फ़िल्म रिव्यू: 'भूतनाथ रिटर्न्स'

इमेज स्रोत, B R Films
- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
रेटिंग: ***1/2
टी सीरीज़ और बी आर फ़िल्म्स की 'भूतनाथ रिटर्न्स' साल 2008 की 'भूतनाथ' का सीक्वल है.
भूतनाथ (अमिताभ बच्चन) के उसके साथी भूत मज़ाक उड़ाते हैं क्योंकि वो किसी बच्चे को डरा नहीं पाता.
वो भगवान से फिर एक मौक़ा मांगता है ताकि मनुष्य अवतार में वो धरती पर आए और किसी बच्चे को डरा पाए.
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धरती पर भूतनाथ आता है. उसे सिर्फ़ एक छोटा बच्चा अखरोट (पार्थ भालेराव) ही देख पाता है.
जल्द ही अखरोट और भूतनाथ के बीच दोस्ती हो जाती है. भूतनाथ, उसे और उसकी ग़रीब मां को ग़रीबी के चंगुल से निकालने की ठान लेता है.
इस बीच चुनाव नज़दीक आ जाते हैं. स्थानीय भ्रष्ट नेता भाऊ (बोमन ईरानी) फिर से वोटरों को लुभाकर चुनाव जीतना चाहता है.
अखरोट, भूतनाथ को भाऊ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लेता है.

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पहले तो भाऊ उसे गंभीरता से नहीं लेता लेकिन जब भूतनाथ धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगता है और उसे मीडिया का कवरेज मिलने लगता है तो भाऊ के होश फ़ाख़्ता हो जाते हैं. वो समझ जाता है कि भूतनाथ को रोका ना गया तो उसका चुनाव हारना तय है.
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तब भाऊ अखरोट को मारने का प्लान बनाता है और अपने आदमियों को उसकी हत्या करने के लिए भेजता है.
उसे लगता है कि भूतनाथ अखरोट को बहुत प्यार करता है और उसकी मौत के बाद वो चुनाव से अपना नाम वापस ले लेगा.
अखरोट एक बार तो बच जाता है लेकिन अगली बार वो भाऊ के गुंडों के हमले में बुरी तरह से घायल हो जाता है. उसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है.
आगे क्या होता है ? क्या अखरोट की जान बच जाती है. चुनाव में भाऊ जीतता है या भूतनाथ, यही फ़िल्म की कहानी है.
मज़ेदार कहानी

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भूत का चुनाव लड़ना, वैसे तो ये ख़्याल ही बड़ा हास्यास्पद है लेकिन नीतेश तिवारी और पीयूष गुप्ता ने अपनी दमदार कहानी में बड़ी ख़ूबसूरती से इस प्लॉट को उभारा है. जिसकी वजह से फ़िल्म बड़ी मनोरंजक और मज़ेदार बन पड़ी है.
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फ़िल्म मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर एक कटाक्ष है. देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, सरकारी कर्मचारियों के ग़ैर ज़िम्मेदाराना बरताव और अपराधियों की राजनेताओं से सांठगांठ जैसे विषयों को फ़िल्म में बड़ी ख़ूबी से मनोरंजक अंदाज़ में दिखाया गया है जिससे फ़िल्म मज़ेदार भी लगती है और सोचने पर भी मजबूर करती है.
ये ज़रूर है कि कई हिस्सों में फ़िल्म खींची गई लगती है. लेकिन अपने मौलिक विषय और हास्य की वजह से दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब रहती है.
चुनावी माहौल के अनुकूल
भूतनाथ पानी की कमी, गंदगी, खस्ताहाल सड़कों की वजह से लोगों को होने वाली परेशानियों जैसे मुद्दे उठाता है जिसकी वजह से आम दर्शक फ़िल्म से जुड़ाव महसूस करेंगे.
देश में चुनावी माहौल चल रहा है ऐसे में इस फ़िल्म की अपील और ज़्यादा हो जाती है.
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फ़िल्म के कुछ दृश्य तो बेहतरीन बन पड़े हैं. जैसे, जब भूतनाथ अखरोट की ग़रीबी दूर करने के लिए उसकी मदद करता है जिसके तहत अखरोट लोगों से भूत भगाने का दावा करता है.
बेहतरीन दृश्य

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एक और सीन जिसमें भूतनाथ एक वकील के पास चुनाव लड़ने की सलाह मांगने जाता है. साथ ही वो दृश्य जब भाऊ को पता लगता है कि एक भूत उसके ख़िलाफ़ चुनाव में खड़ा होने वाला है.
भूतनाथ की भाऊ से उसके टॉयलेट में मुलाक़ात वाला सीन भी बेहतरीन है.
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फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान और रणबीर कपूर अतिथि भूमिकाओं में हैं. दोनों के फ़िल्म में संक्षिप्त अपियरेंस को तालियां मिलेंगीं.
फ़िल्म के संवाद शानदार हैं और लोगों को ख़ासे पसंद आएंगे. फ़िल्म के संवादों में ज़बर्दस्त हास्य है.
शानदार अभिनय
अमिताभ बच्चन ने भूतनाथ के किरदार में जान डाल दी है और एक बार फिर बता दिया है कि वो कितने महान कलाकार हैं.
उन्होंने बड़ी खूबी और सहजता से ये रोल निभाया है और ये कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उनके अलावा और कौन ये रोल कर सकता था.
उनकी कॉमिक टाइमिंग अब भी लाजवाब है और भावनात्मक दृश्यों में भी वो बेहतरीन रहे हैं. उनका डांस भी हमेशा की तरह गरिमापूर्ण रहा है.
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बोमन ईरानी ने भी एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मना दिया है. वो कॉमिक सींस में बड़े मज़ेदार लगे हैं और साथ ही खलनायक के तौर पर ख़तरनाक भी लगे हैं.
बाल कलाकार पार्थ का कमाल

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बाल कलाकार मास्टर पार्थ शंशाक भालेराव ने एक अवॉर्ड विनिंग परफ़ॉर्मेंस दी है. इस फ़िल्म के बाद उनके कई प्रशंसक बनने तय हैं ख़ास तौर से बच्चों के बीच वो बहुत मशहूर होने वाले हैं.
उनकी संवाद अदायगी कमाल की है और अमिताभ बच्चन, बोमन ईरानी जैसे दिग्गज कलाकारों के सामने उन्होंने जिस सहजता और आत्मविश्वास से कैमरे का सामना किया है वो क़ाबिले-तारीफ़ है.
शाहरुख़ ख़ान, रणबीर कपूर और अनुराग कश्यप अपनी अतिथि भूमिकाओं में अच्छे लगे हैं.
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संजय मिश्रा ने भी बड़ा स्वाभाविक अभिनय किया है और वो जब-जब पर्दे पर आए हैं अपनी छाप छोड़ी है. बाकी कलाकार भी अच्छे रहे हैं.
निर्देशन
नीतेश तिवारी का निर्देशन आला दर्जे का है. उन्होंने मौजूदा दौर के हिसाब से ये फ़िल्म बनाई है और इसमें स्वस्थ हास्य का बड़ी चतुराई से समावेश किया है.
फ़िल्म के संगीत की बात करें तो 'पार्टी तो बनती है' और 'पार्टी विद द भूतनाथ' गाने पहले ही हिट हो चुके हैं. बाकी गीत साधारण हैं. फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी और सेट्स लाजवाब हैं.
कुल मिलाकर 'भूतनाथ रिटर्न्स' एक मनोरंजक फ़िल्म है. हालांकि कई जगह पर फ़िल्म ऊबाई भी है लेकिन फिर भी दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए इसमें पर्याप्त मसाला है.
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