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मुज़फ़्फ़र अली: आशा भोंसले के 'मिस्टर हैंडसम', ख़य्याम के 'राजा साहब' की आत्मकथा में किन बातों का 'ज़िक्र'
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साठ के दशक में एक दिन अलीगढ़ के रेलवे स्टेशन पर तीसरे दर्जे के अनारक्षित (अनरिज़र्व्ड) डिब्बे से एक नौजवान उतरा. उनका नाम था मुज़फ़्फ़र अली.
उनके साथ काले रंग का एक ट्रंक था जिसपर सफ़ेद अक्षरों में लिखा हुआ था 'एम ए ज़ैदी'.
चलते वक़्त पिता ने उनसे मज़ाक किया था अगर कहीं दंगे वगैरह हो जाएं तो तुम्हारा नाम है 'मॉरिस अल्बर्ट ज़ैदी'.
तीसरे दर्जे में सफ़र करने की वजह थे संविधान सभा के सदस्य हसरत मोहानी, जो हमेशा महात्मा गांधी की तरह तीसरे दर्जे में सफ़र करते थे.
एक बार उनसे पूछा भी गया कि आप तीसरे दर्जे में क्यों सफ़र करते हैं तो उनका जवाब था, क्योंकि भारतीय रेल में कोई चौथा दर्जा नहीं है.
वे संसद भवन भी तांगा शेयर करके जाते थे. शुक्र है, मुज़फ़्फ़र अली के पिता राजा साजिद हुसैन ने उनसे रिक्शा शेयर कर विश्वविद्यालय जाने के लिए नहीं कहा.
मुज़फ़्फ़र अली बताते हैं कि अलीगढ़ में बिताए अगले कुछ साल उनकी ज़िंदगी के बेहतरीन साल थे. वो समय उनकी रचनात्मक यात्रा की रीढ़ की हड्डी था.
मुज़फ़्फ़र अली ने अपनी आत्मकथा ज़िक्र में इस ज़माने का बखूबी ज़िक्र किया है.
अलीगढ़ में राही मासूम रज़ा का जलवा
उस ज़माने के अलीगढ़ में राही मासूम रज़ा की तूती बोलती थी. बचपन में पोलियो हो जाने के कारण वे अपना पूरा पैर ज़मीन पर नहीं रख पाते थे.
उनको उस ज़माने में अलीगढ़ का लॉर्ड बायरन कहा जाता था और वो लॉर्ड बायरन से कम भी नहीं थे, जब वो तरन्नुम में अपना कलाम पढ़ते थे.
ऐ सबा तू तो उधर ही से गुज़रती होगी
उस गली में मेरे पैरों के निशाँ कैसे हैं
तो पूरा हॉल खड़े होकर उन्हें दाद देता था. लेकिन उसी वक़्त उनके पोलियोग्रस्त पैरों को निशाना बनाते हुए एक तीखी आवाज़ सुनाई देती थी "डेढ़".
ये आवाज़ होती थी मंज़र भाई की.
लेकिन राही पर इसका कोई असर नहीं होता था और वो अपना कलाम पढ़ते जाते थे.
पत्थरों वाले वो इंसान वो बेहिस दर ओ बाम
वो मकीं कैसे हैं शीशे के मकाँ कैसे हैं
जब राही ये पढ़ रहे होते थे तो हॉल में पिन ड्रॉप साइलेंस होती थी और मज़हर भाई को भी अपने दोस्तों से कहना पड़ता था, 'बाज़ी मार ली.'
मंज़र भाई शायरी के दीवाने थे. शायरी के ज़रिए ही उनकी वीमेंन्स कॉलेज की लड़कियों का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश होती थी. उनको उर्दू शायरों के अनगिनत शेर याद थे और वो उन्हें इस अंदाज़ में पढ़ते थे जैसे वो शेर उन्होंने ही लिखे हों.
मुज़फ़्फ़र अली बताते हैं कि वो हमेशा शेरवानी पहनते थे और अपने पायजामे को घुटनों से नीचे ही धोते थे. उनका तर्क था कि पूरा पायजामा धोने का क्या मतलब जब वो शेरवानी पहनने पर घुटनों से नीचे ही दिखाई देता है.
एयर इंडिया में 11 साल की नौकरी
अलीगढ़ के बाद कोलकाता की एक विज्ञापन एजेंसी से मुज़फ़्फ़र अली ने अपने करियर की शुरुआत की. वहीं उन्होंने आर्ट हिस्टोरियन गीति सेन से विवाह किया.
इसके बाद वे एयर इंडिया में असिस्टेंट स्टेशन मैनेजर होकर बंबई चले गए. वहाँ उन्होंने पाम स्प्रिंग्स में दो कमरे का फ़्लैट किराए पर लिया जिसका किराया उनकी तन्ख़्वाह से सिर्फ़ 150 रुपये कम था.
एयर इंडिया में मुज़फ़्फ़र अली ने पूरे 11 साल बिताए. ये वो ज़माना था जब एयर इंडिया की गिनती दुनिया की पाँच चोटी की एयरलाइंस में होती थी और बकौल मुज़फ़्फ़र अली एयर इंडिया में एयर होस्टेस बनना सिनेमा में स्टार बनने से कम नहीं होता था.
एयर इंडिया में रहते-रहते उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म 'गमन' बनाई. इस बीच गीति सेन से उनकी शादी टूटी और उन्होंने मशहूर कम्यूनिस्ट नेता सुभाषिनी सहगल से दूसरी शादी की.
अमिताभ बच्चन को बनाना चाहते थे 'गमन' का हीरो
मुज़फ़्फ़र अली बताते हैं कि 'गमन' का 'माध्यम' उन्हें कलकत्ता (अब कोलकाता) से मिला, 'प्रेरणा' अलीगढ़ से और 'आत्मा' अवध से.
'गमन' के टैक्सी ड्राइवर हीरो का रोल मुज़फ़्फ़र अमिताभ बच्चन को देना चाहते थे.
मुज़फ़्फ़र अली याद करते हैं, "कलकत्ता में काम करते समय मेरी अमिताभ से मुलाक़ात हुई थी. हम दोनों अक्सर एक ही तरह की पार्टियों में जाया करते थे. कभी-कभी वो अपनी हेरल्ड कार में मुझे लिफ़्ट दिया करते थे."
वो कहते हैं, "बंबई में जब मैंने उन्हें 'गमन' फ़िल्म की स्क्रिप्ट दी तो उन्होंने कहा कि वो इसे अपने कवि पिता हरिवंशराय बच्चन को पढ़ने के लिए देंगे. लेकिन एक महीने बाद उन्होंने मुझसे कहा, मुज़फ़्फ़र मैंने पिछले दिनों एक लड़ाके की इमेज बनाई है. मेरे नाम पर बहुत से लोगों का पैसा लगा है. मैं 'गमन' फ़िल्म करने का जोखिम नहीं उठा सकता."
मुज़फ़्फ़र अली बताते हैं, "इसके बाद बलराज साहनी के बेटे परिक्षित साहनी को इस रोल के लिए सोचा गया लेकिन आख़िर में ये रोल फ़ारूख़ शेख़ को गया. मैंने फ़ारूख को एम एस सथ्यू की फ़िल्म 'गर्म हवा' में देखा था और तभी मैंने तय किया कि वो मेरी पहली फ़िल्म के हीरो होंगे."
इसके बाद ड्राइवर ग़ुलाम की पत्नी ख़ैरुन निसा की तलाश शुरू हुई. इस रोल के लिए स्मिता पाटिल से बेहतर कोई नहीं था. लेकिन जब स्मिता ने पहली बार फ़िल्म की स्क्रिप्ट पढ़ी तो उन्होंने पूछा कि इसमें मैं कहाँ हूँ. इस पर मुज़फ़्फ़र ने जवाब दिया, 'आप इस फ़िल्म में हर जगह हैं.'
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने की 'गमन' की तारीफ़
इस फ़िल्म में काम करने के लिए किसी भी कलाकार को पांच हज़ार रुपये से अधिक पारिश्रमिक नहीं दिया गया और सभी कलाकारों ने ट्रेन के दूसरे दर्जे के स्लीपर में सफ़र किया.
इस फ़िल्म का प्रीमियर वहाँ की टैक्सी यूनियन की सहायता के लिए बंबई के इरोस सिनेमा में किया गया. वो देखने लायक दृश्य था जब टैक्सी ड्राइवरों का उनकी सवारियों के साथ इस फ़िल्म को देखने के लिए ताँता लग गया.
इसे देखने के लिए बंबई सेंट्रल से चर्च गेट तक टैक्सियों की लाइन लग गई.
फ़िल्म को दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए सातवें अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में 'सिल्वर पीकॉक' पुरस्कार मिला. सबसे बड़ी तारीफ़ मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने की.
उन्होंने कहा, "मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म 'गमन' सेल्यूलाइ़़ड पर कही गई कविता है. इस फ़िल्म के प्रवाह और अनुभूति ने हमारे आसपास की वास्तविकता को बेहतरीन ढंग से क़ैद किया है. कस्बे और देश में मानवीय परिस्थितियों की ख़ूबसूरती और जद्दोजहद ने इसे एक देखने लायक फ़िल्म बना दिया है.'
ख़य्याम को उमराव जान के संगीत के लिए चुना
मुज़फ़्फ़र अली की अगली फ़िल्म मिर्ज़ा मोहम्मद हादी रुसवा की कहानी पर बनी फ़िल्म 'उमराव जान' थी. ये कहानी 19वीं सदी के मध्य में एक नर्तकी की कहानी है जिसे फ़ैज़ाबाद के उसके घर से अग़वा कर एक तवायफ़ को बेच दिया जाता है. इस फ़िल्म की जान था इसका संगीत.
संगीत के लिए मुज़फ़्फ़र अली की पहली पसंद थे जयदेव जिन्होंने उनकी पहली फ़िल्म 'गमन' में भी संगीत दिया था.
मुज़फ़्फ़र अली याद करते हैं, "मुझे उनका कंपोज़ किया हुआ संगीत पसंद भी आया था. लेकिन कहीं कुछ चीज़ ग़ायब थी. जयदेव के साथ दिक्कत थी कि वो कतई लचीले नहीं थे और कुछ भी बदलने के लिए तैयार नहीं थे. आख़िर में मुझे उनसे कहना पड़ा कि हम लोग साथ काम नहीं कर पाएंगे."
वे कहते हैं, "उन दिनों फ़िल्म के गीतकार शहरयार मेरे घर पर ही ठहरे हुए थे. मुझे याद था कि मैं लखनऊ के अपने घर में फ़ुटपाथ फ़िल्म का तलत महमूद का गाना 'शाम ए ग़म की क़सम' बार-बार सुना करता था. उसके संगीतकार ख़्य्याम थे. उनके नाम पर हमारे ग्रुप में काफ़ी चर्चा होती थी."
उन्होंने बताया, "आख़िर में मैंने तय किया कि जयदेव की जगह ख़्य्याम 'उमराव जान' का संगीत देंगे. ख़्य्याम साहब के साथ काम करना भी इतना आसान नहीं था लेकिन मुझे भी बिना आक्रामक हुए जंगली घोड़ों पर काबू पाना आता था. ख़य्याम की पत्नी और मेरे बीच एक केमेस्ट्री थी. उन्हें पता लग जाता था कि मुझे काम पसंद नहीं आ रहा है. वो ये बात ख़य्याम तक पहुंचा देती थीं."
आशा भोंसले के 'मिस्टर हैंडसम'
ख़य्याम मुज़फ़्फ़र अली को 'राजा साहब' कह कर पुकारते थे. उनके साथ कई बैठकों के बाद गाने की धुन तैयार होती थी. तब जाकर वो गायक के पास पहुंचती थी. गायिका के तौर पर आशा भोंसले को लेने का फ़ैसला मुज़फ़्फ़र और ख़य्याम दोनों का था.
ख़य्याम को अंदाज़ा था कि सिर्फ़ आशा ही नग़मे को संगीत की ऊँचाइयों तक ले जा सकती थीं.
मुज़फ़्फ़र बताते हैं, "आशा बहुत मना करने के बावजूद मुझे 'मिस्टर हैंडसम' कहकर पुकारती थीं. शायद उनको ये ग़लतफ़हमी थी कि मैं फ़िल्मी दुनिया में अभिनेता बनने आया था और जब वहाँ दाल नहीं गली तो फ़िल्म निर्माता बन गया."
मुज़फ़्फ़र कहते हैं, "आशा मेरी पत्नी सुभाषिनी को 'सुंदरीजी' कह कर पुकारती थीं. जब गाना उनके सामने पेश किया जाता था तो वो सिर झुका कर ख़य्याम के निर्देश सुना करती थीं. फिर वो एक कागज़ पर बड़ा सा 'ओम' लिख कर पूरे गाने को अपने हाथों से उसपर लिखती थीं. इस फ़िल्म में हरिप्रसाद चौरसिया ने बाँसुरी बजाई थी और शिवकुमार शर्मा ने संतूर. कुछ दिनों बाद उन्होंने अपनी जोड़ी बना ली थी और उन्होंने यश चोपड़ा की फ़िल्म 'सिलसिला' में संगीत दिया था.''
रेखा बनीं 'उमराव जान' की नायिका
उमराव जान की हीरोइन के तौर पर रेखा को चुने जाने की भी दिलचस्प कहानी है.
मुज़फ़्फ़र अली बंबी के ताज होटल की बार्बर शॉप में अपने बाल कटने का इंतज़ार कर रहे थे. तभी उन्हें एक पत्रिका में एक महिला की सिर्फ़ आँखें दिखाई दीं. उन्हें देख कर उन्होंने तय किया कि उनकी हीरोइन की आँखें भी इसी तरह की होंगी.
मुज़फ़्फ़र, सुभाषिनी, शमा ज़ैदी, ख़य्याम और शहरयार और एस के जैन सबका मानना था कि बंबई फ़िल्म इंडस्ट्री में इस तरह की आँखें सिर्फ़ रेखा के पास हैं.
मुज़फ़्फ़र अली बताते हैं, "रेखा बाहर से जितनी सुँदर थीं अंदर से भी उतनी ही हसीन थीं. उन्होंने हर सीन को करने में अतिरिक्त मेहनत की. उन्होंने जो भी बोला या पहना अपनी आत्मा के भीतर से किया."
वे कहते हैं, "इस फ़िल्म में रेखा ने जैसा अभिनय किया, बंबई फ़िल्म इंडस्ट्री का कोई भी एक्टर उनकी बराबरी नहीं कर पाया. वो अपनी भूमिका को एक दूसरे स्तर तक ले गईं. उस ज़माने में रेखा एक फ़िल्म को डब करने में छह घंटे का समय लेती थीं. उन्हें पूरा विश्वास था कि वो हमारी फ़िल्म की डबिंग एक शिफ़्ट में पूरी कर लेंगी. लेकिन उन्हें हर फ्रेम में भावनाएं लाने के लिए पूरे दस दिन लग गए."
मुज़फ़्फ़र अली कहते हैं, "मेरे लिए महबूब स्टूडियो में बना फ़िल्म का सेट एक मंदिर की तरह था. मैं रोज़ सुबह सबसे पहले सेट पर पहुंचता और उसके फ़र्श पर झाड़ू लगाता और किसी को भी जूतों समेत सेट पर नहीं जाने देता."
'फिर न कहना हमें ख़बर नहीं हुई'
मुज़फ़्फ़र अली ने 'उमराव जान' की कुछ शूटिंग 'एयर इंडिया' की अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर की लेकिन एक समय ऐसा आया कि उन्हें एयर इंडिया से इस्तीफ़ा देना पड़ा. जब उमराव जान सन 1981 में लखनऊ में रिलीज़ हुई तो बहुत कम लोग उसे देखने गए.
मुज़फ़्फ़र के पिता राजा साजिद हुसैन ने नाराज़ होकर कहा, "लोगों के दिमाग़ में गोबर भरा है. एक पोस्टर बनाओ और उस पर लिखो, फिर न कहना हमें ख़बर नहीं हुई."
उनकी तसल्ली के लिए वाकई इस तरह को पोस्टर बनवा कर रातोंरात लखनऊ की दीवारों पर चिपकवाया गया. इसके बाद लोगों का इस फ़िल्म को देखना का जो सिलसिला शुरू हुआ वो रुका नहीं.
उमराव जान लखनऊ और भारत के कई हिस्सों में पूरे 25 हफ़्तों तक चली. इस फ़िल्म को कई पुरस्कार मिले और कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में इस फ़िल्म ने भारत का प्रतिनिधित्व किया.
रेखा को इस फ़िल्म में अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
आगमन और फिर ज़ूनी
उमराव जान के बाद मुज़फ़्फ़र अली ने गन्ना किसानों पर फ़िल्म 'आगमन' बनाई. इस फ़िल्म के डायलॉग मशहूर नाटककार असग़र वजाहत ने लिखे. मुज़फ़्फ़र ने सुरेश ओबरॉय को, जो कि अनुपम खेर से उम्र में बड़े थे, उनके बेटे मोहन के तौर पर पेश किया.
इस फ़िल्म में अभिनय करने के बाद ही अनुपम खेर को 'सारांश' फ़िल्म मिली जबकि बहुत से लोगों को ग़लतफ़हमी है कि अनुपम खेर की पहली फ़िल्म 'सारांश' है.
मुज़फ़्फ़र की सबसे महत्वाकाँक्षी फ़िल्म थी 'ज़ूनी' जो कश्मीरी कवियित्री हब्बा ख़ातून के जीवन पर आधारित थी.
इस फ़िल्म में मुज़फ़्फ़र ने विनोद खन्ना और डिंपल कपाड़िया को लिया. लेकिन कश्मीर में ख़राब हालात के कारण ये फ़िल्म पूरी नहीं की जा सकी.
इस बीच सुभाषिनी अली से मुज़फ़्फ़र के रिश्तों में दरार आनी शुरू हो गई. सुभाषिनी का अधिकतर समय राजनीति में बीतने लगा और वो कानपुर से चुनकर लोकसभा में गईं. इस बीच मुज़फ़्फ़र ने भी राजनीति में अपने हाथ आज़माए. उन्होंने चार बार चुनाव लड़ा.
एक बार लखनऊ से पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के ख़िलाफ़ और एक बार नैनीताल से उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के ख़िलाफ़, लेकिन हर बार उन्हें नाकामयाबी ही हाथ लगी.
मुज़फ़्फ़र ने स्वीकार किया कि वो लोगों के नज़दीक तो आए लेकिन कला से दूर होते चले गए.
इस समय मुजफ़्फ़र अपनी फ़ैशन डिज़ाइनर पत्नी मीरा अली के साथ दिल्ली के पास कोटवारा हाउज़ में रहते हैं.
मुजफ़्फ़र अली अपने चित्रकारी के पुराने शौक को उन्होंने छोड़ा नहीं है.
पुरानी कारें रखने और कुत्ते पालने का उनका शौक भी जारी है. उनके पास 15 कुत्ते हैं.
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