
शारदा सिन्हा काफ़ी समय से लोकप्रियता के शिखर पर हैं
ऐसा बहुत कम होता है कि किसी व्यक्ति या कलाकार की पहचान उसकी कला से कुछ इस तरह से घुलमिल जाती है, कि दोनों की पहचान एक दूसरे के बिना अधूरी होती है.
बिहार की लोक संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने वाली लोक और शास्त्रीय गायिका शारदा सिन्हा ऐसी ही एक शख्स़ियत हैं, जिन्हें लोकगीतों से अलग नहीं किया जा सकता.
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शारदा कहती हैं कि उन्होंने कभी हिसाब नहीं लगाया था कि वे कितने सालों से गा रहीं है. उन्हें सिर्फ इतना पता है कि उन्होंने संगीत के साथ-साथ जीना सीखा है.
उनके मुताबिक संगीत को सीखने और सिखाने में उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुज़ारा है लेकिन आज भी खुद को संगीत का छात्र ही मानती हैं.
पिता और पति का साथ
शारदा सिन्हा का जन्म साल 1953 में बिहार के सुपौल के हुलास गांव में हुआ था, और वो पिछले 40 सालों से गायन कर रहीं हैं.
उनके पिता बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में अधिकारी थे और उन्होंने उनमें गायकी के गुण देखने के बाद उसे सींचने का फैसला किया.
पिता सुखदेव ठाकुर ने 55 साल पहले दूरदर्शिता दिखाते हुए उन्हें बाकायदा नृत्य और संगीत की शिक्षा दिलवानी शुरु कर दी और घर पर ही एक शिक्षक आकर शारदा सिन्हा को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देने लगे.
"लोगों को मेरी आवाज़ इसलिए भाती है क्योंकि मैं जो भी गाना गाती हैं उसमें पूरी तरह से डूब जाती हूं. चूंकि मैंने शास्त्रीय संगीत सीखा है इसलिए मेरे गायन में एक तरह का ठहराव है जो लोगों को अच्छा लगता है."
शारदा सिन्हा
शारदा सिन्हा ने सुगम संगीत की हर विधा में गायन किया, इसमें गीत, भजन, गज़ल, सब शामिल थे लेकिन उन्हें लोक संगीत गाना काफी चुनौतीपूर्ण लगा और धीरे-धीरे वो इसमें विभिन्न प्रयोग करने लगीं.
शादी के बाद इनके ससुराल में इनके गायन को लेकर विरोध के स्वर भी उठे लेकिन पहले पति का साथ, फिर बाद में सास की मदद से शारदा सिन्हा ने ठेठ गंवई शैली की गीतों को गाया.
शारदा सिन्हा के बाद भी कई लोकगायिकाएं आईं लेकिन किसी को वो पहचान नहीं मिल सकी जो शारदा जी को मिली और इसकी एक वजह इनकी ख़ास तरह की आवाज है जिसमें इतने सालों के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है.
शारदा की आवाज़ आज भी काफी खनकदार है और कशिश से भरी है जो किसी को बरबस आकर्षित कर लेती है.
उनके अनुसार, ''लोगों को मेरी आवाज़ इसलिए भाती है क्योंकि मैं जो भी गाना गाती हूँ उसमें पूरी तरह से डूब जाती हूँ, उसमें जीने लगती हूँ. चूंकि मैंने शास्त्रीय संगीत सीखा है इसलिए मेरे गायन में एक तरह का ठहराव है जो लोगों को अच्छा लगता है.''
शारदा सिन्हा के कार्यक्रमों की एक ख़ास बात ये होती है कि गाना गाते समय अपने दर्शकों से वो लगातार बातचीत करती रहती हैं.
इसकी वजह उन्होंने बताई कि कई बार ऐसे लोग सुनने चले आते हैं जिनमें संगीत सुनने का संस्कार नहीं होता, लोग संगीत को समझ कर सराहें इसलिए वो उनसे लगातार बात करती रहती हैं.
बिजली तार की हिचक

शारदा सिन्हा ने शास्त्रीय गायन सीखने के बाद लोकगीत को चुना
कई भोजपूरी और हिंदी फिल्मों में ग़ायिकी के जौहर दिखाने वाली शारदा सिन्हा ने हालिया रिलीज़ हुई अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में भी, ''तार बिजली से पतले हमारे पिया, ओ री सासु बता तूने ये क्या किया'' गाया है.
इस गाने के बारे में वो कहती हैं जब फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप और संगीतकार स्नेहा खानवलकर ने उनसे ये गाना गाने को कहा तो उन्हें खुशी तो बहुत हुई पर मन में हिचकिचाहट भी थी कि उन्हें ऐसा गाना गाना चाहिए या नहीं.
लेकिन जब स्नेहा ने उन्हें समझाया वे एक ख़ास तरह का शादी का गाना चाहती हैं जिसमें गायकी और लोकसंगीत पुट भी हों तो उन्हें लगा कि शायद ये भी एक नए तरह का प्रयोग होगा.
और इस गाने की सफ़लता ने एक बार फिर से शारदा सिन्हा की कलाकारी और गायकी को नई ऊंचाई दे दी.
शारदा सिन्हा को भारत सरकार की ओर से संगीत नाटक अकादमी, पद्मश्री, बिहार कोकिला सम्मान से विभूषित किया गया है.
वे वर्ष 2009 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग की ब्रांड एंबैसडर भी रही हैं.









