'हीरोइन बनने के लिए फूंक-फूंक कर क़दम'

सलीना प्रकाश

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इमेज कैप्शन, (सलीना प्रकाश को चार साल के लंबे संघर्ष के बाद दोबारा काम मिला)
    • Author, वैभव दीवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई

भले ही बॉलीवुड को 'पुरुष प्रधान इंडस्ट्री' कहा जाता हो लेकिन टीवी पर औरतों का दबदबा है. फ़िल्म में एक बड़े सितारे की मौजूदगी उसे हिट करा सकती है तो टीवी पर 'सास-बहू की खिट-पिट' सीरियल की टीआरपी बढ़ा सकती है.

लेकिन टीवी के पर्दे तक पहुंचने के लिए इन महिला कलाकारों को कितना संघर्ष करना पड़ता है, चलिए जानने की कोशिश करते हैं.

मैंने इसके लिए कम से कम छह कलाकारों से बात की लेकिन चार ने तो कभी शूटिंग में व्यस्त रहने की बात करके तो कभी बीमार होने की बात कहके मुझे वक़्त नहीं दिया.

फिर भी मेरी बात दो कलाकारों से हुई जिन्होंने अपने सफ़र के बारे में विस्तार से बात की.

'टीवी पर मां बनना ख़तरनाक'

सलीना प्रकाश

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इमेज कैप्शन, सलीना प्रकाश के मुताबिक़ टीवी पर महिला कलाकारों पर टाइपकास्ट होने का ख़तरा बहुत ज़्यादा होता है.

चंडीगढ़ से अपने अभिनय के सपनों को पूरा करने आई सलीना प्रकाश को पहला ब्रेक तो आसानी से मिल गया लेकिन उसके बाद कुछ समय तक उनके पास कोई काम नहीं था.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया, “मुझे आज से चार साल पहले जब सीरियल शकुंतला में काम करने का मौक़ा मिला तो मैं बहुत ख़ुश हुई. मुझे मां का रोल ऑफ़र हुआ और मैंने सोचा कि एक कलाकार को हर तरह का रोल करना चाहिए. ये सोचकर मैंने वो प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. लेकिन मेरा पहला रोल ही मेरे लिए मुसीबत बन गया.”

सलीना बताती हैं कि उसके बाद वो जहां भी काम मांगने जातीं तो उन्हें जवाब मिलता कि शो में मां का रोल नहीं है. सलीना के मुताबिक़ टीवी पर कलाकार टाइपकास्ट बहुत जल्दी हो जाते हैं और उन पर एक लेवल लगा दिया जाता है.

सलीना एड फ़िल्म्स करके अपना ख़र्च चलाती रहीं लेकिन सीरियल में काम ना करने की वजह से वो अवसाद की शिकार हो गईं.

उन्होंने कहा, “मेरे लिए बड़ा तक़लीफ़देह समय रहा. मेरे बॉयफ़्रेंड से मेरा अलगाव हो गया. पैसों की कमी होने लगी. घर से पैसे नहीं मंगा सकती थी क्योंकि उन्हें मेरी हालत का पता चलता तो वो मुझे घर बुला लेते.”

सलीना ने हिम्मत नहीं छोड़ी. कई ऑडिशन देने के बाद उन्हें ‘एक घर बनाऊंगा’ नाम के डेली सोप में एक निगेटिव रोल मिला.

वो कहती हैं, “वैसे मेरा शो शाम साढ़े छह बजे जैसे अटपटे समय में आता है लेकिन चलो कम से कम एक मौक़ा तो मिला.”

‘टीवी और फ़िल्म कलाकारों में भेदभाव क्यों’

इशिता शर्मा

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मुंबई में ही पली बढ़ी इशिता शर्मा बचपन से ही मॉडलिंग करती रहीं और एड फ़िल्म्स में दिखती रही हैं. इशिता का करियर बतौर फ़िल्म अभिनेत्री शुरु हुआ.

उन्होंने फ़िल्म 'दिल दोस्ती एटसेट्रा' में अहम रोल निभाया था. जल्द ही इशिता की शादी हो गई और उनकी प्राथमिकता बदल गई. अब वो टीवी पर ही दिखती हैं.

इशिता ने कहा, “टीवी भी तो कलाकारों के लिए एक माध्यम है. लेकिन पता नहीं क्यों लोग टीवी और फ़िल्म कलाकारों के बीच भेदभाव करते हैं.”

इशिता ने आख़िरी बार 'डांस इंडिया डांस' नाम का शो होस्ट किया था. फ़िलहाल वो आराम कर रही हैं. क्या रोल पाने के लिए किसी कलाकार को समझौते भी करने पड़ते हैं.

इसके जवाब में इशिता कहती हैं, “अगर आपका रुख़ साफ़ है और आप मज़बूत हो तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जब तक आप घुटने नहीं टेकोगे तो कोई समझौता नहीं करना पड़ेगा. सामने वाले को लगेगा कि आप वल्नरेबल हो तो वो आपका फ़ायदा ज़रूर उठाना चाहेगा.”

‘मैंने कोई अश्लील हरकत कर नाम नहीं कमाया’

राखी सावंत

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राखी सावंत से मिलना एक चुनौती है. लेकिन एक बार वो मिलीं तो उन्होंने खुलकर बातें कीं.

अपने संघर्ष को याद करते हुए राखी ने बताया, “मुझे फ़िल्म और टीवी इंडस्ट्री के बारे में पांच पैसे की अक़्ल नहीं थी. मैंने दर दर की ठोकरे खाईं पर अपने सपने को पूरा किया. मेरे पिताजी पुलिस में हैं जो हमेशा चाहते थे कि मैं भी पुलिस में जाऊं या नेता बनूं पर मैंने कलाकार बनने का सोच लिया था.”

‘आइटम गर्ल’ और ‘विवादों की रानी’ कहलाने वाली <link type="page"><caption> राखी </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/03/110302_rakhi_sawant_comedycircus_ar.shtml" platform="highweb"/></link>कहती हैं, “मैंने टीवी पर सात साल राज किया है. जिस तरह के शो मैंने अपने करियर की शुरुआत में किए वैसे आमिर ख़ान और कपिल शर्मा जैसे लोग अब कर रहे हैं.”

राखी आगे कहती हैं, “बेशक मुझे इस मुक़ाम पर आने के लिए एक्सपोज़ करना पड़ा हो, कम कपड़े पहनने पड़े हों लेकिन मैंने कोई अश्लील हरकत नहीं की. मैं जो चाहती थी वो हासिल किया.”

ये थी मुंबई से टीवी पर अभिनय करने वाले कलाकारों के संघर्ष की कहानियां. जिन्होंने संघर्ष किया और भले ही अपने क्षेत्र में चोटी का ना छुआ हो लेकिन काफ़ी हद तक अपने लिए एक पहचान बनाई.

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