कैसे बनी भारत की पहली फ़िल्म

- Author, जयप्रकाश चौकसे
- पदनाम, लेखक और स्तंभकार
वर्ष 1914 भारत का वो दौर था जब मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और उसके बाद गु़लाम भारत में मानो एक क्रांति आ गई थी. ये वही साल था जब धुंडिराज गोविंद फाल्के नाम का एक शख़्स भी लंदन से मुंबई लौटा था.
इतिहास मोहनदास करमचंद गांधी को आज राष्ट्रपिता के तौर पर याद करता है तो धुंडिराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहेब फाल्के भारत में सिनेमा के पितामाह कहलाए.
<link type="page"><caption> भुला दिया दादा साहेब फाल्के को?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2010/04/100428_phalke_story_va.shtml" platform="highweb"/></link>
नासिक के पास त्रिंबकेश्वर नामक गांव में 30 अप्रेल 1870 को धुंडिराज गोविन्द फाल्के का जन्म हुआ.
उनकी उम्र करीब 41 वर्ष की रही होगी जब लक्ष्मी प्रींटिंग प्रेस की भागीदारी से उन्हें अन्यायपूर्ण ढंग से अलग कर दिया गया. उसके बाद वे दोपहर के वक़्त बगीचे में अपना टिफिन खोलकर भोजन करने जा रहे थे कि अखबार का एक टुकड़ा हवा में उड़कर उनके पास आ गिरा.
इसमें उन्होंने ‘द लाइफ आइफ़ क्राइस्ट’ नामक कथा फ़िल्म के प्रदर्शन का विज्ञापन देखा और शाम को आठ आने का टिकिट लेकर उन्होंने फिल्म देखी!
भारत को दी नई आवाज़
एक अंधेरे और अस्थायी से सिनेमाघर में द लाइफ आइफ़ क्राइस्ट’ फ़िल्म देखने के दौरान उनके मन में विचार कौंधा कि इस नए माध्यम के ज़रिए कृष्ण की कथा भारत में प्रस्तुत की जानी चाहिए.24 दिसंबर 1910 की यह शाम भारत में सिनेमा उद्योग की स्थापना के बीजारोपण की शुभ बेला मानी जाना चाहिए.
1912 को लंदन से फ़िल्म बनाने की प्रारंभिक शिक्षा, बिलियमसन कैमरा और रॉ स्टाक लेकर धुंडिराज गोविंद फाल्के बंबई वापस आए.
उन्होंने अपनी पत्नी सरस्वती के गहने बेचे और राजा हरिशचंद्र बनाई. तीन मई 1913 को मुंबई के कोरोनेशन सिनेमाघर में भारत की पहली कथा फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
सिनेमा के प्रथम प्रदर्शन पर इसे सदी के अजूबे की तरह प्रचारित किया गया था.
भारत में सिनेमा के इतने ज़्यादा लोकप्रिय होने की कल्पना किसी ने नहीं की थी पर धुंडीराज गोविंद फाल्के को कथा कहने की सिनेमा की शक्ति पर बहुत यकीन था क्योंकि भारत कथा वाचकों और श्रोताओं का अनंत देश है.
उन्हें लंदन में रहकर ही फिल्म बनाने का निमंत्रण मिला जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया. अगर वे लंदन का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते तो उन्हें वे सारे दुख और अभाव नहीं झेलने पड़ते जो उन्होंने भारत में रहकर सहे.
तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी फ़िल्मों के ज़रिए भारत में सिनेमा की ज़मीन तैयार कर चुके दादा साहेब फाल्के को इस बात का एहसास हो चुका था कि वे इतिहास रच रहे हैं.
( लेख का दूसरा भाग पढ़िए शनिवार को जहाँ जयप्रकाश चौकसे बताते हैं कि सिनेमा के जादूगर दादा साहेब का कैसे हुआ दुखद अंत)












