राम रहीम की फ़िल्म, सेंसर बोर्ड और साज़िश

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- Author, जयप्रकाश चौकसे
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
सेंसर ने राम रहीम की फ़िल्म 'एमएसजी' को प्रमाणपत्र नहीं देते हुए, अंधविश्वास फैलाने की शंका के साथ इसे मंत्रालय को भेज दिया है.
इसी सेंसर ने राजकुमार हीरानी की 'पीके' को इस आधार पर पास कर दिया था कि यह फ़िल्म अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज़ उठाती है.
सारे देश में हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया, अनेक सिनेमाघरों की तोड़फोड़ की और कानून व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी खामोश खड़े रहकर विरोध देखते रहे.
इसका अर्थ यह है कि सरकार की एक संस्था सेंसर ने इसे प्रमाणित किया और सरकार बनाने वाले दलों के एक गुट ने फ़िल्म का विरोध किया.
इस दुविधा और भय के वातावरण के कारण ही सेंसर ने अपना उत्तरदायित्व उच्च अधिकारियों के सिर पर डाल दिया है. इन परिस्थितियों में निर्णय लेना जोख़िम का काम है.
बताया जाता है कि राम रहीम के भक्तों की संख्या काफ़ी बड़ी है.
सेंसर बोर्ड की मुश्किल

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सन् 1987 में आरके नैयर की 'पति परमेश्वर' को भी इसी शंका के आधार पर लंबे समय तक रोका गया था, बाद में पर्याप्त दबाव बनाने के कारण फ़िल्म का प्रदर्शन संभव हो पाया.
कुछ महीने पहले एक सेंसर अधिकारी पर रिश्वत के ठोस प्रमाण भी सामने आए थे. स्पष्ट है कि सेंसर नामक संस्था किसी स्पष्ट नीति के आधार पर ठोस फ़ैसले लेने में असमर्थ है.
जैसे भारत में वर्तमान के क्षण में अनेक विगत सदियां भी मौजूद होती हैं, वैसे ही अनेक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएं सक्रिय रहती हैं और अनेक प्रकार के दबाव के रहते कोई स्पष्ट नीति नहीं उभर पाती.
माथा देखकर तिलक लगाने में अफ़सर जुटे रहते हैं. 'सत्यमेव जयते' सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं में दीवारों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा होता है परन्तु सत्य कभी पूरी तरह उजागर ही नहीं हो पाता.
भारतीय कथा फ़िल्मों के पहले दो दशकों में सारी फ़िल्में मिथकों के आख्यानों पर बनाई गईं, क्योंकि माध्यम की आधी अधूरी जानकारी से कथा प्रस्तुति में रही कमतरी को दर्शक कथा के अपने ज्ञान से पूरा कर लेते थे.
इस तरह बड़े संदिग्ध रूप में 'बिट्वीन द फ्रेम्स' अर्थ पढ़ने का काम भी भारत में शुरू हुआ.
नज़रिए का द्वंद

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कालांतर में सामाजिक व अन्य प्रकार की फ़िल्में भी बनीं, परंतु उनपर भी मायथोलॉजी का प्रभाव बना रहा. आधुनिक कपड़ने पहने पात्र मायथोलॉजी के सोच से ही संचालित रहे हैं.
दरअसल धर्म का भवन हवादार और रोशन है, लेकिन भवन के तलघर में जमा अंधविश्वास और कुरीतियां रात में खाली भवन में प्रवेश करती हैं.
इसीलिए, दिन में भवन देखने वालों का दृष्टिकोण उनसे अलग रहा है जिन्होंने रात में उसी भवन को देखा है.
शताब्दियों से दोनों किस्म के दृष्टिकोण समाज में मौजूद रहे हैं और उनके द्वंद के कारण अजीब सी धुंध हमेशा कायम रहती है.
हमारे यहां पढ़े लिखे लोग भी इस तरह की बात कहते रहे हैं कि दीपा मेहता की 'फायर' की दोनों दमित नारियों के समलैंगिक संबंध पर कोई एतराज़ नहीं, लेकिन दीपा ने उनके नाम राधा और सीता क्यों रखे?
तैंतीस कोटि देवी देवताओं की बात प्रचारित है इसलिए, फ़िल्मकार को पात्रों के नाम के लिए भी गहरा शोध करना होगा.
स्वतंत्रता का सवाल

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दरअसल मुद्दा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है, संविधान में घोषित अधिकारों का है.
अमरीका में बनी भूत प्रेत की फ़िल्मों में भी क्रिश्चएनिटी का प्रचार इस तरह से रहता है कि पवित्र जल और क्रॉस से प्रेतात्माएं डरती हैं पर अमरीका में 'टेन कमांडमेंट्स' और 'बेनहर' जैसी उच्च गुणात्मकता की फ़िल्में भी बनी हैं.
फ़िल्म माध्यम से अंधविश्वास और आस्था दोनों का ही प्रचार हुआ है. इसलिए अंतिम निर्णय दर्शक का माना जाना चाहिए.
चर्च समय समय पर उन किताबों के नाम भी प्रकाशित करता है जिन्हें नहीं पढ़ने की सलाह दी जाती है परंतु कोई प्रतिबंध जारी नहीं किया जाता.
पश्चिम के देशों की तुलना में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कम है. अमरीका में भी फ़िल्मों का विरोध हुआ है परंतु कभी किसी दर्शक को सिनेमाघर जाने से रोका नहीं जाता औऱ संपत्ति को हानि भी नहीं पहुंचाई जाती.
कभी कभी कुछ किताबें प्रतिबंधित हुई हैं परंतु न्यायालय ने प्रतिबंध हटाया है.
समग्र प्रभाव सबसे अहम

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जेम्स जॉयस की 'यूलिसिस' पर से प्रतिबंध हटाते हुए जज बूल्ज़े का निर्णय उल्लेखनीय बन गया है.
उन्होंने कृति को उसकी संपूर्णता में पढ़ने को कहा और समग्र प्रभाव को महत्वपूर्ण माना. भारतीय अदालतों में भी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स से लेकर राजकपूर की 'सत्यम शिवम सुंदरम' को भी हरी झंडी दिखाई गई है.
दरअसल कौन सी फ़िल्म अंधविश्वास फैला रही है या कौन सी फ़िल्म अंधविश्वास का विरोध कर रही है, इसका निर्णय दर्शक पर छोड़ना चाहिए क्योंकि वहीं जानता है कि उसे क्या देखना है?
जिस जनमत से सरकारें चुनीं जाती हैं, उसी जनमत पर सिनेमा के फ़ैसले भी छोड़े जाने चाहिए. यश चोपड़ा की 'फ़ना' गुजरात में नहीं दिखाई जा सकी और गॉवरीकर की 'जोधा अकबर' राजस्थान में नहीं दिखाई जा सकी, जबकि दोनों फ़िल्में सेंसर द्वारा पारित थीं.
राम रहीम के ख़िलाफ़ कई आरोप हैं और भांति भांति की जांच पड़ताल जारी है. अफवाह यह भी है कि हरियाणा के चुनाव में उनके अनुयाइयों की भूमिका निर्णायक रही परंतु पंजाब की बादल सरकार उनका विरोध कर रही है.
व्यर्थ तो नहीं होगा खर्चा?

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बादल सरकार और भारतीय जनता पार्टी सहयोगी रहे हैं.
राम रहीम ने अपनी अपनी फ़िल्म के प्रचार पर लगभग 12 करोड़ रुपये खर्च किए हैं और सिनेमाघर भी दो सप्ताह के लिए आरक्षित किए हैं.
सेंसर के कारण यह सब व्यर्थ हो जाएगा. सत्य यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ अनेक शक्तियां काम करती हैं और सारी नाकारात्मक शक्तियां भीतर से किसी सूत्र द्वारा जुड़ी प्रतीत होती हैं.

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कौन व्यक्ति कैसा मुखौटा लगाए हुए हैं, यह बताना कठिन है. क्या आज मीडिया स्वतंत्र है?
क्या कभी मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र था? सभी तरह के तनाव और दबावों के बीच कुछ सार्थक प्रयास होते हैं परंतु इस मामले में शायर निदा फाज़ली की पंक्तियां को अंतिम बयान मानना चाहिए-
यह जीवन शोर भरा सन्नाटा,
जंजीरों की लंबाई तक है सारा सैर सपाटा.
सभी के पैरों में जंजीरें बंधी हैं, भले ही सारी जंजीरें दिखाई नहीं दें, परंतु कछ की जंजीरें लंबी हैं! बंधे हुए तो सभी हैं.
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