किसने बनाई भारत की 'सर्वश्रेष्ठ फिल्म'?

- Author, कल्पना शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले हफ्ते दो हिंदी फिल्में रिलीज़ हुईं - 'डी-डे' और 'रमैया वस्तावैया'.
इन दोनों फिल्मों के साथ ही हिंगलिश श्रेणी (हिंदी-अंग्रेज़ी का मिश्रण) में 'शिप ऑफ थीसियस' नाम की फ़िल्म भी रिलीज़ हुई जिसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछले कुछ वर्षों की सर्वश्रेष्ठ भारतीय फ़िल्म बताया जा रहा है.
श्याम बेनेगल ने इसे भारत की 'सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म' बताया है तो वहीं ब्रिटेन के अख़बार 'द इंडिपेंडेंट' ने इसे एक 'मास्टर पीस' करार दिया है.
इस फिल्म को आमिर ख़ान की पत्नी किरण राव द्वारा प्रस्तुत किया गया है और इसके निर्देशक आनंद गांधी हैं जिनकी ये पहली फ़ीचर फ़िल्म है.
अगर एक जहाज़ की मरम्मत के दौरान उसके सारे पुर्ज़े बदल दिए जाएँ तो क्या वो जहाज़ असली बचता है या फिर कुछ और हो जाता है ?
इसी विरोधाभास के फ़लसफ़े की बात करती है ये फिल्म जिसमें तीन किरदारों की कहानी है जिन्हें अंग-दान के ज़रिए एक नया जीवन मिलता है लेकिन उसके बाद ही शुरू होती है उनकी ख़ुद से लड़ाई.
खुद से सवाल

मनुष्य के अस्तित्व पर सवाल करती ये फिल्म जटिल होने और बेवजह का संदेश देने से बची है और निर्देशक ने बेहद ही सादगीपूर्ण तरीके से अपनी बात कही है.
बीबीसी से बातचीत में आनंद कहते हैं "जो विरोधाभास ही आपको ये आभास कराता है कि दरअसल जीवन छोटे-छोटे कणों से और उनके आपसी रिश्तों से बना है और एक कण भी बदल जाए तो सब कुछ बदल जाता है. इस तरह हर एक क्षण एक नया जहाज़ जन्म लेता है."
अपने अनुभव के बारे में आनंद कहते हैं, "बचपन में सभी की तरह मेरे दिमाग़ में भी ये सवाल आते थे कि मैं कहां से आया हूं, क्या कर रहा हूं, क्या मेरे होने का कोई मतलब है या फिर मैं बस ऐसे ही हूं. व्यस्तता के बीच शायद हम इसका जवाब ढूंढ नहीं पाते हैं लेकिन सवाल तो बना ही रहता है."
टेलीविज़न से शुरुआत

32 वर्षीय आनंद गांधी हैं जिन्होंने उन्नीस साल की उम्र में अपने करियर की शुरुआत प्रसिद्ध सीरियल 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' से की थी जिसके साथ वो पहले एक साल तक जुड़े रहे.
आनंद के मुताबिक "उस वक्त मैं अपना हुनर हर तरह के साहित्य को देना चाहता था. मैं नाटक भी लिखता था, शॉर्ट फिल्म भी लिखी और इस प्रयोग के दौरान 'क्योंकि...' और 'कहानी घर-घर की' जैसे सीरियल भी लिखे."
मैं भी हूँ ज़िम्मेदार

हालांकि आनंद ने स्पष्ट किया कि वह भारतीय टेलीविज़न के मौजूदा स्वरुप से बहुत खुश नहीं हैं और इसके ज़िम्मेदार वह कहीं ना कहीं खुद को भी मानते हैं.
बीबीसी से बातचीत में आनंद कहते हैं, "हमारे यहाँ ऐसा टेलीविज़न बनता है जहाँ एक ही प्रकार के विचार को बार-बार ठूँसा जाता है. हाँ मैं मानता हूं कि शुरुआत मैंने ही की है और ये काम करते वक्त भी मुझे कहीं ना कहीं एहसास था कि ये दर्शकों के लिए हानिकारक है."
बात पूरी करते हुए आनंद ने कहा, "मैंने कोशिश भी की कि कुछ ऐसा बनाऊं जिससे मनोरंजन के साथ-साथ लोगों को कुछ गहरे अनुभव भी मिल सकें लेकिन किसी भी टीवी निर्माता को मैं कुछ नया करने के लिए मना नहीं सका. सबको वही 'क्योंकि...' वाला काम चाहिए था."
पहले पेट तो भरा हो
आनंद के मुताबिक बॉलीवुड मसाला फिल्मों के बीच कुछ अलग प्रस्तुत करना वाकई में एक चुनौती है.
क्या भारतीय दर्शक नए अनुभव और विचार के लिए तैयार है ? इस पर आनंद ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता को याद किया जो कहती है :
गोली खाने के बाद एक के मुंह से निकला राम,दूसरे के मुंह से निकला माओ,तीसरे के मुंह से निकला आलूपोस्टमॉर्टम की रिपॉर्ट कहती है कि पहले दो के पेट भरे हुए थे.
नए विचारों की बात हो सकती है जब पेट में कुछ हो, अभी सबको आलू नहीं मिला है.
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