फ़िल्म रिव्यू: क्या 'पीके' का नशा चढ़ेगा?

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- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
फ़िल्म: 'पीके'
निर्देशक: राजकुमार हीरानी
कलाकार: आमिर ख़ान, अनुष्का शर्मा
रेटिंग: ***
क्या 'पीके' महज़ एक जोक है? ऐसा हो सकता था. फ़िल्म का हीरो एलियन की तरह लगता है.
फ़िल्म के रिलीज़ से पहले इसका प्लॉट ऐसे छुपा कर रखा गया था जैसे ये कोई नेशनल सीक्रेट हो.

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मुझे लगता है कि ये एक नासमझी थी, क्योंकि यही तो इस फ़िल्म की सबसे ख़ास बात है जिसे रिलीज़ से पहले ख़ासा प्रचारित किया जाना चाहिए था.
ज़बरदस्त आमिर
मेरे हिसाब से अभिनय के लिहाज़ से ये आमिर ख़ान का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.
क्योंकि एक प्रकार से ये एक मौलिक भूमिका थी जिसका कोई संदर्भ बिंदु नहीं है.

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हां उनका रोल थोड़ा बहुत मिस्टर बीन से ज़रूर मिलता है.
लेकिन पूरी फ़िल्म में वो नेचुरल लगे हैं. दुबले-पतले, बड़े कानों और लाल होंठ वाले आमिर बड़ा लुभाते हैं.
पूरी फ़िल्म में उन्होंने बड़ी आला दर्जे की भोजपुरी बोली है.
सवाल उठाती है फ़िल्म

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एलियन का किरदार फ़िल्म अपना संदेश देने मात्र के लिए इस्तेमाल करती है. वो फ़िल्म की मुख्य थीम नहीं है. क्योंकि ये कोई विज्ञान फ़ंतासी फ़िल्म नहीं है.
एलियन जैसा एकदम अलग किरदार ही इस दुनिया के कुछ बेवकूफ़ाना रीति-रिवाजों को बिलकुल निष्पक्ष तरीके से देखकर उन पर सवालिया निशान लगा सकता है?
धर्म और जात-पात के नाम पर हम जो मूर्खतापूर्ण भेदभाव करते हैं उन्हें 'पीके' चैलेंज करती है.
'पीके' भगवान के बारे में बात करना चाहती है.
धर्म के नाम पर जो रीति-रिवाज चल रहे हैं. कथित संत, महात्मा जो लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं उनके बारे में बात करती है पीके.
कहानी

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पीके की दोस्त, टीवी रिपोर्टर (अनुष्का शर्मा) उसकी ख़बर टीवी पर दिखाना चाहती है लेकिन उसका बॉस (बोमन ईरानी) कथित धर्मगुरुओं और राजनीतिक पार्टियों के दबाव में ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.
भारत में ज़्यादातर समाचार चैनलों के मालिक इस मनोदशा को अच्छी तरह समझ सकते हैं.
अच्छा संदेश

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आज के दौर में भारतीय उपमहाद्वीप समेत पूरी दुनिया में धर्म और संप्रदाय के नाम पर हिंसा मची है.. ऐसे में हमारी इस मूर्खता पर पीके तंज कसती है.
इस मामले में फ़िल्म की जितनी तारीफ़ की जाए कम है.
मैं उम्मीद करता हूं कि भारतीय उपमहाद्वीप में लोग इसे बड़ी संख्या में देखें और इसके सबक को समझें.
हीरानी की छाप

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कई जगह फ़िल्म भटक भी जाती है. पटकथा पूरी तरह से लय में नहीं है.
लेकिन फ़िल्म में राजकुमार हीरानी की छाप साफ़ दिखती है.
एक किरदार जो दुनिया में सिर्फ़ अच्छे काम करने आया है, एक छोटी सी प्रेम कहानी, छोटी-छोटी हास्यपूर्ण परिस्थितियां और एक संदेश देने की कोशिश...ये सब इसे राजकुमार हीरानी की फ़िल्म बना देती हैं.
एक दर्शक के तौर पर मुझे थोड़ी निराशा हुई क्योंकि मैं बहुत ज़्यादा उम्मीदें लेकर गया था.
लेकिन अगर आप पूछें कि "क्या मुझे फ़िल्म देखकर ख़ुशी मिली?" तो इसका जवाब है जी हाँ.
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