You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
हिंदी सिनेमा जितना पिछली सदी में बदला, उतना एक दशक में बदल गया
- Author, प्रदीप सरदाना
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
भारत में सिनेमा के 110 साल पूरे हो गए हैं. तीन मई 2013 को सिनेमा की एक सदी के पूरे होने पर बहुत विस्तार से समीक्षा हुई है. इसी दिन दादा साहेब फाल्के की फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' की स्क्रीनिंग हुई थी.
2013 से 2023 के दस बरसों में भारतीय सिनेमा में जितनी तेजी से बदलाव हुए हैं, उतने तेज बदलाव सिनेमा के 100 बरसों में किसी दशक में नहीं देखे गए. सिर्फ बदलाव ही नहीं, हिन्दी सिनेमा को इन पिछले 10 बरसों में जो चुनौतियाँ मिलीं, वो भी अभूतपूर्व हैं.
दिलचस्प यह है कि इन दस बरसों में हिन्दी सिनेमा को कुछ सफलताएँ भी ऐसी मिलीं कि वे भी सिनेमा के पहले के 100 बरसों में कभी नहीं मिल सकी थीं. आइए एक-एक करके नज़र डालते हैं इस दौर के बदलावों, कामयाबियों और चुनौतियों पर.
दिल्ली में पहला मल्टीप्लेक्स पीवीआर 'अनुपम' के नाम से जून 1997 में खुला था, लेकिन 2009 तक मल्टीप्लेक्स में 925 स्क्रीनें ही बन सकी थीं. फिल्म 'गजनी' की सफलता ने मल्टीप्लेक्स को अहमियत दी तो 2011 तक मल्टीप्लेक्स में 1225 स्क्रीनों की संख्या हो गई.
उधर 2010 में देश में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की संख्या 10 हज़ार के पार पहुँच गई थी लेकिन पिछले 10 बरसों में सिंगल स्क्रीन थिएटर इतनी तेज़ी से बंद हुए कि 2016 तक ही देश के चार हज़ार सिनेमाघर बंद हो गए.
जबकि आज तो स्थिति यह है कि देश में सिंगल स्क्रीन्स सिनेमाघर की संख्या पांच हजार से भी कुछ कम हो गई है.
उधर 2013 में देश में जहां 1500 मल्टीप्लेक्स स्क्रीन थीं, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 3200 पहुँच गई. जबकि अब देश में कुल 4000 से अधिक मल्टीप्लेक्स स्क्रीन हैं.
कोरोना से हिन्दी सिनेमा आईसीयू में
इन दस बरसों में हिन्दी सिनेमा को सबसे बड़ा झटका अप्रैल 2020 में तब लगा जब देश में कोरोना ने पाँव पसारने शुरू कर दिए.
वैसे तो कोरोना ने सिनेमा क्या, जीवन को ही हिलाकर रख दिया लेकिन 2020 और 2021 में कोरोना की दो बड़ी लहरों के बाद काम-काज धीरे धीरे पटरी पर लौटने लगा लेकिन हिन्दी सिनेमा अभी तक आईसीयू में है.
बीच में हिन्दी सिनेमा एक-दो बार आईसीयू से वार्ड में शिफ्ट हुआ लेकिन उसकी हालत रह-रह कर फिर बिगड़ रही है.
इस दौर में लगता है कि हिन्दी सिनेमा का स्वर्ण काल इतिहास में ही है. फिल्म 'गजनी' की अपार सफलता से 100 करोड़ रुपए का कलेक्शन करने वाले एक ऐसे युग की शुरुआत हुई थी, जिसे देख सिनेमा बिजनेस में एक नई चमक, एक नई क्रांति आ गई थी.
2013 के बाद तो 100 क्या 200, 300 और 400 करोड़ रुपए बटोरने वाली फिल्में भी खूब आने लगीं लेकिन अप्रैल 2020 के बाद से तीन बरसों में बड़ी मुश्किल से सात फिल्में अच्छी कमाई कर सकीं.
2020 के शुरू में अजय देवगन की फिल्म 'तानाजी' ने करीब 200 करोड़ रुपए कमाकर अच्छी शुरुआत की थी.
टाइगर श्रॉफ की एक और फिल्म 'बाग़ी-3' भी अच्छी ख़ासी चल रही थी लेकिन उसके बाद हिन्दी सिनेमा को ऐसा ग्रहण लगा कि अभी तक वह पूरी तरह ग्रहण मुक्त नहीं हो सका है.
कोरोना के कारण देश के सभी सिनेमा लगभग 19 महीने कभी पूरी तरह तो कभी आधे-अधूरे रूप में बंद रहे. इससे सिनेमा उद्योग बहुत बुरी तरह संकट में आ गया. जिससे फिल्म उद्योग के लगभग 60 प्रतिशत लोग आर्थिक रूप से बेहाल हो गए.
जब 19 महीने बाद जैसे-तैसे थिएटर खुलने शुरू हुए तो दर्शकों ने संकोच करते हुए थिएटर में जाकर फिल्म देखने का साहस बनाया.
इसके चलते अक्षय कुमार की 'सूर्यवंशी' अरसे बाद करीब करीब 200 करोड़ का बिजनेस करने में सफल हुई.
साथ ही, कपिल देव और 1983 के क्रिकेट वर्ल्ड कप पर बनी '83' भी थोड़ा चली लेकिन उसके बाद फिर कभी अंधेरा, कभी उजाला का खेल चलता रहा.
2022 में फिर से आशा की किरण तब जगी जब ब्रह्मास्त्र, दृश्यम-2, द कश्मीर फ़ाइल्स, भूल भुलइया-2, जुग जुग जियो और गंगुबाई काठियावाडी जैसी कुछेक फिल्मों को सफलता मिली, लेकिन इनके अलावा अधिकांश हिन्दी फिल्में धराशायी हो गईं.
इधर इस साल 'पठान' और 'तू झूठी मैं मक्कार' दो हिन्दी फिल्में सफल रही हैं. बाकी फिल्में टिकट खिड़की पर कोई कमाल नहीं कर सकी हैं. इसलिए मुंबइया फिल्म उद्योग निराशा के दौर से गुजर रहा है.
ओटीटी का नया युग
इस दशक में जो सबसे बड़ा बदलाव कहा जा सकता है वह है फिल्मों के लिए एक नया मंच 'ओटीटी' का आना. अपने ओटीटी अवतार से सिनेमा डिजिटल के नए युग में पहुँच गया है. जो कहीं सिनेमा के लिए वरदान है तो कहीं अभिशाप भी.
असल में कोरोना काल में लंबे अरसे तक थिएटर बंद होने के कारण जब फिल्में प्रदर्शित नहीं हो सकीं तो कई फिल्म निर्माता भी अवसाद के स्थिति भी आ गए.
फिल्में रिलीज ना होने से उनका फिल्मों में लगाया धन अटक गया, जिससे फिल्म निर्माण के लिए गए ब्याज पर ऋण और बढ़ने लगा. ऐसे में फिल्म का बजट भी बढ़ गया.
यह देखते हुए कुछ ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने फ़िल्मकारों को एकमुश्त राशि देकर अपनी फिल्म ओटीटी पर रिलीज करने को कहा. .
ओटीटी यूं कुछ बरस पहले ही देश में प्रवेश कर गया था लेकिन उस पर कुछ वेब सीरीज या वेब के लिए बनाई कुछ खास किस्म की छोटी फिल्मों की स्ट्रीमिंग हो रही थी.
पर जब कुछ फ़िल्मकारों ने आर्थिक समस्याओं में खुद को आकंठ डूबते देखा तो उन्होंने ओटीटी पर अपनी बड़ी और बड़े सितारों वाली फिल्में रिलीज करने का फैसला ले लिया.
जिससे सिनेमा उद्योग में डिजिटल का यह नया युग 12 जून 2020 को तब शुरू हुआ जब फिल्म 'गुलाबो सिताबो' रिलीज हुई.
अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की यह फिल्म अमेज़न प्राइम वीडियो ने दिखाई तो दर्शकों को यह अच्छी लगी. इसके बाद तो कई बड़ी फिल्में ओटीटी पर रिलीज होने लगीं.
इससे पहले सिनेमा के लिए थिएटर के अलावा टीवी भी एक प्लेटफॉर्म था, लेकिन अब तीसरा मंच डिजिटल भी आ गया है.
थिएटर इंडस्ट्री के लिए अभिशाप
ओटीटी निश्चय ही उन फिल्मों के लिए वरदान है जो फिल्में थिएटर के अभाव या पैसों की कमी के कारण रिलीज नहीं हो पाती थीं, लेकिन थिएटर उद्योग के लिए यह एक अभिशाप की तरह है.
इसलिए जब 12 जून 2020 को 'गुलाबो सिताबो' को ओटीटी पर रिलीज करने का फैसला लिया गया तो थिएटर उद्योग ने इसका विरोध किया.
फ़िल्मकारों से शिकायत की. उनका कहना था फिल्म निर्माताओं और थिएटर वालों का बरसों पुराना नाता रहा है लेकिन अब मुश्किल दौर में अपने फायदे के लिए हमारा साथ छोड़ रहे हैं.
हालांकि फिल्म निर्माताओं ने अपना फैसला नहीं बदला. यह सुखद है कि इसे अब नई और बड़ी फिल्म को थिएटर पर जाये बिना, घर बैठे भी देखा जा सकता है, इतनी ही नहीं यात्रा के दौरान भी इसका मजा लिया जा सकता है. लेकिन फिल्मों को थिएटर पर देखने का जो आनंद है, वह ओटीटी पर नहीं मिल सकता.
दक्षिण सिनेमा बना बड़ी चुनौती
देखा जाए तो हिन्दी सिनेमा और दक्षिण सिनेमा का साथ यूं काफी पुराना है. दक्षिण की बहुत सी फिल्मों पर हिन्दी रीमेक बनते रहे हैं.
दक्षिण के रजनीकान्त, कमल हासन जैसे कई सितारे हिन्दी फिल्मों में भी काम करते रहे हैं.
ऐसे ही हिन्दी फिल्मों के तमिल, तेलुगू आदि में भी रिमेक बने हैं. मुंबई के सितारे भी दक्षिण की फिल्मों में काम करते रहते हैं.
लेकिन इस बार समस्या तब हुई जब दक्षिण की फिल्में सिर्फ हिन्दी में डब होकर उत्तर भारत में रिलीज हुईं तो उन्हें बड़ी सफलता मिली.
ज़ाहिर है, इससे मुंबई फिल्म उद्योग के फ़िल्मकारों के पसीने छूटने लगे. अगर साउथ की फिल्में हिन्दी क्षेत्र में सिर्फ डब होकर कामयाब होने लगीं तो दक्षिण के फ़िल्मकारों की तो चांदी हो जाएगी और हिन्दी फिल्म बनाने वाले तो कहीं के नहीं रहेंगे.
'बाहुबली' ने बदली तस्वीर
दक्षिण की किसी हिन्दी डब फिल्म को पहली धुआँधार सफलता तब मिली जब 10 जुलाई 2015 को 'बाहुबली'-द बिगिनिंग' प्रदर्शित हुई.
फ़िल्मकार एसएस राजामौली की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ऐसी हिट हुई कि एक नया इतिहास रच दिया. फिल्म ने गजब धमाल तो किया ही, साथ ही अपनी इस एक फिल्म से ही अभिनेता प्रभास हिन्दी सिनेमा के भी नए सुपर स्टार हो गए.
सोने पर सुहागा तब हुआ जब 'बाहुबली-2,' 28 अप्रैल 2017 को प्रदर्शित हुई तो इस फिल्म ने पहले से भी कहीं ज्यादा सफलता पाई. जबकि यह भी पहली बार हुआ जब पहले भाग के अंत में फ़िल्मकार ने सवाल छोड़ दिया कि, "कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा"?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए दर्शक 21 महीने बेताबी से इंतज़ार करते रहे. जिसका जवाब 'बाहुबली-2' के रिलीज होने पर ही मिला.
'बाहुबली' जिस नई तकनीक और जिस शानदार ढंग से बनी उससे भारतीय सिनेमा तकनीक में काफी आगे बढ़ गया है. इससे यह संभावना भी बनी कि भारत सर्वाधिक फिल्म बनाने वाला देश ही नहीं, बेहतर फिल्में बनाने वाला देश भी बन सकता है, बशर्ते हमारी फिल्मों को हॉलीवुड की फिल्मों की तरह भारी भरकम बजट मिले.
असल में 'बाहुबली' फ्रेंचाइजी ने दक्षिण की डब फिल्मों के लिए ऐसे रास्ते खोले जिससे दक्षिण सिनेमा के तो पौ-बारह हो गए लेकिन हिन्दी सिनेमा के लिए यह एक नई और बड़ी चुनौती का संकेत भी था.
अभी 'पुष्पा' और फिल्म के नायक अभिनेता अल्लू अर्जुन की सफलता-लोकप्रियता की चर्चा चल ही रही थी कि 2022 में तो वह सब हो गया जो पहले किसी ने सोचा भी ना था. इस एक बरस में दक्षिण की जो भी फिल्में डब होकर हिन्दी में रिलीज हुईं उन सभी को रिकॉर्ड सफलता मिली.
केजीएफ चैप्टर-2, कार्तिकेय-2, रॉकेट्री, पीएस-1, कांतारा और आरआरआर दक्षिण की ऐसी ही फिल्में है. जिनके हिन्दी संस्करण ने उत्तर भारत में भी अपार सफलता पाई.
सितारों का टूटता तिलिस्म
पिछले एक दशक के बड़े बदलावों की बात करें तो एक यह है कि शाहरुख खान, आमिर खान और सलमान खान यानी तीनों खान सितारों का तिलिस्म अब टूटने लगा है.
शाहरुख खान को इस दशक में पहला बड़ा झटका 2015 में तब लगा जब उनकी 'दिलवाले' फ्लॉप हो गई. अगले साल उनकी 'फैन' भी नहीं चली.
2016 में 'डियर ज़िंदगी' कुछ औसत रही. 2017 में 'रईस' कुछ चली, लेकिन 'जब हैरी मेट सेजल' फ्लॉप रही. उधर 2018 में 'ज़ीरो' तो सुपर फ्लॉप साबित हुई. उसके बाद शाहरुख की चार साल तक मुख्य भूमिका वाली फिल्म नहीं आई.
भला हो 'पठान' का जिसने 2023 में सफलता पाकर फिलहाल तो शाहरुख की इज्ज़त बचा ली. उधर इस दशक में 'धूम-3' और 'पीके' जैसी सुपर हिट देने वाले आमिर भी 2017 के बाद सफलता के लिए तरस रहे हैं.
उनकी 2018 में अमिताभ बच्चन के साथ 'ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान' तो सुपर डुपर फ्लॉप हुई ही. 2022 में आई 'लाल सिंह चड्ढा' भी सुपर फ्लॉप रही.
बात सलमान की करें तो 2017 से उनकी 'ट्यूबलाइट' तो फ्यूज हुई ही. उसके बाद 'रेस-3' पहले जैसी सफलता नहीं पा सकी. यही हाल 'दबंग-3' का हुआ. जबकि 'भारत' और 'राधे' ज़रा भी नहीं चली.
हैरानी तब हुई जब कोरोना काल में, एक थिएटर में पूरे दिन का 'राधे' का कलेक्शन सिर्फ 550 रुपए था.
पहली बार मिला ऑस्कर अवार्ड
भारत को इस साल पिछले महीने तब एक बड़ी उपलब्धि मिली जब पहली बार हमारी दो फिल्मों को ऑस्कर मिला. एक दक्षिण की फिल्म 'आरआरआर' के एक गीत 'नाटू नाटू को और दूसरा डॉक्यूमेंटरी' 'द एलिफेंट व्हिस्परर्स' को.
असल में ऑस्कर तो भारतीय फ़िल्मकारों को पहले भी मिले हैं लेकिन यह पहला मौका था जब भारत में बनी किसी फिल्म को ऑस्कर मिला.
उधर इस दशक में हिन्दी सिनेमा को विदेशों में बड़ा बाज़ार मिलने में बड़ी सफलता मिली. जिसमें चीन तो भारतीय फिल्मों के लिए सोने की खान सा बन गया.
हालांकि कोरोना के बाद चीन में अब स्थिति बदली है, लेकिन उससे पहले चीन में कुछ हिन्दी फिल्मों ने तो भारत से भी कहीं अधिक, एक-एक हज़ार करोड़ रुपए का बिजनेस करके नए कीर्तिमान बनाए.
बायोपिक और सीक्वल का दशक
इधर इन पिछले दस बरसों को हम ध्यान से देखें तो इस दौरान जहां कई छोटी फिल्में बड़ी कमाई करने में सफल रहीं. तो मल्टीप्लेक्स के बढ़ने से उन फिल्मों के लिए भी रिलीज की राह आसान हो गई, जो फिल्में थिएटर या आर्थिक तंगियों के कारण डिब्बों में ही दम तोड़ देती थीं, लेकिन मल्टीप्लेक्स ऐसी फिल्मों के लिए संजीवनी बनकर उभरे.
उधर इस दशक में बायोपिक और सीक्वेल फिल्मों का ज़ोर रहा. ऐसी अधिकतर फिल्में चली भी खूब. इससे ऐसी फिल्में इस दशक का ट्रेंड बन गईं. बायोपिक फिल्मों की तो आंधी ही चलती रही. इन दस बरसों में करीब 70 बायोपिक या असली घटनाओं पर आधारित फिल्में बनीं.
मसलन, मैरी कॉम, भाग मिल्खा भाग, नीरजा, एम एस धोनी-द अंटोल्ड स्टोरी, अज़हर, सरबजीत, द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, वीरप्पन, मंटो, अन्ना, पीएम मोदी, छपाक, लक्ष्मी, ठाकरे, दंगल, संजू, 72 आवर्स, पद्मावत, केसरी, सायना, मौलाना आज़ाद, अलीगढ़, मणिकर्णिका-झांसी की रानी, पैड मैन, थलाइवी, सुपर-30, गुंजन सक्सेना, झुंड और रॉकेट्री.
ऐसे ही असली घटनाओं पर, उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक, द कश्मीर फ़ाइल्स, रुस्तम, एयर लिफ्ट, 83, पृथ्वीराज, तानाजी, मिशन मंगल, और द केरला स्टोरी.
कृष-3, धूम-3, आशिक़ी-2, बाहुबली, बाहुबली-2, रेस-2, रेस-3, बागी, बागी-2, बागी-3, तनु वेड्स रिटर्न्स, एबीसीडी, एबीसीडी-2, हाउसफुल-3, हाउसफुल-4, गोलमाल अगेन, ग्रांडमस्ती, ग्रेटग्रांड मस्ती, वैल्कम बैक, एक था टाइगर, टाइगर ज़िंदा है, दबंग-3, भूल भुलाइयाँ-2, दृश्यम और दृश्यम-2 सहित कुछ और सीक्वल भी इस कतार में हैं.
ऐसा लग रहा है कि मसाला फिल्मों से दर्शक तौबा करते नज़र आ रहे हैं. जिन फिल्मों में कोई कहानी नहीं होती. निर्माता सिर्फ मोटी कमाई के लिए फास्ट फूड की तरह उन फिल्मों में बिना सिर पैर के प्रसंग और गीत डालकर, दो हफ्तों में 100-200 करोड़ कमाने का सपना बुनते हैं.
इस दशक के पिछले दो बरसों में यह साफ़ हो गया है, दर्शक अब बेहूदा फिल्मों के निर्माताओं के जाल में नहीं फँसने वाले. अगर हिन्दी फिल्में अच्छी बनेंगी, तभी चलेंगी. वरना वे औंधे मुंह गिरेंगी. दर्शक ओटीटी पर फिल्में देखें या दक्षिण और हॉलीवुड का सिनेमा, पर वे बेकार फिल्में नहीं देखेंगे.
ये भी पढ़ेंः-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)