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ऋषि कपूर: बॉबी के राजा से मुल्क के मुराद अली मोहम्मद तक
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ऋषि कपूर जन्मजात अभिनेता थे. कहा जाता है कि अभी उन्होंने चलना शुरू ही किया था कि वो आइने के सामने जाकर तरह तरह की शक्लें बनाया करते थे.
कपूर ख़ानदान की महफ़िलों में ये कहानी अक्सर सुनाई जाती है कि उन्हीं दिनों एक शाम राज कपूर ने अपने बेटे को अपनी व्हिस्की के गिलास से एक सिप शराब पिलाई और ऋषि ने शीशे के सामने जाकर एक शराबी का अभिनय करना शुरू कर दिया था.
ऋषि के अभिनय की शुरुआत उनके बचपने से ही हो गई थी. उनके दादा के नाटक 'पठान' में खटिया पर जो बच्चा सोया हुआ दिखाई देता था वो और कोई नहीं ऋषि कपूर थे.
मेरा नाम जोकर ने दिलवाया राष्ट्रीय पुरस्कार
जब वो मुंबई के कैम्पियन स्कूल में पढ़ रहे थे, उनके पिता राज कपूर ने अपनी आत्मकथात्मक फ़िल्म मेरा नाम जोकर में उन्हें अपने बचपन का रोल दिया. जब ऋषि शूटिंग के लिए स्कूल नहीं जाते थे तो उनके अध्यापकों को ये बात बहुत अखरती.
नतीजा ये हुआ कि उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया और राज कपूर को अपने बेटे को दोबारा स्कूल में दाख़िल कराने के लिए एड़ी चोटी को ज़ोर लगाना पड़ा. वैसे कपूर ख़ानदान में इस तरह स्कूल छुड़वाकर अभिनय करवाने की पुरानी परंपरा रही है. राज कपूर के भाई शम्मी कपूर ने भी अपनी पढ़ाई छोड़ कर शकुंतला फ़िल्म की शूटिंग शुरू कर दी थी.
इस फ़िल्म के लिए ऋषि कपूर को सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में लिखा था, "जब मैं मुंबई लौटा तो मेरे पिता ने उस पुरस्कार के साथ मुझे अपने दादा पृथ्वीराज कपूर के पास भेजा. मेरे दादा ने वो मेडल अपने हाथ में लिया और उनकी आँखें भर आईं. उन्होंने मेरे माथे को चूमा और भरी हुई आवाज़ में कहा, 'राज ने मेरा कर्ज़ा उतार दिया.''
अभिनय की ज़बरदस्त रेंज
70 और 80 के दशक से ही चिंटू की इमेज जर्सी पहने, गाना गुनगुनाते, एक हाथ में गिटार और दूसरे हाथ में एक हसीन लड़की लिए कासानोवा की बन गई थी.
अपने अभिनय करियर के आखिरी चरण में कहीं जा कर उन्होंने इस इमेज से छुटकारा पाया था और वो अलग-अलग तरह के कई किरदारों में दिखाई पड़े थे.
हम-तुम (2004 ) का रूठा हुआ पति हो या फिर स्टूडेंड ऑफ़ द इयर (2012) का चंचल अध्यापक हो या फिर डी-डे (2013 ) का डॉन या अग्निपथ (2012) का दलाल या फिर कपूर एंड संस (2016) का 90 साल का शरारती बूढ़ा हो, ऋषि कपूर ने विविधता के नए आयाम कायम किए थे.
मुल्क फ़िल्म में उनके एक नेशनलिस्ट मुस्लिम के रोल ने पूरे भारत को हिलाकर रख दिया था.
बॉबी से राष्ट्रीय पहचान
राज कपूर की फ़िल्म बॉबी में ऋषि को पहली बार राष्ट्रीय पहचान मिली थी. राज कपूर ने इस फिल्म में अपने बेटे को एक ऐसी इमेज में ढाला जिसने कम से कम अगले दो दशकों तक उनका साथ नहीं छोड़ा.
राज कपूर की ख़ासियत थी कि वो बदलते हुए वक़्त की माँग को पहचानते थे.
बॉबी में उन्होंने ऋषि कपूर को ओवरसाइज्ड सनग्लासेज़ पहनाए. उनके स्कूटर का हैंडल कुछ ज़्यादा ही लंबा था और उसके दोनों तरफ़ साइड मिरर लगे हुए थे जिसमें उनके बेटे का चेहरा दिखाई दे रहा होता था.
वो स्कूटर भारत के बदलते हुए मूल्यों की नुमाइंदगी करता था और ताज़गी, ऊर्जा और आधुनिकता का प्रतीक था.
एक सीन का 9 बार रीटेक
इस फ़िल्म में ऋषि कपूर से बेहतरीन काम लेने के लिए उनके पिता ने कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी.
ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में लिखा था, "कैमरा रोल होने से पहले मेरे पिता मुझे इतना रिहर्सल करवाते थे जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. उस फ़िल्म में अचला सचदेव मेरी माँ बनी थीं. मैं उनके साथ फ़िल्माए गए उस दृश्य को कभी नहीं भूल सकता वो मेरे गाल पर कई थप्पड़ रसीद करती हैं. पापा ने उनसे कहा कि आपको सीन को जानदार बनाने के लिए चिंटू को ज़ोरदार थप्पड़ मारना होगा. उन्होंने इस सीन का नौ बार रीटेक लिया और जब सीन ओके हुआ मेरा गाल नीला पड़ चुका था और मेरे आँसू थम ही नहीं रहे थे."
'नेशनल स्वीटहार्ट' बने
1973 में जब बॉबी रिलीज़ हुई तो उसने पूरे भारत में तहलका मचा दिया. ऋषि कपूर जहाँ भी जाते उन्हें रॉक स्टार की तरह घेर लिया जाता.
उनको 'नेशनल स्वीटहार्ट' कहा जाने लगा. इसके बाद ये रोल उनकी आने वाले कई फ़िल्मों के लिए एक तरह से ब्लू - प्रिंट बन गया. डिंपल कपाड़िया के साथ बनी उनकी जोड़ी फ़ौरन टूट गई क्योंकि डिंपल ने राजेश खन्ना से विवाह कर लिया.
1974 में चिंटू ने नीतू सिंह के साथ अपनी पहली फ़िल्म ज़हरीला इंसान की. पूरे देश ने इस जोड़ी को हाथों- हाथ लिया. इसके बाद इन दोनों ने खेलखेल में, रफ़ूचक्कर और ज़िदादिल जैसी फ़िल्में की.
सत्तर के दशक में सेक्स, हिंसा और एक्शन का युग होने के बावजूद ऋषि कपूर की 'लवर ब्वॉय' की इमेज को कोई धक्का नहीं लगा. ये तब था जब 'एंग्री यंगमैन' अमिताभ बच्चन की हर जगह तूती बोल रही थी.
ऋषि कपूर के साथ कई अभिनेत्रियों ने या तो अपने करियर की शुरुआत की या फिर उनके साथ की गई फ़िल्म उनके करियर को कहीं ऊपर ले गई. काजल किरण (हम किसी से कम नहीं), शोमा आनंद (बारूद), जया प्रदा (सरगम), नसीम (कभी-कभी), संगीता बिजानी (हथियार) और पाकिस्तानी अभिनेत्री ज़ेबा बख़्तियार (हेना) की पहली बड़ी फ़िल्म के लीड हीरो ऋषि कपूर ही थे.
नीतू सिंह से शादी
नीतू सिंह की ऋषि कपूर से जब पहली मुलाक़ात हुई तो वो सिर्फ़ 14 साल की थीं. बाद में नीतू सिंह ने मधु जैन को दिए गए इंटरव्यू में कहा था, "उस ज़माने में चिंटू की कई गर्लफ़्रेंड हुआ करती थीं. वो फ़ोन पर उनसे मेरी बात किया करते थे. कभी कभी मैं उनकी तरफ़ से उनको फ़ोन करती थी. जब मैं 17 साल की थी तो उन्होंने पहली बार मुझे कहा कि वो मुझे 'मिस' करते हैं. मैंने कहा कि क्या बकवास कर रहे हो तो उन्होंने अपना जूता उतार कर मुझे दिखाया था कि उन्होंने अपनी उंगलियों को 'क्रॉस' नहीं कर रखा है. जब मैं 18 साल की थी तो उन्होंने मुझे एक चाभी दी थी और उसे ये कह कर मेरे गले में पहना दिया था कि ये मेरे दिल की चाबी है. (अगर आप दीवार फ़िल्म को ग़ौर से देखें तो नीतू सिंह अपने गले में यही चाबी पहने दिखाई देती हैं.)"
नीतू सिंह ने उन्हें नाम दिया था 'बॉब'
नीतू सिंह ने आगे बताया था, "एक बार ताज होटल में खाना खाने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा था क्या तुम शादी नहीं करना चाहती? मैंने कहा था हाँ लेकिन किससे करूँ? ऋषि ने बहुत मासूमियत से कहा था मुझसे और किससे' चिंटू को नीतू सिंह हमेशा बॉब कह कर पुकारती थीं."
नीतू सिंह ने एक बार लिखा था कि "ऋषि कपूर बहुत जलनख़ोर थे. मुझे पता है कि मैं किसी के बहुत नज़दीक नहीं जा सकती, क्योंकि चिंटू फ़ौरन बुरा मान जाते हैं. यहाँ तक कि मेरे बेटे रनबीर से मेरी नज़दीकी को चिंटू पसंद नहीं करते. एक ज़माने में वो बहुत शराब पिया करते थे. तब वो शराब के नशे में वो सब बातें कह जाया करते थे जो उनके दिल में होती थीं. यहाँ तक कि वो उस लड़की तक के बारे में बता देते थे जिसमें उन दिनों उनकी रुचि हुआ करती थी. जब मैं अगले दिन उनसे उसके बारे में पूछती थी तो वो बहुत मासूमियत से पूछते थे कि तुम्हें इसके बारे में किसने बताया. ये इतनी बार हुआ कि वो शराब पीने के बाद अक्सर नर्वस हो जाते थे कि कहीं वो अपने बारे में कोई ख़ुफ़िया बात मुझे न बता दें."
ऋषि कपूर की कंजूसी
ऋषि कपूर ने अपने चाचा शशि कपूर की तरह कभी भी रविवार को काम नहीं किया. रविवार उनके लिए परिवार का दिन होता था. लेकिन शशि कपूर के ठीक विपरीत वो बहुत कड़क और अनुशासनप्रिय पिता थे और अपने बच्चों से बहुत कम बात करते थे.
जब चिंटू छोटे थे तो उनकी भी अपने पिता के सामने आवाज़ नहीं निकलती थी. ऋषि के बारे में मशहूर था कि वो थोड़े कंजूस थे. उन्हें लोगों को उपहार देना पसंद नहीं था.
जब उनका बेटा रनबीर 16 साल का हुआ था उसने अपनी माँ से एक कार की फ़रमाइश की. लेकिन चिंटू ने उनसे कहा, तुम्हारी अभी कार रखने की उम्र नहीं आई है. वो अपने बच्चों को बिगाड़ना नहीं चाहते थे. जब तक वो अपने पैरों पर खड़े नहीं हो गए उनके बच्चों रिधिमा और रनबीर ने हमेशा इकॉनॉमी क्लास से सफ़र किया.
नीतू सिंह ने एक बार ऋषि कपूर की कंजूसी की एक बहुत दिलचस्प किस्सा सुनाया था, "खाने में चिंटू कोई कंजूसी नहीं बरतते थे. मझे याद है जब हम न्यूयॉर्क गए थे तो वो मुझे मंहगे से मंहगे रेस्तराँ में ले जाया करते थे और एक खाने पर सैकड़ों डॉलर ख़र्च कर दिया करते थे. लेकिन मामूली चीज़ों पर ख़र्च करने में उनकी जान निकलती थी. एक बार न्यूयॉर्क में ही अपने अपार्टमेंट में वापस लौटते हुए मैं सुबह की चाय के लिए दूध की एक बोतल ख़रीदना चाहती थी. उस समय आधी रात हो चुकी थी लेकिन चिंटू सिर्फ़ इसलिए दूर की एक दुकान पर गए क्योंकि वहाँ दूध 30 सेंट सस्ता मिल रहा था."
'कपूर ख़ानदान के सबसे होनहार अभिनेता'
ऋषि कपूर ने चरित्र अभिनेता के रूप में जिन किरदारों को निभाया है उनके साथ हमेशा न्याय किया है. लता मंगेश्कर ने बिना वजह ही ये नहीं कहा था कि 'वो कपूर ख़ानदान के सबसे होनहार अभिनेता थे.' उनके अभिनय की ख़ासियत थी उसका 'एफ़र्टलेस' यानी सहज होना.
आज के युग में एक रोमाँटिक हीरो के लिए न सिर्फ़ अच्छा दिखना ज़रूरी है बल्कि दुबले-पतले होना भी उतना आवश्यक है. ऋषि कपूर हमेशा ओवरवेट रहे लेकिन तब भी युवाओं को बीच उनका आकर्षण कभी कम नहीं हुआ. चरित्र अभिनेता के अपने दूसरे अवतार में भी ऋषि कपूर को उतनी ही वाहवाही मिली जितनी सत्तर के दशक में मिली थी जब उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी.
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