You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ऊषा खन्ना : धुनों में शालीनता और रूमान का सामंजस्य
- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, कला और संगीत समीक्षक
ऊषा खन्ना हिन्दी फ़िल्म संगीत के बड़े पुरुष प्रधान समाज में ऐसी महत्वपूर्ण महिला संगीतकार के रूप में मौजूद रही हैं, जिन्होंने लोकप्रियता के शिखर पर जाकर अपने लिए एक नया और पुख़्ता मुकाम बनाया.
जद्दनबाई और सरस्वती देवी की परंपरा में ऊषा खन्ना एक बिलकुल अलग ही धरातल पर खड़ी हुई दिखाई देती हैं, जिनके खाते में दर्जनों ऐसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल हैं, जिनके बहाने हम मात्र ऊषा खन्ना को लेकर एक अलग ही क़िस्म का सांगीतिक विमर्श रच सकते हैं, जिसके केंद्र में एक महिला संगीतकार की धुनें हमें हासिल हैं.
धुनों में नाज़ुक रेशमी एहसास को पिरोया
पहली ही फ़िल्म 'दिल दे के देखो' (1959) से कामयाबी के झण्डे गाड़ने वाली ऊषा जी ने बाद में अपनी प्रतिभा से कुछ बेहतरीन फ़िल्मों का संगीत रचा, जिनमें याद रह जाने वाली फ़िल्में हैं- 'शबनम', 'हम हिन्दुस्तानी', 'आओ प्यार करें', 'एक सपेरा एक लुटेरा', 'निशान', 'एक रात' और 'सौतन'.
ऊषा खन्ना के संगीत का सबसे सार्थक पहलू यह है कि उसे आप अनुशासित तरीके से बेहद परिष्कृत संगीत के रूप में देख सकते हैं. धुनों में नाज़ुक रेशमी एहसास को बेहद सहजता से विकसित करने का कौशल इनकी सबसे बड़ी ख़ासियत के रूप में प्रसिद्ध है. यदि हम ऊषा खन्ना के पूरे करियर में से कुछ गीतों के आधार पर उनकी शिनाख़्त करना चाहें, तो कह सकते हैं कि वह किसी भी तरह की अतिरंजना से दूर आधुनिक अर्थों में बेहद परिष्कृत, मुलायम और शालीन क़िस्म का संगीत है, जिस पर उत्साह की छाया तो पड़ती है, मगर उसमें अतिरिक्त जोश भरी अतिरंजना से दूरी बरती गयी है.
उदाहरण के तौर पर उनके द्वारा कम्पोज़ और लता मंगेशकर के द्वारा गाये हुए 'आओ प्यार करें' का गीत 'एक सुनहरी शाम थी' को सुनें या लता जी का ही 'हम हिन्दुस्तानी' के लिए 'मांझी मेरी क़िस्मत के जी चाहे जहां ले चल' पर ग़ौर करें या फिर 'शबनम' के लिए मो. रफ़ी की आवाज़ में बेहद खूबसूरत 'मैंने रखा है मोहब्बत तेरे अफ़साने का नाम' जैसा गीत, धुनों में शालीनता उभरकर सामने आ खड़ी होती है.
पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में महिला
यह भी ऊषा खन्ना के लिए एक चुनौतीपूर्ण बात रही कि पुरुषों के वर्चस्व वाले हिन्दी फ़िल्म संगीत समाज में उन्हें बड़े बैनरों की फिल्में बेहद कम मिलीं. बावजूद इसके उन्होंने तमाम सारे साधारण बैनरों की फ़िल्मों के लिए अविस्मरणीय संगीत रचा. 'शबनम', 'निशान' और 'एक सपेरा एक लुटेरा' जैसी फ़िल्में इसी बात के उदाहरण हैं. इनमें कुछ और फ़िल्मों के नाम लिए जा सकते हैं, जिनके कुछ गीतों ने कमाल की लोकप्रियता हासिल की थी. 'मुनीम जी', 'दादा', 'हवस', मेरा नाम जौहर', 'मैं वही हूँ', 'फैसला' और 'स्वीकार किया मैनें' जैसी फ़िल्में उसी परम्परा को आगे बढ़ाती हैं.
ऊषा खन्ना एक हरफनमौला संगीतकार के रूप में भी प्रभावित करती हैं, जब वे बाउल शैली में 'चोरी-चोरी तोरी आई है राधा' (हम हिन्दुस्तानी), अरबी शैली के दिलकश अंदाज़ में 'हसनुल अली हबा' (शबनम), कव्वाली की ठेठ पारम्परिक बहार लिए हुए 'रात अभी बाकी है, बात अभी बाक़ी है' (दो खिलाड़ी) और नए अंदाज़ में रूमान का ब्यौरा संवारती (साजन बिना सुहागन) का गीत 'मधुबन खुशबू देता है' जैसी बेहतरीन धुनें बनाती हैं.
बड़ा मुक़ाम नहीं बना सकीं उषा
ये हमेशा ही विमर्श का विषय रहेगा कि अपने समकालीनों के साथ कदम से कदम मिलाते हुए इतनी कल्पनाशील धुनों को रचकर भी वे संगीतकार के बतर्ज वह मुकाम क्यों नहीं बना सकीं, जो उनके समानान्तर उस दौर में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनन्दजी, आर. डी. बर्मन और यहाँ तक कि अस्सी के दशक में बप्पी लाहिड़ी को हासिल था.
उनकी शैली में इंटरल्यूड और प्रील्यूड में पियानो और वॉयलिन के साथ हल्की-फुल्की संवाद जैसी लड़न्त, शालीन क़िस्म का ऑर्केस्ट्रेशन रचने और अन्तरों में बहुत गरिमा के साथ बोल उठाने की तरकीब कमाल की है.
इसी के बीच अक्सर तेज़ गति का वॉयलिन टुकड़ों- टुकड़ों में इतने सुन्दर ढंग से आकार लेता है कि वह पूरी धुन को एक नए ढंग का तर्ज़ें-बयाँ देता है. यह आधुनिक क़िस्म का संगीत उन्होंने कुछ-कुछ उसी परिपाटी के तहत विकसित किया है, जिस तरह उनकी पहली संगीतबद्ध फ़िल्म के संगीत पर ओ.पी. नैय्यर की छाया पड़ती दिखाई देती है.
लोकप्रिय धुनों से आधुनिक क़िस्म का संगीत पैदा हुआ
'बड़े हैं दिल के काले' (दिल दे के देखो) जैसा गीत ऊषा खन्ना ही रच सकती थीं, जिन्होंने बाक़ायदा सुगम संगीत, रॉबिन बनर्जी जैसे संगीतकार से सीखा हुआ था. बाद में जब उन्होंने अपना ख़ुद का मुहावरा विकसित कर लिया तब एक गम्भीर शैली की चेतना से सजी हुई धुनों ने उषा खन्ना का सांगीतिक उत्कर्ष रचा. फिर एक लम्बी सूची है, जिनमें इस तरह के दर्जनों गीतों को याद किया जा सकता है.
ऐसे में, तुरन्त याद आने वाले स्तरीय गीत हैं- 'ऐ शाम की हवाओं उनसे सलाम कहना' (एक रात), 'बरखा रानी जम के बरसो' (सबक), 'पानी में जले मेरा गोरा बदन' (मुनीम जी), 'हम तुमसे जुदा हो के मर जायेंगे रो रो के' (एक सपेरा, एक लुटेरा), 'तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है' (आप तो ऐसे न थे) और 'ज़िंदगी प्यार का गीत है' (सौतन).
इस तरह हम यह कह सकते है कि एक लम्बे संगीत कॅरियर में ऊषा खन्ना ने अतिरंजना से बचते हुए ढेरों लोकप्रिय धुनें बनायीं, जिनसे आधुनिक क़िस्म का संगीत पैदा हुआ. उन्होंने अपनी धुनों को बेहद संतुलित ढंग से विकसित करते हुए भावनाओं के कोमलतम स्तर पर जाकर गीतों को चमकदार और सुन्दर बनाया है.
उसमें आर्केस्ट्रेशन का काम अलग से उनकी समकालीनता को एक ख़ास ढंग से चिन्हित करता है. एक हद तक उनका संगीत अतिरेकी नहीं, बल्कि धीरज और विवेक का संगीत है, जिनमें एक स्त्री की कोमलता चुपचाप गुंथी हुयी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)