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भूपेन हज़ारिका जो हिंदी में लाए असम की महक
- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, कला और संगीत समीक्षक
हिन्दी फ़िल्मों की कला और समानांतर सिनेमा की धारा में ऐसे प्रयोगशील संगीतकारों की परम्परा भी शामिल रही है, जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा के संगीत की तरह ही सदाबहार संगीत रचने की एक नयी लीक कायम की है.
ऐसे तमाम संगीतकारों के बीच असम के भूपेन हज़ारिका का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है, जिन्होंने बेहद कम हिन्दी फ़िल्मों के संगीत के द्वारा अपनी नयी ज़मीन रची.
भूपेन हज़ारिका की हिन्दी फ़िल्म संगीत में एक प्रभावी स्थिति रघुनाथ सेठ, वनराज भाटिया, दान सिंह, सपन जगमोहन, कनु राय और पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के बीच बनती है. भूपेन हज़ारिका का नाम ही असम के लोक संगीत का पर्याय माना जाता है. वहाँ की प्राकृतिक छटा का ध्वनि के माध्यम से एक सुन्दर पाठ हम इनके संगीत में आकार लेते हुए आसानी से देख सकते हैं.
असम की हरी-भरी पहाड़ियां हों या कल कल करती नदियां, वहां के पर्व-अनुष्ठान का लोक-मंगल रचने वाले संस्कार गीत हों या कि प्रसिद्ध बीहू का पारम्परिक लोक-संगीत, ब्रह्मपुत्र जैसे ऊर्जा के प्रवाह का लोक-गीतों में वर्णन हो या कि वहां की धरती का लोहित रूप... सभी जगह भूपेन हज़ारिका का नाम एक संगीतकार के बतौर प्रामाणिक ढंग से लिया जाता रहा है. उन्होंने इन सारे विषयों को अपने संगीत की दुनिया का किरदार बनाया है.
गुलज़ार की नज़र से हज़ारिका
प्रसिद्ध गीतकार और फ़िल्म निर्देशक गुलज़ार साहब की यह धारणा भूपेन हज़ारिका के सन्दर्भ में एकदम सटीक है, जब वे कहते हैं-
"यह शायर जिसका नाम भूपेन हज़ारिका है, कितनी आसानी से आवाम के दिलों की आहट सुन लेता है. उन्हें आवाम का शायर कहना जायज़ है, जिस व्यक्ति की बात करते हैं, लगता है, जैसे वो खुद कह रहे हैं. उसके लबों से निकली आह अपने आप शायर के होठों का मिसरा बन जाती है. उसमें कोई फ़ासला नहीं रहता. जैसे, वो ब्रह्मपुत्र में नाव लेकर जाते हुए मांझी की बात करते हैं, तो खुद मांझी के भाव से बात करते हैं. उम्मीद और आशा भूपेन दा के हाथ से कभी नहीं छूटती. न लोक-गीतों में जो वो गाते हैं, न नज़्मों से जो वो लिखते हैं और कम्पोज करते हैं. यहाँ तक की तन्हाई में वो अकेला महसूस नहीं करते. उनका साया साथ रहता है. उम्मीद की ज्योति जलाये रखता है."
भूपेन हज़ारिका ने बचपन से ही अपने पिता शंकर देव से भक्ति-संगीत की शिक्षा पायी थी, जो स्वयं वैष्णव भक्त थे और अपने उपदेश व प्रवचनों को गाकर प्रस्तुत करने के लिए प्रसिद्ध थे. किशोरावस्था के दौरान उन्होंने संगीत के दो जानकार गुरुओं ज्योति प्रसाद एवं विष्णु प्रसाद के साथ रहकर काफ़ी कुछ सीखा. हज़ारिका ने अपनी युवावस्था एवं संघर्ष के दिनों में देश-विदेश के तमाम कामों में पड़कर अपना अनुभव समृद्ध किया.
जैसे कुछ दिनों तक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान इसी शहर में शास्त्रीय संगीत सीखा. 1942 में आज़ादी के लिए चल रहे नव-जागरण अभियानों से प्रेरित होकर सांप्रदायिक एकता पर गीत लिखा. अमेरिका के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की, तो शिकागो यूनिवर्सिटी से फैलोशिप पाने का गौरव मिला.
इसी दौरान अमरीका के अश्वेत लोक-गायक और पॉल रॉब्सन के साथ गाना सीखने जाने पर दण्डित हुए, जिसके चलते सप्ताह भर तक जेल में गुज़ारना पड़ा. भारत लौटते हुए पानी के जहाज से लम्बी यात्रा के चलते जगह-जगह के प्रसिद्ध लोक-गीतों का संग्रह भी तैयार करते गए. इस तरह भूपेन हज़ारिका का किरदार एक बुद्धिजीवी संगीतकार का व्यक्तित्व बनाता है.
हिन्दी फ़िल्मों के सन्दर्भ में भूपेन हज़ारिका का नाम जिन तीन महत्वपूर्ण फिल्मों के संगीत के लिए हमेशा आदर के साथ लिया जाएगा, उनमें 'एक पल' (1985), 'रुदाली' (1992) एवं 'दरमियान' (1997) के नाम लिए जा सकते हैं. हालांकि इन फ़िल्मों के अलावा उनके संगीत निर्देशन में आयी अन्य फ़िल्में हैं - 'आरोप' (1979), 'चमेली मेमसाब' (1975), मेरा धरम मेरी माँ' (1976), 'साज़' (1996 मात्र एक गीत 'बादल चांदी बरसाए' का निर्देशन), 'दमन' (2000) और 'गजगामिनी' (2002).
आवाज़ का खुला हुआ आकाश
'रुदाली' का सबसे उल्लेखनीय गीत 'दिल हूम हूम करे' को भूपेन हज़ारिका ने अपने पुराने लोकप्रिय असमिया गीत 'बूकु हूम हूम करे' के हिन्दी रूपांतर के तौर पर बनाया था. राग भूपाली के शुद्ध स्वरों पर आधारित इस गीत की विभोर करने वाली धुन सहज ही अपने आकर्षण में बांध लेती है, जब हम इसके दोनों पुरुष और स्त्री वाले वर्जनों को आज भी अलग-अलग सुनते हैं.
दरअसल भूपेन हज़ारिका का संगीत एक ऐसी विराट की संकल्पना है, जिसमें सिर्फ़ सिनेमा की ही दुनिया मौजूद नहीं रहती है, बल्कि वहां दूसरे क्षेत्रों की भी व्यापक स्वीकृति का भाव छिपा है. गंगा और ब्रह्मपुत्र के प्रति भावुक रहने वाले इस संगीतकार की आवाज़ का खुला हुआ आकाश जैसा वितान देखने लायक है.
हज़ारिका के संगीत में लोक-धुनों की कल-कल करती ढेरों नदियों का संगम इस कला-पुरुष की मानवीयता और जिजीविषा को अलग से रेखांकित करता है. 'एक पल', 'रुदाली', 'दरमियान', 'साज' और 'दमन' जैसी फ़िल्मों के द्वारा हज़ारिका की संगीत की शुद्धता को फ़िल्मों के सन्दर्भ में भी हम सुन सकते हैं.
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