टीवी पर्दे के पीछे दाग, गंदगी और तनाव

- Author, रोहन राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले दिनों टीवी अभिनेता अबीर गोस्वामी का सिर्फ 37 साल की उम्र में निधन हो गया था. अबीर जिम में व्यायाम कर रहे थे कि तभी दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुंचने के चंद लम्हों बाद ही उनकी मौत हो गई.
तब कई टीवी कलाकारों ने टेलीविजन इंडस्ट्री के तौर तरीकों पर सवाल उठाए थे और आरोप लगाया था कि यहां कलाकारों के लिए माकूल माहौल नहीं होता.
टीवी सीरियल बालिका वधू में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली कलाकार प्रत्यूषा बनर्जी ने इस धारावाहिक से हटने का फ़ैसला किया क्योंकि उनका मानना था कि लगातार काम करने की वजह से उनकी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था.

मीडिया में आई कई रिपोर्ट्स में टीवी कलाकारों ने शूटिंग के दौरान ख़राब परिस्थितियों, ख़राब खाना परोसे जाने और गंदगी की शिकायत की.
क्या वाकई टीवी उद्योग कलाकारों के लिए 'क्रूर' है. क्या लंबी-लंबी शिफ्ट में काम करने की वजह से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है? क्या डेली सोप में काम करने वाले कलाकारों को निर्माताओं और चैनलों की 'ज़्यादतियों' का शिकार होना पड़ रहा है?
चूंकि ज़्यादातर टीवी कार्यक्रमों का प्रसारण रोज़ाना होता है इसलिए इन कलाकारों से लगातार मशीन की तरह काम लिया जा रहा है.
गंदे सेट, घटिया खाना
'क्योंकि सास भी कभी बहू थी', 'कसौटी ज़िंदगी की' और 'अदालत' जैसे कई शो में काम कर चुके जाने-माने कलाकार रोनित रॉय ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "टीवी पर इतने ज़्यादा कार्यक्रम आ रहे हैं कि उससे काम करने की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. सेट पर जो आवश्यक साफ-सफाई होनी चाहिए, टॉयलेट साफ-सुथरे होने चाहिए, कलाकारों के आराम के लिए जो सुविधाएं होनी चाहिए. वो नहीं होता."
रोनित कहते हैं कि इतने ज़्यादा कार्यक्रम बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में स्टूडियो उपलब्ध नहीं है इसलिए ढेर सारे मेकशिफ्ट स्टूडियो बनाए जाते हैं जहां बारिश तक से बचने के लिए सुविधा नहीं होती.
<link type="page"><caption> (टीवी और सेहत)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2012/07/120716_tv_health_vv.shtml" platform="highweb"/></link>
टीवी कलाकार हितेन तेजवानी कहते हैं कि सेट पर कलाकारों को मुहैया कराया जाने वाला खाना उच्च स्तरीय नहीं होता. हितेन के मुताबिक, "खाना देने वाले लोगों के पैसे नहीं बढ़ाए जाते. तो एक समय के बाद वो खाने की क्वालिटी के साथ समझौता करना शुरू कर देते हैं. कई बार आधी पकी रोटियां होती हैं. चावल में स्टार्च मिला दिया जाता है, ताकि वो ज़्यादा मात्रा में दिखे और कम खाकर ही लोगों का पेट भर जाए."
हितेन तेजवानी और रोनित रॉय दोनों का कहना है कि इन्हीं वजहों से वो सेट का खाना पसंद नहीं करते और घर से खाना लेकर आते हैं.
सुविधाओं का अभाव

फिल्म और टीवी कलाकारों के हितों की देख-रेख करने वाली संस्था फ़ेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लायीज़ (एफडब्ल्यूआईसीई) के महासचिव दिनेश चतुर्वेदी कहते हैं, "फ़िल्म सिटी जैसे इतने बड़े और पुराने स्टूडियो तक में कलाकारों के लिए सुविधाएं नहीं होतीं. टॉयलेट गंदे पड़े रहते हैं. महिला कलाकारों के लिए कई बार चेंजिंग रूम नहीं होते. आग से बचाव के पर्याप्त उपाय नहीं होते."
<link type="page"><caption> (यूटीवी और डिज़्नी का करार)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2012/02/120201_disney_utv_sdp.shtml" platform="highweb"/></link>
दिनेश कहते हैं कि हालांकि उनकी संस्था के दखल के बाद अब स्थितियों में सुधार हो रहा है लेकिन अब भी काफी कुछ करने की गुंजाइश बाकी है.
दिनेश कहते हैं कि उनकी संस्था ये भी देखती है कि कलाकारों से एक शिफ्ट में 12 घंटे से ज़्यादा काम ना लिया जाए.
'हालात इतने भी बुरे नहीं'
हालांकि 'खिचड़ी', 'साराभाई वर्सेस साराभाई' और 'बा, बहू और बेबी' जैसे सीरियल के निर्माता जे डी मजीठिया की राय इस बारे में अलग है.

वो कहते हैं, "मैं मानता हूं कि सेट पर साफ़-सफ़ाई होना बहुत ज़रूरी है. लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि हालात इतने ख़राब हैं कि लोगों की सेहत ख़राब हो. काम करने के घंटे भी ऐसे नहीं होते कि आपकी ज़िंदगी के लेने के देने पड़ जाएँ. आपको अपने काम करने के घंटों के बीच अपने शरीर को सही तरीके से मैनेज करना आना चाहिए."
इस संबंध में हमने कई चैनलों से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन कोई भी हमसे बात करने को सहमत नहीं हुआ.
तो ज़रूरी नहीं कि टीवी पर आने वाले तमाम शोज़ में चमकदार साड़ियां पहने, गहरा मेकअप लगाए चमकते-दमकते चेहरों के पीछे की दुनिया भी इतनी ही ख़ूबसूरत हो. उसके पीछे की सच्चाई कुछ और है.












