सारा आकाश, रजनीगंधा और खट्टा मीठा जैसी फ़िल्में देने वाले बासु चटर्जी नहीं रहे

बासु चटर्जी

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    • Author, अजय ब्रह्मात्मज
    • पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी के लिए

फणीश्वरनाथ रेणु ने 'धर्मयुग' में 'तीसरी क़सम' की शूटिंग रिपोर्ट लिखी थी- 'तीसरी क़सम के सेट पर तीन दिन'.

इस रिपोर्ट में एक जगह वह लिखते हैं, 'इसी बीच असिस्टेंट डायरेक्टर बासु चटर्जी ने मेरे पास आकर धीरे से कहा, सर, चलिए ज़रा कैमरे के व्यू फाइंडर से आँख सटा कर देखिए, तब पता चलेगा कि गाड़ी में कैसा 'चंदा का फूल'..!

बासु चटर्जी असिस्टेंट डायरेक्टर के अलावा मुंबई के मशहूर कार्टूनिस्ट है, जो हर सप्ताह अपनी बांकी निगाह से दुनिया को देखता और दिखाता है. इसलिए उसकी किसी बात पर पहली बार गंभीरतापूर्वक मैं कभी ध्यान नहीं देता.

मैंने कहा, 'नहीं चटर्जी मोशाय.. मैंने जिस चश्मे से हीराबाई को देखा है, देख रहा हूं.'

तब चटर्जी मोशाय को यह कहना पड़ता है, चलून ना, एक बार देखून तो?'

रेणु की इन चंद पंक्तियों से ही बासु चटर्जी की शख्सियत की तस्वीर उभरती है, जो उनकी बातचीत, समझदारी और फ़िल्मों में बाद में दिखती है.

यही 'बांकी निगाह' अपनी मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि के साथ फ़िल्मों में आती है और हमें हिंदी सिनेमा का वह चितेरा फ़िल्मकार मिलता है, जो मध्यवर्गीय परिवार और परिजनों से घिरा रहा.

बासु चटर्जी ने अपने समय के लोकप्रिय सितारे अमिताभ बच्चन और जितेंद्र को भी पर्दे पर 'लार्जर दैन लाइफ़' नहीं होने दिया. अमिताभ बच्चन की 'मंज़िल' और जितेन्द्र की 'प्रियतमा' उदहारण हैं.

अजमेर में जन्म

बासु चटर्जी की पैदाइश राजस्थान के अजमेर शहर में हुई थी. पिता रेलवे में मुलाज़िम थे.

उनके साथ फिर मथुरा जाना हुआ. मथुरा और आगरा में बासु चटर्जी की पढ़ाई-लिखाई हुई. यहीं लेखक राजेंद्र यादव और कवी शैलेन्द्र से दोस्ती हुई.

दोनों फ़िल्मकार बासु चटर्जी के फ़िल्मी सफ़र के आरंभिक साथी बने. फ़िल्में देखने का शौक़ मथुरा में ही जागा था. शायद ही कोई फ़िल्म छूटती थी.

बड़े होने पर मन के किसी कोने पर फ़िल्म के बीज पड़ गए थे, जिसे अंकुरित होने में 15 सालों का समय लगा.

मुंबई में लाइब्रेरियन से शुरुआत

मथुरा में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद बासु आजीविका की तलाश में मुंबई आए. यहाँ एक मिलिट्री स्कूल में लाइब्रेरियन की नौकरी मिली.

पैर टिकाने की जगह मिलने के बाद अरमानों के पंख निकलने शुरु हुए.

बासु चटर्जी का संपर्क 'ब्लिट्ज़' के संपादक से हुआ और वे वहाँ पर पॉलिटिकल कार्टूनिस्ट हो गए. रेणु ने इसी कार्टूनिस्ट की 'बांकी निगाह' का उल्लेख अपनी शूटिंग रिपोर्ट में किया था.

1948 में मुंबई आ चुके बासु चटर्जी ने थोड़े समय तक ही लाइब्रेरियन का काम किया.

'ब्लिट्ज़' से जूडने के बाद उन्होंने वह ऊबाऊ नौकरी छोड़ दी.

'ब्लिट्ज़' में कार्टून बनाने का सिलसिला 15 सालों तक चला. आगरा के साथी शैलेन्द्र से मुंबई में संपर्क बना हुआ था.

फ़िल्म पोस्टर

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तीसरी क़सम से फ़िल्मों का सफ़र

शैलेन्द्र ने 1963 में जब रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी क़सम' पर फ़िल्म का निर्माण शुरु किया तो बासु ने फ़िल्म से जुड़ने की इच्छा जताई.

सोचा कि दोस्त की फ़िल्म के सेट पर फ़िल्म मेकिंग के गुर सीखने का मौक़ा मिलेगा.

दोस्ती और निर्माता होने के बावजूद शैलेंद्र ने कहा कि निर्देशक बासु भट्टाचार्य से मिल लो.

उनकी हां के बाद आ सकते हो. मुलाक़ात हुई तो कार्टूनिस्ट की समझदार और जागरुक पृष्ठभूमि की वजह से बासु भट्टाचार्य सहज ही तैयार हो गए.

'तीसरी क़सम' के बाद बासु चटर्जी ने गोविंद सरैया के साथ 'सरस्वतीचंद्र' में भी असिस्टेंट का काम किया.

दूसरी फ़िल्म व्यवसायिक दृष्टि से सफल रही और पहली फ़िल्म सुधी दर्शकों और आलोचकों के बीच सराही गई. दो फ़िल्मों में सहायक रहने के बाद बासु चटर्जी ने तय कर लिया कि अब वह ख़ुद निर्देशन करेंगे.

'जहाँ चाह, वहाँ राह'...

उन दिनों एफ़एफ़सी(आज की एनएफ़डीसी) ने युवा, नए और प्रयोगशील फ़िल्मकरों को फ़ाइनेंस करने का निर्णय लिया था.

'सारा आकाश' से ख़ुद बने निर्देशक

बासु चटर्जी ने मथुरा के दोस्त राजेंद्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' को चुना.

स्क्रिप्ट लिखी और जमा कर दी. मंज़ूरी भी मिल गई. राकेश पांडे, मधु चक्रवर्ती और एके हंगल मुख्य भूमिकाओं के लिए चुने गए.

'सारा आकाश' ढाई लाख रुपयों में बनी और रिलीज़ हुई.

साहित्य पर आधारित इस फ़िल्म को उस साल प्रदर्शित, चर्चित और कामयाब 'आराधना', 'दो रास्ते', 'एक फूल दो माली' और 'प्यार का मौसम' जैसी लोकप्रियता नहीं मिली, लेकिन उसी साल प्रदर्शित 'सात हिंदुस्तानी' की तरह 'सारा आकाश' का हिंदी फ़िल्म के इतिहास में दूरगामी असर रहा.

पहली ने हिंदी फ़िल्मों की मुख्यधारा के सितारे अमिताभ बच्चन को जन्म दिया तो दूसरी 'न्यू वेभ की नींव बनी. न्यू वेभ, पैरेलेल सिनेमा, आर्ट सिनेमा जिस तिपाये पर टिकी और आगे बढ़ी, उनमें मृणाल सेन की 'भुवन शोम; और मणि कौल की 'उसकी रोटी' के साथ बासु चटर्जी की 'सारा आकाश' शामिल है.

'सारा आकाश' ने मुख्यधारा की चालू, लार्जर दैन लाइफ़ और घिसी-पिटी फ़ॉर्मुलों की फ़िल्मों से अलग राह दिखाई.

इस लिहाज़ से बासु चटर्जी पायनियर निर्देशक हैं. आगे चलकर उन्होंने 'रजनीगंधा', 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'बातों बातों में', 'खट्टा मीठा' और 'स्वामी' जैसी फ़िल्मों से मिडिल सिनेमा की राह प्रशस्त की.

बासु चटर्जी की फ़िल्मों में मृणाल सेन और मणि कौल की आगामी फ़िल्मों का 'कला' आग्रह नहीं है.

सारा आकाश

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मध्यवर्गीय सपनों को फ़िल्मी पर्दों पर दी जगह

वह मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, दुविधाओं और सपनों की कहानियां लेकर फ़िल्मों में आये.

मध्यवर्गीय परवरिश, सोच और विश्वदृष्टि ही बासु चटर्जी को परिचालित करती रही.

अपनी फ़िल्मों के बारे में बातें करते हुए वे हमेशा यही कहते थे कि मैं निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आता हूं.

उन परिवारों के चरित्रों की आशा-निराशा को अच्छी तरह जानता हूं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर मेरी फ़िल्मों में मध्यवर्गीय चरित्र ही होते हैं.

हिंदी फ़िल्मों के प्रचलित हीरो की अविश्वसनीय मर्दानगी मेरी समझ में नहीं आती.

बासु चटर्जी की फ़िल्मों के नायक और नायिका मध्यवर्गीय समाज और परिवार में आज भी दिखाई देंगे.

यूँ लगता है कि सीधे जीवन से वे पर्दे पर आ गए हैं.

'सारा आकाश' के नायक समर(राकेश पांडे) और नायिका प्रभा (मधु चक्रवर्ती) के बीच लंबे समय तक अबोला रहता है.

समर को लगता है कि उसे पारिवारिक ज़रूरतों की वजह से एक अनचाहे रिश्ते में बांध दिया गया है, जो उसकी ज़िंदगी की बाड़ बन गई है.

वह अपने दोस्तों से कहता भी है कि 'इन्हीं बाड़ों को कुचल कर हमें आगे बढ़ना होगा'.

'पिया का घर' में छोटे घर की ज़िंदगी में कसमसाते राम शर्मा(अनिल धवन) और मालती शंकर(जाया भादुड़ी) के दांपत्य की अड़चनों और अंतरंगता को बख़ूबी दिखाया गया है.

'पिया का घर' राजा ठाकुर जी मराठी फ़िल्म 'मुंबईचा जंवाई' की रीमेक थी.

मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' प्रेमत्रिकोण का मध्यवर्गीय संदर्भ लेकर आती है.

फ़िल्म में नायिका दीपा की भूमिका में विद्या सिन्हा ने प्रचलित हिंदी फ़िल्मों की नायिका से एक अलग छवि पेश की थी.

प्रेमत्रिकोण भी नया था. दीपा(विद्या सिन्हा),नवीन(दिनेश ठाकुर) और संजय(अमोल पालेकर) के बीच का प्रेमत्रिकोण मध्यवर्गीय रोमांस, उम्मीद, स्मृतिदंश को बारीकी से पेश करता है.

इस फ़िल्म में योगेश के गीतों ने मध्यवर्गीय यथार्थ को भावभीनी तरलता और गहराई दी थी.

उनकी 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'खट्टा मीठा' और 'स्वामी' जैसी फ़िल्मों के विषय और चरित्रों की विस्तार में चर्चा की जा सकती है.

इन सभी फ़िल्मों में बासु चटर्जी की कोशिश रही है कि वह हिंदी फ़िल्म के 'बालकोनी (शिक्षित और मध्यवर्गीय) दर्शकों को क़रीबी अनुभव और मनोरंजन दे सकें.

गुलज़ा

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बासु चटर्जी, हृषीकेश मुखर्जी और गुलज़ार

बासु चटर्जी, हृषीकेश मुखर्जी और गुलज़ार हिंदी फ़िल्मों के 'मिडिल सिनेमा' के दर्शकों को अपनी फ़िल्मों से लुभाते रहे, उन्होंने कमर्शियल मेनस्ट्रीम सिनेमा और आर्टसिनेमा के बीच दर्शकों को रोचक मनोरंजन की ज़मीन दी.

प्रलोभनों और अवसरों के बावजूद वे तीनों इसी ज़मीन पर नई नई फ़िल्में रचते रहे.

उन्होंने पॉपुलर सितारों को कुछ नया और सार्थक करने का अवसर दिया. तुलनात्मक अध्ययन के शौक़ीन हृषीदा और बासु चटर्जी के बीच प्रतिद्वंदिता की बातें करते हैं. बासु चटर्जी ने ऐसी तुलनाओं से हमेशा परहेज़ किया और हृषीदा को वरिष्ठ फ़िल्मकार का सम्मान दिया.

बासु चटर्जी की ज्यादातर फ़िल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित हैं.

वे कहानियां साहित्य से लेते थे. उनकी पटकथा फ़िल्म के हिसाब से तैयार करते थे.

पहली फ़िल्म 'सारा आकाश' मूल उपन्यास की आधी कथा पर ही बनी थी. मूल से यह बदलाव उनकी बाद की फ़िल्मों में भी दिखाई देता है, लेकिन कभी किसी लेखक से मनमुटाव नहीं हुआ.

बासु चटर्जी हिंदी फ़िल्मों के वाहिद फ़िल्मकार हैं, जिनका साहित्य और साहित्यकारों से जीवंत संबंध रहा.

उनकी फ़िल्मों के के साथ उनकी फ़िल्मों के गीत-संगीत को भी ध्यान से पढ़ना चाहिए.

उन्होंने किरदारों के मनोभावों को व्यक्त करने वाले गीत चुनें. उनकी फ़िल्म 'खट्टा मीठा' का गीत 'थोड़ा है थोड़े की ज़रुरत है' तो मिडिल क्लास का एंथम बन चुका है.

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

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    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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