यशराज फ़िल्म्स: 50 सालों से सिनेमाई सपने का सौदागर

    • Author, सुंदरम आनंद
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सिनेमा स्टडीज़ की बाइबल समझी जाने वाली जेम्स मोनैको की किताब- 'हाउ टू रीड अ फ़िल्म' में लेखक ने हिंदी सिनेमा को एक भौगोलिक सिनेमा पट्टी से ज़्यादा शैलीगत सिनेमा माना है और इसे 'म्यूज़िकल मेलोड्रामा' जॉनर के अंतर्गत रखा है.

ऐसा नहीं है कि हिंदी सिनेमा जिसे हम बारहां बॉलीवुड कह देते हैं, वहां महज़ भावुकता से लबरेज़ फ़िल्में ही बनी हैं. लेकिन 'संगीत प्रधान भावुकता' उसकी विभेदक विशेषता है, इससे शायद ही कोई इनकार करेगा.

दिल को छू जाने वाले संगीत, मर्म को मोह जाने वाले भाव और 'प्लूटॉनिक' किस्म के रोमांस के ज़रिये मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने में जिन फ़िल्मकारों ने बड़ी भूमिका बनाई है, उनमें यश चोपड़ा सबसे आगे खड़े नजर आते हैं.

'यशराज फ़िल्म्स'

जिन फिल्मों से यश चोपड़ा बतौर निर्माता या निर्देशक जुड़े रहे उनमें 'भाव पक्ष' या कहें कि रोमांस केंद्र में रह है. कई साल पहले इंडिया टुडे से बात करते हुए उन्होंने कहा भी था- "रोमांस कभी न ख़त्म होने वाला फ़ैशन है."

सिने कला और क्राफ़्ट को लेकर उनकी यही सोच उनकी फ़िल्मों को सिनेमा से कहीं आगे ले जाकर एक 'स्टाइल' या 'ट्रेंड सेंटर' बनाती थी.

पचास के दशक में लाहौर में जन्में यश चोपड़ा का सफ़र अपने भाई बी.आर. चोपड़ा तथा मशहूर निर्देशक आई.एस. जौहर के असिस्टेंट के तौर पर शुरू हुआ. 1959 में उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म 'धूल के फूल' आयी.

इस फ़िल्म के लिए उन्हें जीवन का पहला फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला. इसके बाद बड़े भाई बी.आर.चोपड़ा के बैनर बी.आर. फ़िल्म्स के लिए 'धर्मपुत्र' (1961) और 'वक़्त' (1965) जैसी बड़ी फ़िल्में निर्देशित कीं.

1970 में उन्होंने स्वतंत्र रूप से काम करने का निर्णय लिया और इस तरह 'यशराज फ़िल्म्स' की नींव पड़ी.

'यशराज फ़िल्म्स' के बैनर के तले 1973 में पहली फ़िल्म 'दाग़' आई. राजेश खन्ना, राखी और शर्मीला टैगोर अभिनीत इस फ़िल्म ने अपने गीत, संगीत और भावुक कथानक के बूते सिने प्रेमियों को मोहित कर दिया था.

इसके बाद 1975 में यशराज बैनर की दूसरी फ़िल्म 'दीवार' आई. और रातों रात एक 'कल्ट' का दर्जा हासिल कर गई. उल्लेखनीय है कि 'ज़ंजीर' के ज़रिए अमिताभ बच्चन जिस 'एंग्री यंग मैन' की छवि के साथ सामने आए थे, उसे दीवार ने सत्तर के दशक के 'सिनेमाई ट्रेड मार्क' बना दिया.

दरअसल यहीं से यश चोपड़ा और उनके बैनर ने बुलन्दी की इबारत लिखनी शुरू की. इसके बाद यशराज की अगली फ़िल्म 'कभी-कभी' (1980) आई.

एक शायर की व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िंदगी की फ़ांक और उसमें मौजूद कशमकश को यश चोपड़ा ने एक संजीदा नक्काश की तरह परदे पर उकेरा. कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस फ़िल्म ने हिंदी सिनेमा में रोमांस कुछ उसी तरह पुनर्परिभाषित किया जिस तरह किसी ज़माने में धर्मवीर भारती के गुनाहों के देवता ने हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में किया था.

सही मायने में इसी फ़िल्म से ही यश चोपड़ा और उनकी फ़िल्म ने रोमांस को अपना सेंट्रल थीम बना लिया. 1981 में इनकी फ़िल्म 'सिलसिला' आई जिसमें प्रेम पारिवारिक ज़िम्मेदारी, विवाहेत्तर संबन्ध तथा सामाजिक संस्था के तौर पर विवाह को भाव-सूक्ष्म अंदाज़ में पर्दे पर दिखाया गया.

आर्थिक मानदण्डों पर यह फ़िल्म बेशक औसत रही पर अमिताभ-रेखा की केमिस्ट्री भाव-प्रवण गीत संगीत और दिलचस्प अंदाज़-ए-बयां ने इस फ़िल्म को बेमिसाल बना दिया.

इन दोनों फ़िल्मों के बीच यश चोपड़ा ने 1979 में 'चसनाला खदान दुर्घटना' (1975) पर आधारित सुपरहिट एक्शन ड्रामा 'काला पत्थर' भी बनाई थी. अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, परवीन बॉबी, रेखा, नीतू सिंह जैसे सितारों से सजी यह मल्टीस्टारर फ़िल्म अपने दौर की सबसे सफल फ़िल्मों में शुमार है.

नाकामयाबी का दौर भी आया

अस्सी का दशक यश चोपड़ा और यशराज फ़िल्म्स के लिए कुछ ख़ास नहीं रहा. उनके और उनके बैनर की फ़िल्म फेहरिश्त ने एक बार फिर 1989 में करवट ली. फ़िल्म थी चांदनी. ऋषि कपूर, विनोद खन्ना, श्रीदेवी, वहीदा रहमान जैसे सितारों की अदाकारी रूह को भिगो देने वाले संगीत और विषयवस्तु ने इस फ़िल्म को सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया.

चांदनी के बाद यशराज की अगली फ़िल्म आई, डर (1993). वैसे तो मुजस्सम दीवानगी में लिपटी मुहब्बत की इस पुरकशिश दास्तां में कई नामचीन सितारे थे लेकिन एक अपेक्षाकृत नए और युवा कलाकर को इस फ़िल्म ने हिंदी सिनेमा का सुपरस्टार बना दिया. वह कलाकार और कोई नहीं हिंदी सिनेमा में 'किंग' और बादशाह' जैसी उपाधियां पाने शाहरुख़ ख़ान थे.

इस फ़िल्म से ही शाहरुख़ ख़ान और यशराज फ़िल्म्स के बीच एक अटूट पर्याय सरीखा रिश्ता भी बन गया. यहाँ तक तो यशराज फ़िल्म्स हिंदी सिनेमा का न्यूमरो यूनों (एक नंबर) ब्राण्ड बन चुका था.

'ग्लोबल' यशराज

लेकिन 1995 में यश चोपड़ा के बड़े बेटे आदित्य चोपड़ा एनआरआई लड़के और लड़की के रोमांस को केंद्र में रखकर बुनी कहानी के साथ बतौर निर्देशक फ़िल्म की दुनिया में दाख़िल हुए. इस फ़िल्म ने हिंदी सिनेमा में सफलता के सारे कीर्तिमान को ध्वस्त कर दिए गोया यशराज फ़िल्म्स और बॉलीवुड को एक ग्लोबल ब्रांड बना दिया. वह फ़िल्म थी 'दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे'.

इस फ़िल्म की लोकप्रियता का आलम यह रहा की मुम्बई के मराठा मंदिर के सिनेमा हॉल में यह फ़िल्म हज़ार हफ़्ते से ज़्यादा लगी रही, राज और सिमरन भारतीय युवक-युवतियों की 'सामूहिक फ़ंतासी' के बिम्ब बन गए.

'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' ने जहाँ एक तरफ़ हिंदी सिने उद्योग को नयी 'वैश्विक' राह दिखाई. वहीं अभ्यंतर में इसने यशराज फ़िल्म्स को भी 360 डिग्री फ़िल्म प्रोडक्शन ब्राण्ड बना दिया.

पहले जहां यशराज फ़िल्म्स का दायरा फ़िल्म निर्माण तक सीमित था, वहीं अब यह धीरे-धीरे स्टूडियो, म्यूज़िक इंडस्ट्री, डिस्ट्रीब्यूशन सरीखे क्षेत्रों की ओर भी मुड़ा. हालांकि यश चोपड़ा इसके बाद भी निर्माता ओर निर्देशक के तौर पर जीवन पर्यन्त सक्रिय रहे लेकिन आदित्य चोपड़ा ने अपनी 'डक स्टाइल' सक्रियता और सूझबूझ से यशराज फ़िल्म्स को बहुआयामी विस्तार दिया.

साल 2000 के बाद से इस बैनर ने बड़ी संख्या में फ़िल्मों का निर्माण शुरू किया. आज के कई नामचीन निर्देशक और सितारे इसी बैनर के तले सिनेमा की दुनिया में दाख़िल हुए.

निर्देशकों की इस फ़ेहरिस्त में शाद अली, कुणाल कोहली,विजय कृष्ण आचार्य, सिद्धार्थ आनंद सरीखे नाम गिनाए जा सकते हैं. कलाकारों की लिस्ट में रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा, परिणीति चोपड़ा, अर्जुन कपूर आदि उलेखनीय हैं.

सांस्कृतिक आधिपत्य

आर्थिक सफलता के लिहाज़ से देखा जाए तो यशराज बैनर की फ़िल्में स्वयं सफलता के नए कीर्तिमान रचती हैं और अगली बार उसे ध्वस्त कर फिर से स्थापित हो जाती हैं.

यूरोप, अमरीका, दक्षिण-पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व, अफ़्रीका में बिखरे भारतीय प्रवासियों को इस बैनर ने केवल न नॉस्टेलजिक भाव के साथ जोड़ा है बल्कि एक कम्पोज़िट कंज़्यूमर बेस के रूप में भी परिभाषित किया है.

यश चोपड़ा की जीवनी लिखने वाले रसेल ड्वायर ने उनके बारे में लिखा है कि उनका (यश चोपडा) नाम एक ख़ास स्टाइल का प्रतिनिधित्व करता है, जो केवल फ़िल्म निर्माण तक सीमित नहीं है बल्कि वह भारत की संस्कृति पर भी असर डालता है.

उनका नाम रोमांस, ग्लैमर ओर सौंदर्य का पर्याय बन चुका है. इस संदर्भ में वो 'यश चोपड़ा वेडिंग' और 'यश चोपड़ा परिधान' जैसे लोकप्रिय ट्रेंड्स का हवाला भी देते हैं. आज यशराज फ़िल्म्स ने इस प्रभाव में ख़ासा विस्तार ही किया है.

हालांकि इस प्रभाव के चलते कई बार यशराज फ़िल्म्स की कार्यशैली, डिस्ट्रिब्यूशन के तौर-तरीक़ों को लेकर तर्क-वितर्क भी होते रहे हैं. आलोचकों का एक तबका सिनेमा उद्योग का कॉर्पोरेटिकरण 'कल्चर हेजेमनी', एकाधिकार वादी रणनीति के तौर पर देखता है और सिनेमा को 'कन्ज़्यूमर गुड्स' में बदलने वाला दृष्टिकोण घोषित करता है.

बीते दिनों सुशान्त सिंह राजपूत के असामयिक निधन के बाद मुम्बई फ़िल्म उद्योग में पसरे 'नेपोटिज़्म' पर चली बहस में भी कई बार यशराज फ़िल्म्स का नाम भी सामने आया है.

आगे की राह

तमाम विमर्शों ओर समालोचनाओं के साथ सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए आज यशराज फ़िल्म्स ने अपने 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं.

सिनेमा हॉल के सामूहिक मनोरंजन से लेकर ओ.टी.टी. प्लेटफ़ॉर्म के वर्तमान दौर में 'व्यक्तिगत आस्वादन' में परिणत होती सिने कला को इसने देखा है, बल्कि उसमें आगे बढ़कर सक्रिय भागीदारी भी की है.

एक युवा और उत्साही फ़िल्मकार की कल्पना से शुरू हुआ इसका सफ़र फ़िल्म उद्योग की बेताज बादशाहत से होता हुआ आज भारत की विदेश नीति के सांस्कृतिक लाभांश के एक अहम किरदार बनने तक जा पहुंचा है.

यशराज फ़िल्म्स की यह यात्रा मजरूह सुल्तानपुरी के उस शेर को जीवंत करता है, जिसे स्वयं यश चोपड़ा अक्सर सुनाया करते थे -

"मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया...."

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