You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
फ़िल्म इंडस्ट्री में पक्षपात पर क्या बोले ‘बाहरी कलाकार’
- Author, सुप्रिया सोगले
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी के लिए
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से ही भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में 'नेपोटिज़्म' और 'पक्षपात' पर बहस जारी है जिसने बहुत से कलाकारों और निर्देशकों के बीच मतभेद पैदा कर दिये हैं जो सोशल मीडिया के ज़रिये सामने आ रहे हैं.
सुशांत की मौत के तक़रीबन एक महीने बाद कंगना रनौत ने एक न्यूज़ चैनल को दिये इंटरव्यू में फ़िल्म इंडस्ट्री के कुछ दिग्गज निर्माता-निर्देशकों पर कुछ गंभीर आरोप लगाये जो कंगना के अनुसार सुशांत के आत्महत्या की वजह बनी.
इस विवादित इंटरव्यू में कंगना रनौत ने बताया है कि किस तरह फ़िल्मी दिग्गज नेपोटिज़्म और पक्षपात के ज़रिये बाहर से आने वाले प्रतिभावान अभिनेताओं के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल बनाते हैं ताकि वो करियर में आगे ना बढ़ पायें.
कंगना ने अपने साथ हुए पक्षपात को भी इंटरव्यू के दौरान साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे उनके बने हुए करियर को गिराने की कोशिशें की गईं.
कंगना रनौत के इस इंटरव्यू को वरिष्ठ अभिनेत्री सिमी गरेवाल का समर्थन मिला है.
सिमी ग्रेवाल ने एक ट्वीट के ज़रिये कंगना की बेबाकी को सराहा. सिमी उम्मीद करती हैं कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद इंडस्ट्री में चीज़ें बदलेंगी. वे कहती हैं, "मुझे कंगना के इंटरव्यू ने उदास कर दिया है. मैं परेशान हूँ कि सुशांत को कितना कुछ सहना पड़ा और कितने बाहरी लोगों को इससे गुज़रना पड़ता है. ये बदलना चाहिए."
सिमी ने लिखा है, "मैं कंगना की सराहना करती हूँ जो मुझसे ज़्यादा बहादुर और निडर है. सिर्फ़ मैं जानती हूँ कि किस तरह से एक शक्तिशाली व्यक्ति ने क्रूरतापूर्ण तरीक़े से मेरे करियर को बिगाड़ने की कोशिश की. मैं चुप रही क्योंकि मैं बहादुर नहीं थी."
'थोड़ी सहानुभूति तो रखिए'
भाई-भतीजावाद और पक्षपात की इस विवादित डिबेट पर फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना रहे कुछ बाहरी कलाकारों ने बीबीसी के समक्ष अपनी राय रखी है.
शैतान, गोलियों की रासलीला रामलीला, हंटर और कमांडो जैसी फ़िल्मों में अपना हुनर दिखा चुके गुलशन देवैया को हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में क़रीब एक दशक हो चुका है.
उन्होंने भी फ़िल्म इंडस्ट्री में पक्षपात का सामना किया है. वे कहते हैं, "बहुत सारे डायरेक्टरों को कई एक्टर्स के साथ काम नहीं करना है और उसके कई कारण हो सकते हैं. फ़िल्म इंडस्ट्री में लोग आलोचनात्मक हैं और कई बार दिल को ठेस पहुँचाने वाली बातें करते हैं, वो नहीं होना चाहिए."
"फ़िल्म इंडस्ट्री में प्रतिभा का कोई नापतोल नहीं हो सकता. बहुत कुछ अवधारणा पर निर्भर करता है. किसी के लिए कंगना बेहतरीन अभिनेत्री हैं, तो किसी के लिए दीपिका या आलिया भट्ट. सब सही भी है और ग़लत भी है क्योंकि ये तो सबकी निजी पसंद पर भी निर्भर करता है."
वे कहते हैं, "फ़िल्में निजी उद्यम हैं. आम जनता का पैसा तो लगता नहीं, तो वो किसी भी अभिनेता के साथ फ़िल्में बना सकते है."
गुलशन देवैया का कहना है कि कई अभिनेता सोशल मीडिया पर अपनी अच्छी तस्वीरें डालते हैं, सक्रिय रहते हैं, अवार्ड समारोहों में अच्छी गाड़ियों में बन-ठन कर जाते हैं ताकि फ़िल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों की नज़रों में बने रहें और उन्हें काम मिलता रहे.
गुलशन के अनुसार, "हम प्रतिभा पर चयन की डिमांड नहीं कर सकते क्योंकि फ़िल्म इंडस्ट्री की फ़ितरत ही ऐसी है. पक्षपात हर कोई करता है चाहे वो फ़िल्मी परिवार से हो या ना हो. बहुत लोगों के साथ हुआ है, मेरे साथ भी हुआ है."
मगर गुलशन को लगता है कि इंडस्ट्री में बड़े लोग थोड़ी सहानुभूति रखें तो स्थिति बदल सकती है.
वे कहते हैं, "कई बार निर्माता-निर्देशक बहुत कड़वी बातें कहते हैं. उन्हें शायद ध्यान नहीं रहता होगा कि अगला किस मनोस्थिति में है. पर थोड़ा ध्यान रखकर इसे बदला जा सकता है."
'लोग थोड़े निडर हों तो बदलाव संभव'
साल 2011 में मिस इंडिया बनीं अंकिता शोरे फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने क़दम जमाने की कोशिश कर रही हैं.
'द वर्ल्ड बिफ़ोर हर' नामक डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा रहीं अंकिता शोरे ने इस विवाद पर कहा, "नेपोटिज़्म एक गहरी समस्या है जिसे ढककर रखा गया है. ये हर जगह है, हर चीज़ में है. फ़िल्म इंडस्ट्री में थोड़ा ज़्यादा है. कोई इससे इनकार नहीं कर सकता. लेकिन सही प्रतिभा को तंग करना, नेपोटिज़्म के लिए किसी को ज़लील करना, कैसे सही माना जा सकता है. हर किसी को निष्पक्ष मौक़ा मिलना चाहिए. तभी तो माना जाएगा कि प्रतिस्पर्धा असली है."
क़रीब दो दशक से हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे प्रशांत नारायण जिन्होंने मर्डर-2 में बतौर विलेन काफ़ी वाहवाही बटोरी थी, वे इनसाइडर और आउटसाइडर की धारणा को ही ग़लत ठहराते हैं.
उनका कहना है, "अगर आपको अपना काम आता है, तो आपको मौक़ा मिलता रहेगा. ये पैसे के कारोबार पर निर्भर इंडस्ट्री है. सब यहाँ कमाई करना चाहते हैं. यहाँ किसी को अच्छी फ़िल्म नहीं बनानी है. किसी के लिए भी इस फ़िल्म इंडस्ट्री में बने रहना आसान नहीं है. नेपोटिज़्म तो इंसान की फ़ितरत है वो हर जगह है. मगर अपनी ताक़त के दम पर किसी के काम को छीनना ग़लत है."
अब तक क़रीब 50 फ़िल्में कर चुके प्रशांत नारयण कहते हैं, "नेपोटिज़्म और पक्षपात अभिनेता के फ़िल्मी सफ़र का हिस्सा हैं. आपको इसका सामना करना है और आगे बढ़ना है. किस्मत भी अच्छी होनी चाहिए. मुझे लगता है कि लोगो को डरना नहीं चाहिए. यहाँ फ़िल्म इंडस्ट्री में लोग इतने डरे हुए रहते है. आज अभिनेताओं के लिए इतने अवसर हैं कि किसी को किसी की ज़रूरत नहीं है. लोग थोड़ा निडर हो जायें तो ये नेपोटिज़्म शब्द ही निकल जायेगा."
'विरासत से नाम मिलता है, सफ़लता नहीं'
कंगना रनौत के इंटरव्यू पर टिपण्णी करते हुए फ़िल्म ट्रेड के विश्लेषक अतुल मोहन कहते हैं, "हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और हर किसी को अपने विचार रखने का हक़ है. इसलिए कंगना ने जो कहा, वो उनकी राय है और उन्हें अपनी बात कहने का हक़ है."
अतुल भी इस बात से इनकार नहीं करते कि फ़िल्म इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद और पक्षपात बहुत है, लेकिन वे कहते हैं कि 'सफ़लता हुनर पर निर्भर करती है.'
वे कहते हैं, "विरासत में नाम मिल सकता है, पर सफ़लता नहीं. कितने ही स्टार्स के बच्चे आये जो देखने में भी बढ़िया थे, पर एक्टिंग की प्रतिभा ना होने की वजह से चल नहीं पाये."
लंबे वक़्त से फ़िल्मों पर लिख रहे वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज भी फ़िल्म इंडस्ट्री में मौजूद भाई-भतीजावाद की बात को मानते हैं.
पर कंगना रनौत ने अपने इंटरव्यू में जिस तरह के दावे किये, वे उन्हें सही नहीं मानते.
उनका कहना है कि "आउटसाइडर को फ़िल्म इंडस्ट्री में शुरुआत में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उनके काम को अनदेखा किया जाता है और उन्हें महत्व नहीं दिया जाता. ये भेदभाव सिर्फ़ अभिनेताओं के साथ नहीं, बल्कि निर्देशकों के साथ भी हुआ है जिसका उदाहरण हैं तिग्मांशु धुलिया और अनुराग कश्यप. उनकी फ़िल्मों की रिलीज़ तक रोकी गई, उन्हें साइडलाइन किया गया."
कंगना के इंटरव्यू पर टिप्पणी करते हुए अजय ब्रह्मात्मज ने कहा, "कंगना ने पहले भी ये सब कहा है, पर एक आदमी को निशाना बनाना क्योंकि आपकी उनसे खुन्नस है, सही नहीं. आप सिस्टम को टारगेट कीजिये, आदमी को टारगेट करके कोई मतलब नहीं है. बार-बार करण जोहर को निशाना बनाने के उनके तरीक़े को मैं पसंद नहीं करता. इसी तरह बार-बार तापसी और स्वरा का नाम लिया जा रहा है. जबकि उन दोनों का संघर्ष भी कंगना से कम नहीं रहा है और दोनों को कोई बड़ी सफ़लता भी ज़रूर मिल जायेगी."
तापसी और स्वरा पर हमला
कंगना रनौत ने अपने इंटरव्यू में तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर को ज़रूरतमंद आउटसाइडर और बी-ग्रेड अभिनेत्री कहा था.
तापसी पन्नू और कंगना रनौत की बहन रंगोली के बीच कई बार ट्विटर पर नोक-झोक हुई है. कुछ वक़्त पहले रंगोली ने तापसी को कंगना की सस्ती कॉपी भी कहा था.
इस विवादित इंटरव्यू पर तापसी ने बिना कंगना का नाम लिये अपनी प्रतिक्रिया ट्विटर पर शेयर की. उन्होंने लिखा, "मैंने सुना क्लास-12 और 10 के नतीज़ों के बाद हमारा रिज़ल्ट भी आया है. हमारा ग्रेड सिस्टम अब ऑफ़िशियल हुआ? अभी तक तो नंबर सिस्टम से तय होता था ना."
सोशल मीडिया पर बेबाकी से अपने विचार रखने वालीं स्वरा भास्कर ने कंगना के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, "जरूरतमंद आउटसाइडर, बी-ग्रेड अभिनेत्री, लेकिन आलिया भट्ट और अनन्या की तुलना में बेहतर दिखने वाली और बेहतर कलाकार, मुझे लगता है कि यह एक तारीफ़ थी. थैंक्स कंगना. मुझे लगता है कि आप बहुत ख़ूबसूरत, उदार और महान अभिनेत्री हो."
इसके बाद भी तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर ने कंगना और इस विवाद को लेकर कई ट्वीट किये हैं.
अच्छे समय की उम्मीद
सुशांत सिंह राजपूत की क़रीबी दोस्त ऋचा चड्ढा ने सोशल मीडिया पर अपना ब्लॉग शेयर किया जिसमें उन्होंने सुशांत के साथ बिताये वक़्त को साझा किया.
उन्होंने इस ब्लॉग में फ़िल्म इंडस्ट्री के भाई-भतीजावाद से परे फ़िल्म इंडस्ट्री की जड़ समस्याओं के बारे में बात की.
जहाँ पूरी दुनिया फ़िल्म इंडस्ट्री को इनसाइडर और आउटसाइडर में बाँट रही है, वहीं ऋचा चड्ढा के मुताबिक़ फ़िल्म इंडस्ट्री दयावान और निर्मम लोगों के बीच बंटी हुई है.
उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे लोगों के दुखद वातावरण का वर्णन किया है.
उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री के काम करने के तरीक़े को फ़ूड चेन से जोड़ा है जिसमे उन्होंने कहा कि किस तरह यहाँ क्रूरता से लोग पेश आते हैं और किस तरह से लोगों का शोषण होता है.
उन्होंने मीडिया और पैपेरात्ज़ी कल्चर को भी एक हद तक दोषी ठहराया है.
ऋचा का कहना है कि इस महामारी के दौर में फ़िल्म इंडस्ट्री के कई लोग कई परेशानियों से गुज़र रहे हैं और कई लोग मदद कर रहे है.
उन्होंने लिखा है कि ये वक़्त हो सकता है फ़िल्म इंडस्ट्री के वातावरण में नए और अच्छे बदलाव ले आये जिसकी बहुत लोगों को उम्मीद है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)