'पद्मावत से केवल खिलजी की भावना आहत हो सकती है'

संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'पद्मावत' भारत में रिलीज़ होने के बाद पाकिस्तान के सिनेमाघरों में भी पहुंच चुकी है.
भारत में करणी सेना ने इस फ़िल्म के विरोध में हिंसक प्रदर्शन किए हैं.
करणी सेना संजय लीला भंसाली पर राजपूतों की भावनाएं भड़काने का आरोप लगा रही थी.
पाकिस्तान में बीबीसी संवाददाता शुमाइला जाफ़री ने फ़िल्म देखकर लौट रहे कुछ युवाओं से फ़िल्म के बारे में फे़सबुक लाइव में बात की.
क्या खिलजी के साथ अन्याय हुआ?
'पद्मावत' को मलेशिया में मुसलमानों की भावनाओं का ख़्याल रखते हुए बैन कर दिया गया है. मलेशियाई सेंसर बोर्ड का कहना है कि फ़िल्म में कथित तौर पर खिलजी के किरदार का दानवीकरण करने का प्रयास किया गया है.
पाकिस्तान में कला संकाय की छात्रा फ़ज़ाना ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है.

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वह कहती हैं, "पद्मावत के बारे में कुछ भी कहें, ये विवादित फ़िल्म ही रहेगी. कलात्मक आज़ादी की कितनी भी बात कर लें, लेकिन आख़िरकार ये एक विवादित फ़िल्म है. संजय लीला भंसाली की फ़िल्म होने की वजह से इसकी सिनेमैटोग्राफ़ी शानदार होनी ही थी. लेकिन खिलजी के किरदार के साथ न्याय नहीं हुआ. एक तरफ उसे रणनीतिक जीनियस के रूप में दिखा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर उसे ख़ूबसूरत चीज़ों के प्रति इतना कमज़ोर दिखा रहे हैं. इस फ़िल्म में जो असली ऐतिहासिक किरदार था वो खिलजी था और उसी के किरदार के साथ इतनी छेड़छाड़ की गई. पद्मावती सिर्फ एक कविता थी. मुझे लगता है कि खिलजी भारत में होने वाली सबसे अच्छी चीजों में से एक है. उसने मंगोलों को हराया. उसने भारत में धन के आदान-प्रदान की सही प्रक्रिया स्थापित की. इसकी वजह से काफी बदलाव आया था. ये भी समझ आता है कि क्योंकि भारत में दर्शक मुस्लिमों को खलनायक के अंदाज से देखना पसंद करते हैं."
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'6000 रुपये देकर भी देखता फ़िल्म'
शुमाइला जाफ़री ने पद्मावत देखकर निकले एक दूसरे पाकिस्तानी युवा अरबाज़ ख़ान से बात की.
अरबाज ख़ान कहते हैं, "ये फ़िल्म बेहद दिलचस्प है और अगर इस फ़िल्म का टिकट छह हज़ार रुपये होता तो भी मैं देखने जाता. ये बहुत बढ़िया फ़िल्म थी और मुझे ये बेहद पसंद आई."

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'भंसाली को बनाना चाहिए सीक्वल'
फ़िल्म देखकर निकलीं एक पाकिस्तानी हाउसवाइफ़ सादिया कहती हैं, "इस फ़िल्म में चीजों को इतने भौंडे ढंग से दिखाया गया है कि आपकी भावनाएं आहत नहीं हो सकतीं. फ़िल्म के सेट पर इतना खर्चा किया गया है. इसमें से अगर कुछ हिस्सा भी किरदार पर खर्चा हो जाता तो बेहतर होता. अगर इस फ़िल्म से किसी की भावनाएं आहत हो सकती हैं तो अलाउद्दीन खिलजी ही आहत हो सकते हैं"
फ़ज़ाना बताती हैं, "फ़िल्म के किरदारों में सबसे अहम किरदार खिलजी का था और सबसे अहम कहानी खिलजी के बारे में है. इस पर आगे फ़िल्म बननी चाहिए."
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