पंजाबी फ़िल्मों में पाकिस्तानी हीरो?

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- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन
लंदन के साउथहॉल और फेलथेम जैसे इलाक़े, यहाँ के सिनेमाघरों में पंजाबी फ़िल्में ख़ूब पसंद की जाती हैं. पंजाबी फ़िल्म 'पंजाब 1984' की इँग्लैंड में इन दिनों ख़ूब चर्चा है. आतंकवाद के दौर में मंदी से गुज़री पंजाबी फ़िल्म इंडस्ट्री अब दोबारा सक्रिय हुई है.
पंजाबी निर्माता इस रिवाइवल में अहम योगदान भारत से बाहर एनआरआई बाज़ार को भी मानते हैं.
कनाडा में बसे पंजाबी फ़िल्मों के प्रोड्यूसर मनमर्द सिद्धू कहते हैं, "पंजाबी फ़िल्मों के दर्शक काफ़ी सीमित हैं लेकिन जब हमारी फ़िल्में बाहर के देशों में लगती हैं, लोग डॉलर-पाउंड में खर्च करते हैं तो हमारे लिए आमदनी का बेहतर ज़रिया बना रहता है."
ब्रिटेन और कनाडा जैसे मुल्कों से बाहर अब भारत के पंजाबी फ़िल्मकारों को नए बाज़ार की तलाश है और उनकी नज़रें पाकिस्तान पर टिकी हैं.
ईस्ट और वेस्ट पंजाब

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निर्माता पाकिस्तान में भी भारतीय पंजाबी फ़िल्में रिलीज़ करना चाहते हैं जिनमें पाकिस्तान के भी अभिनेता काम करें.
मनमर्द सिद्धू कहते हैं, "हम सोच रहे हैं कि लाहौर वगैरह में पंजाबी कलाकारों को लेकर और भारत के पंजाबी कलाकारों को लेकर फ़िल्म बनाएँ जो दोनों देशों में रिलीज़ करें. ईस्ट और वेस्ट पंजाब के दर्शक मिलाकर हमें ज़्यादा दर्शक मिल सकेंगे."

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दिलजित दोसांझ भारत में पंजाब के सबसे मशहूर सितारों में से हैं. वे मानते हैं कि पाकिस्तान में पंजाबी फ़िल्में रिलीज़ करना अच्छा बिज़नेस प्लैन है.
दिलजीत कहते हैं, "अभी पाकिस्तान की मार्केट हमने कवर नहीं की है. वहाँ जट एंड जूलियट लोगों ने देखी है पर डीवीडी पर. हम थिएटरों में पंजाबी रिलीज़ करना चाहते हैं."
दिलजीत का मानना है कि पंजाबी फ़िल्म इंडस्ट्री में काफ़ी सुधार हुआ है.
कभी चंद लाख में बनने वाली पंजाबी फ़िल्म का बजट अब 5-6 करोड़ में हो गया है.
15-20 प्रिंट से बढ़कर विदेशों में अब पंजाबी फ़िल्मों के 40 प्रिंट लगने लगे हैं. बाकी भाषाओं के मुकाबले पंजाबी फ़िल्में अभी काफ़ी पीछे हैं लेकिन फ़िल्मकारों को उम्मीद है कि पाकिस्तान जैसे नए बाज़ार मिलने से दर्शक और कमाई दोनो बढ़ेगी.
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