फ़िल्म समीक्षा: गुलाब गैंग

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- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
रेटिंग *
सहारा मूवी स्टूडियोज़ भरत शाह और बनारस मीडिया वर्क्स की 'गुलाब गैंग' एक सामाजिक कार्यकर्ता रज्जो (माधुरी दीक्षित) की कहानी है जो एक गांव में रहती है और 'गुलाब गैंग' नाम के औरतों के एक दल की मुखिया है.
ये गैंग सताई हुई औरतों की मदद करता है और महिलाओं पर अत्याचार करने वाले पुरुषों की डंडों से पिटाई करती हैं. पढ़ी लिखी रज्जो गांव के बच्चों को भी पढ़ाती है और गांव में स्कूल खोलने का सपना देखती है.
सुमित्रा देवी (जूही चावला) एक कपटी राजनेता है जो अपनी कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकती है. गांव में रज्जो की लोकप्रियता को देखकर सुमित्रा देवी रज्जो की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाती हैं. पर रज्जो इस दोस्ती के प्रस्ताव को ठुकरा देती है और सुमित्रा देवी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने का फ़ैसला करती है.
<link type="page"><caption> (रिव्यू : 'क्वीन')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2014/03/140307_film_review_queen_vm.shtml" platform="highweb"/></link>
सुमित्रा देवी हर मुमकिन कोशिश करती है कि रज्जो हार जा ? क्या सुमित्रा देवी रज्जो को हरा पाती हैं या नहीं? यही है फ़िल्म की कहानी.
थका हुआ ड्रामा

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निर्देशक सौमिक सेन ने 'गुलाब गैंग' में औरतों को काफ़ी बहादुर और निर्भय दिखाया है पर इस फ़िल्म का ड्रामा बहुत ही थका हुआ और ऊबाऊ है. रज्जो और सुमित्रा देवी के आमने-सामने के कुछ सीन अच्छे हैं लेकिन बाकी फ़िल्म बड़ी बोझिल सी है.
रज्जो को फ़िल्म में जिस तरह से एक्शन करते और गुंडों को पीटते दिखाया गया है वो वास्तविक लगने के बजाय हास्यास्पद लगता है.
<link type="page"><caption> (रिव्यू : 'शादी के साइड इफेक्ट्स')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2014/02/140228_review_shadi_ke_side_effects_pkp.shtml" platform="highweb"/></link>
सुमित्रा देवी (जूही चावला) को बहुत निर्दयी दिखाया गया है जो शायद जूही के प्रशंसकों के गले ना उतरे.
फ़िल्म में माधुरी और जूही द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा भी दर्शकों को बिलकुल नही पसंद आएगी क्योंकि दोनों ही अभिनेत्रियां अब तक साफ़ सुथरे और पारिवारिक रोल्स के लिए जानी जाती हैं.
अभिनय और निर्देशन

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माधुरी दीक्षित ने रज्जो का किरदार बखूबी निभाया है. उनके एक्शन सीन्स भले ही वास्तविक ना लगें लेकिन इन दृश्यों में उनके हावभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
जूही चावला ने 'सुमित्रा देवी' के नकारात्मक किरदार को अच्छे से निभाया है.
सौमिक सेन का निर्देशन इस फ़िल्म के ड्रामे की ही तरह बिलकुल बेजान है.
हां, फ़िल्म के कुछ संवाद(सौमिक सेन और अमितोष नागपाल) ज़रूर तालियों के हक़दार हैं
कुल मिलाकर 'गुलाब गैंग' एक थकी हुई उबाऊ फ़िल्म है जो किसी भी तरह का मनोरंजन देने में असमर्थ है.
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