'अकेली महिला को घर मिलना मुश्किल क्यों'

कल्कि कोचलिन

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    • Author, मधु पाल
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी के लिए

अभिनेत्री कल्कि केकलां को मुंबई में सात साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक वो यहां के लोगों को समझ नहीं पाई हैं.

कल्कि और अनुराग कश्यप अब एक-दूसरे से अलग हो गए हैं. इसके बाद जब कल्कि को अपने लिए अलग घर ढूंढ़ना पड़ा और तभी जो हुआ उसकी उन्होंने कल्पना नहीं की थी.

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बीबीसी से बातचीत में कल्कि ने बताया कि कैसे उन्हें किराये पर घर लेना मुश्किल हुआ.

कल्कि कहती हैं कि वो जब सात साल पहले मुंबई आई थी तब इस शहर में घर किराये पर लेना इतना मुश्किल नहीं था जितना अब हो रहा है.

कल्कि के अनुसार ''अकेला आदमी हो या अकेली औरत, किसी को भी आसानी से किराये पर कोई नहीं रखता."

कल्कि कोचलिन

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वे कहती हैं, "मुंबई में कहीं हिंदू तो कहीं मुस्लिम बिल्डिंग हैं और तो और शुद्ध शाकाहारी लोगों की अलग बिल्डिंग हैं.''

कल्कि अचरज से कहती हैं ''सब इंसान हैं, तो फिर क्यों हमारी सोच पिछड़ती जा रही हैं ?."

लड़कों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते?

दीपिका पादुकोण

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दीपिका पादुकोण के नए वीडियो 'माई चॉइस' पर कल्कि कहती हैं "मुझे दीपिका पादुकोण का वीडियो 'मेरी मर्ज़ी' बहुत पसंद आया."

वे कहती हैं, "मैं बहुत खुश हूँ कि इस तरह का वीडियो बनाया लेकिन लोगों ने इसे औरत बनाम आदमी का मुद्दा बना दिया हैं जो ऐसा नहीं होना चाहिए था. लड़के जो भी करें हम सवाल नहीं पूछ सकते."

उन्होंने कहा, "बॉलीवुड हो या हॉलीवुड महिलाओं को पुरुष कलाकारों सा पैसा नहीं मिलता, जबकि फ़िल्मों में उनका काम भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं."

'दया नहीं इज्ज़त चाहिए'

कल्कि कोचलिन

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अपनी नई फ़िल्म 'मार्गरिटा विथ ए स्ट्रॉ' के बारे में कल्कि का कहना है कि "अपने आप को परखने के लिए मैंने यह फ़िल्म की."

शोनाली बोस द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में कल्कि एक ऐसी भारतीय महिला का क़िरदार निभा रही हैं जो दिमागी लकवे से पीड़ित है. फ़िल्म में असमर्थ लोगों की सेक्स लाइफ़ की भी बात की गई है.

इस भूमिका के लिए कल्कि ने व्हीलचेयर पर छह महीने तक रोज़ दो घंटे गुजारे हैं, ताकि वो किरदार को ठीक तरह से अदा कर सकें.

कल्कि कोचलिन

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कल्कि कहती हैं, "विकलांग लोगों को आरक्षण या छूट नहीं, सम्मान चाहिए और भारत में विकलांग लोगों को इज्ज़त ही नहीं दी जाती है. थिएटर, मॉल हो या स्कूल यहाँ सुविधाएं ही नहीं हैं, जैसे की बाहर देशों में होती हैं."

कल्कि का मानना है, "आज भारत में आठ प्रतिशत लोग विकलांग हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम ही सड़कों पर दिखते हैं. क्योंकि सड़को पर रैंप तक नहीं हैं उनके चलने के लिए. बाकी सुविधा तो बहुत दूर की बात है."

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