतनामी फ्रेंच नागरिक.
तीन राज्यों, दिल्ली, बॉम्बे और गोवा, की पुलिस जिसके पीछे है और उसे पकड़ने की होड़ में एक दूसरे से टकराती हैं. स्टीवन स्पीलबर्ग की कैच मी इफ़ यू कैन (2002) वाले अंदाज़ में शातिर अपराधी के सामने एक जिद्दी पुलिस अधिकारी भी है जो उसे पकड़ने पर उतना ही अामादा है.
शोभराज की कहानी कई महाद्वीपों और दुनिया के कई प्रमुख शहरों, एथेंस, जिनीवा, इस्तांबुल समेत पूर्वी यूरोप के ज़्यादात्तर हिस्सों में फैली है.
आकर्षक व्यक्तित्व और लगातार पहचान बदलते रहना उसके काम का तरीका है. हम ये इसलिए जानते हैं क्योंकि हमें यही बताया गया है.

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उसके हाथों हुई ज़्यादातर हत्याओं का मकसद छोटी-मोटी लूट और पैसों की हेराफ़ेरी. वो किसी बड़े सिंडिकेट का हिस्सा नहीं है. आप इस अपराधी के दिमाग में थोड़ा गहराई तक जाना चाहेंगे उसके अपराधों के बावजूद आपको उससे थोड़ी सहानुभूति होगी.
शोभराज को जुए की लत का नुक़सान होता है. उसकी जीवनशैली काफ़ी खर्चीली है जिसे नियमित कमाई से पूरा करना मुमकिन नहीं या फिर वो शायद सनकी है. फ़िल्म में इन सबका कोई ज़िक्र नहीं सिवाय इसके कि उसका बचपन दुःखद था और वो पढ़ता बहुत है.
इसकी जगह फ़िल्म का पूरा ध्यान महिलाओं के साथ उसके रहस्यमय तौर तरीकों पर है. उसके पास गैर अपराधी दिमागों पर काम करने वाला एक सम्मोहक असर है जिससे वह उनको अपना सहयोगी बना लेता है. उन्मादी धार्मिक नेताओं और राजनेता भी तो लोगों पर इसी तरह असर डालते हैं.
अपराधी की प्रेमिका का विचार भी बिल्कुल इसी तरह से काफ़ी लुभावना है. मुझे लगता है कि महिलाएं बुरे लड़कों की तरफ इसलिए आकर्षित होती हैं क्योंकि ऐसा कम ही होता है कि अच्छे लडके किसी पर देर तक कायम रखने वाला असर छोड़ें.

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जैसा कि नाम से पता चलता है ये पूरी तरह से चार्ल्स की कहानी है. फ़िल्म कई बार दिल्ली के पुलिस अधिकारी आमोद कंठ का नाम लेती है जो चार्ल्स शोभराज के पीछे हैं और वो बिल्कुल आमोद कंठ जैसे ही हैं.
जितना कि मैं जानता हूं मुंबई के फ़िल्मकार क़रीब दो दशकों से ये फ़िल्म बनाना चाहते थे. कहानी ये भी बताती है कि शोभराज ने चार किताबों और तीन डॉक्यूमेंट्री के लिए अधिकार बेच कर लाखों कमाए.
हम चार्ल्स को कई दशकों से दूर से जानते रहे हैं. फ़िल्म काफ़ी फ़िल्मी है जिसकी बिखरी तस्वीरें और दृश्य आभामंडल को और बढ़ाते हैं और फिर दूरदर्शन के माइक्रोफ़ोन और देसी अदालतों के दृश्य नीचे उतारते हैं जिनमें बचाव पक्ष की वकील गोरी है और अभियोजक है पुलिस अधिकारी.
आप उस के बहुत क़रीब नहीं पहुंच पाते. साफ कहें तो उसके बारे में विकीपीडिया पर फ़िल्म से बहुत ज़्यादा जानकारी मिल जाएगी. फ़िल्म में जो है उससे ज़्यादा परेशान करता वो जो फ़िल्म का हिस्सा हो सकता था.
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