
फिल्मों में हिंसा का बदलता अंदाज़.
पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा में काफी कुछ बदला है. फिर वो हीरो हीरोइन का पेड़ के चक्कर लगाकर रोमांस करना हो या किसी इमोशनल सीन में रोना धोना हो, बदलाव दिख रहा है लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में है फिल्मों में हिंसा का बदलता अंदाज़.
गैंग्स ऑफ वासेपुर और डेल्ही बैली जैसी फिल्मों में असलियत को दिखाने का दावा करते हुए जिस तरह गालियों और गोलियों का दिल खोल कर प्रदर्शन किया गया है वो कहां तक सही है?
"मैं क्लीन फिल्में करता हुँ. मुझे मेरी पिक्चर में गाली-वाली देने की कोई जरुरत पड़ती नहीं है. ये मेरी तरह का सिनेमा नहीं है. मैं मानता हुं कि हमें ऐसी फिल्में करनी चाहिए जो सभ्यता और संस्कृति का ख़्याल रखें."
सलमान खान, अभिनेता
बॉक्स ऑफिस पर लगातार सुपरहिट फिल्म देने वाले अभिनेता सलमान खान का कहना है "देखो यार, मैं क्लीन फिल्में करता हुँ. मुझे मेरी पिक्चर में गाली-वाली देने की कोई जरुरत पड़ती नहीं है. ये मेरी तरह का सिनेमा नहीं है. मैं मानता हुं कि हमें ऐसी फिल्में करनी चाहिए जो सभ्यता और संस्कृति का ख़्याल रखें."
सलमान ने साफ किया कि वो गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्में अपने परिवार के साथ देखना पसंद नहीं करेंगे.
"कई बार तो लोगों को ये चिंता रहती है कि गालियों का दूसरों पर क्या असर पड़ेगा. मुझे लगता है खुद के लिए अगर इंसान जिम्मेदार रहे तो गालियां इतनी बुरी नहीं लगेंगी."
इसका जवाब देते हुए गैंग्स ऑफ वासेपुर के निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं "लोगों को एक ही तरह का सिनेमा देखने की आदत पड़ गई है. इसलिए जब वो इस तरह की हिंसा या गालियों को देखते हैं तो घबरा जाते हैं. कई बार तो वो इसलिए नहीं घबराते कि वो गालियां नहीं सुन सकते, बल्कि उन्हें ये चिंता रहती है कि दूसरों पर क्या असर पड़ेगा. मुझे लगता है खुद के लिए अगर इंसान जिम्मेदार रहे तो गालियां इतनी बुरी नहीं लगेंगी."
असलियत के करीब माने जाने वाले इस सिनेमा का समाज पर और खास तौर से युवाओं और बच्चों पर क्या असर हो रहा है इसके बारे में बात करते हुए मनोचिकित्सक सीमा शर्मा कहती हैं "इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि फिल्मों का हमारे समाज पर काफी प्रभाव पड़ता है फिर वो अच्छा हो या बुरा. मान लीजिए गैंग्स ऑफ वासेपुर में झारखंड के वासेपुर की सच्चाई दिखाई गई है लेकिन उस छोटे से हिस्से की असलियत जब बड़े परदे पर पूरा समाज देखेगा, उससे नकारात्मकता की प्रबलता ज्यादा बढ़ेगी."
सीमा के मुताबिक बच्चे ये सोचकर गालियां देंगे कि ये तो असल में भी होता है और अगर हम भी ऐसा करेंगे तो कोई गलती नहीं है.
वहीं फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी मानती हैं "हमारे पास कोई डाटा नहीं है जिससे ये साबित हो सके कि फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा से समाज पर कितना असर पड़ रहा है या जो हिंसा हम दिखा रहे हैं वो समाज से ही ली गई है. कई बार चीज़ो को स्पष्ट रुप से दिखाकर उसके पीछे के भाव इतने साफ हो जाते हैं कि उसका असर होना बंद हो जाता हैं."
अपनी फिल्मों में हिंसा और क्रूरता को बढ़ावा देने के आरोप का जवाब देते हुए निर्देशक अनुराग कश्यप भी ऐसा ही कुछ कहते हैं, "मैंने अपनी फिल्म में हिंसा को 'दबंग' या 'बॉडीगार्ड' जैसी फिल्मों की तरह ग्लैमराइज नहीं किया है, हिंसा दिखाते वक्त कोई बैकग्राउंड संगीत नहीं चलाया है और ये सब करके हमने लोगों के मन में हिंसा के प्रति विरक्ति पैदा करने की कोशिश की है."
बीबीसी के पाठकों ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर इस बहस में हिस्सा लिया. और अपनी अपनी राय रखी.
बीबीसी के एक पाठक पंकज कुमार कहते हैं, "अनुराग कश्यप कहते हैं कि गैंग्स में बहुत ज्यादा हिंसा है मैं अनुराग कश्यप से अनुरोध करता हूं कि वो समाज को ध्यान में रखकर फिल्में बनाएं."
एक और पाठक अश्विनी कुमार मानते हैं कि हिंदी फिल्मों में कुछ इस कदर भेड़चाल है कि गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद इस तरह की फिल्मों की लाइन लग सकती है.
लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि बॉलीवुड की आम मसाला फिल्मों से हटकर गैंग्स जैसी फिल्म बनाने के लिए अनुराग कश्यप को बधाई दी जानी चाहिए.
रोहित कुमार कहते हैं कि अनुराग ने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है.
वहीं अमित का मानना है कि अनुराग ने गैंग्स के जरिए अच्छा प्रयोग किया है और ऐसे प्रयोगों से नाक-भौं नहीं सिकोड़ना चाहिए.
देखना दिलचस्प होगा कि क्या समाज, सिनेमा में हो रही इस असलियत की गोलीबारी का निशाना बनेगा या इससे बचके निकल पाएगा.








