'उमराव जान' के जादुई संगीतकार ख़य्याम

    • Author, यतींद्र मिश्र
    • पदनाम, संगीत और कला समीक्षक

मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम हाशमी उर्फ 'ख़य्याम' का ताल्लुक संगीत की उस जमात से रहा है जहाँ इत्मीनान और सुकून के साये तले बैठकर संगीत रचने की रवायत रही है.

ख़य्याम का नाम किसी फ़िल्म के साथ जुड़ने का मतलब ही यह समझा जाता था कि फ़िल्म में लीक से हटकर और शोर-शराबे से दूरी रखने वाले संगीत की जगह बनती है, इसलिए यह संगीतकार वहाँ मौजूद है.

ख़य्याम का होना ही इस बात की शर्त व सीमा दोनों एक साथ तय कर देते थे कि उनके द्वारा रची जाने वाली फ़िल्म में स्तरीय ढंग का संगीत होने के साथ-साथ भावनाओं को तरजीह देने वाला रूहानी संगीत भी प्रभावी ढंग से मौजूद होगा.

शैली का अनूठापन

हिंदी फ़िल्मों संगीत इतिहास में ख़य्याम की एक निश्चित और अलग-सी जगह बनती है जिसमें उनकी तरह का संगीत रचने वाला कोई दूसरा फ़नकार नहीं हुआ.

कहने का मतलब यह है कि उनकी शैली पर न तो किसी पूर्ववर्ती संगीतकार की कोई छाया पड़ती नज़र आती है न ही उनके बाद आने वाले किसी संगीतकार के यहाँ ख़य्याम की शैली का अनुसरण ही दिखाई पड़ता है.

इस मायने में वे शायद सबसे अकेले और स्वतंत्र संगीतकार ठहरेंगे जिनका न तो कोई पूर्वज है और न ही उनकी लीक पर चलने वाला कोई वंशज.

ख़य्याम हर लिहाज़ से एक स्वतंत्र, विचारवान और स्वयं को सम्बोधित ऐसे आत्मकेंद्रित संगीतकार रहे हैं जिनकी शैली के अनूठेपन ने ही उनको सबसे अलग क़िस्म का कलाकार बनाया है.

संगीत और सिनेमा

अपने शुरुआती जीवन में वे कुंदन लाल सहगल की तरह गायक-अभिनेता बनने की हसरत मन में पाले हुए थे. इसी के चलते बेहद कम उम्र में घर छोड़कर भागे और संगीत और सिनेमा की दुनिया में मुक़ाम बनाने के लिए संघर्ष शुरू किया.

वे लाहौर के प्रसिद्ध संगीत निर्देशक ग़ुलाम अहमद चिश्ती और संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगत राम में हुस्नलाल जी के शागिर्द रहे.

ख़य्याम संगीत की पाठशाला के ऐसे चितेरे रहे हैं जिनके यहाँ कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति अपने सबसे उदात्त अर्थों में संभव हुई है.

वे भावुक हद तक चले जाने का जोख़िम उठाकर कोमलता को इतने तीव्रतम स्तर पर जाकर व्यक्त करते थे कि सुनने वाले को जहाँ एक ओर उनकी धुनों में माधुर्य के साथ चरम मुलायमियत के दर्शन होते थे, वहीं कई बार उनकी शैली पिछले को दोहराती हुई थोड़ी पुरानी भी लगती थी.

ज़हीन संगीत

कई बार यह भी देखा गया है कि समकालीन अर्थों में व्याप्त संगीत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए ख़य्याम बिलकुल अपनी शर्तों पर स्वयं को सम्बोधित संगीत ही रचते रहे.

शायद इसलिए भी कइयों को उनके संगीत के साथ सामंजस्य बनाने में दिक़्कत होती है और कई बार उसकी बारीकियों को गंभीरता से समझने में वे चूक भी जाते हैं.

ख़य्याम उसी स्तर पर बिलकुल नए मुहावरों से शान्त क़िस्म का ज़हीन संगीत अपनी फ़िल्मों 'शोला और शबनम', 'फिर सुबह होगी', 'शगुन', 'मोहब्बत इसको कहते हैं' और 'आख़िरी ख़त' के माध्यम से पेश कर रहे थे.

आशय यह कि बिलकुल अलग ही धरातल पर थोड़े गम्भीर स्वर में रुमानियत का अंदाज़ लिए हुए ख़य्याम की कम्पोजीशन्स हमसे मुखातिब होती है.

धुनों की नाज़ुकी

वहाँ पर मौजूद धुनों की नाज़ुकी भी इस बात पर टिकी रहती है कि किस तरह संगीतकार ने अपनी शैली के अनुरूप उसे अंडरटोन में विकसित किया है जिससे शायरी और संगीत दोनों की ही कैफ़ियत पूरी तरह खिलकर सामने आई है.

अपना मुहावरा स्थापित कर लेने के बाद ख़य्याम ने सत्तर और अस्सी के दशक में सर्वाधिक उल्लेखनीय ढंग का संगीत दिया है जो कई बार उनकी स्वयं की बनाई हुई पिछले समय की सुन्दर कृतियों को भी पीछे छोड़ देता है.

उपर्युक्त फ़िल्मों के संगीत से अलग इस संगीतकार ने 'संकल्प' (1974), 'कभी-कभी' (1976), 'शंकर हुसैन' (1977), 'त्रिशूल' (1978), 'चम्बल की क़सम' (1979), 'दर्द', 'उमराव जान' (1981), 'बाज़ार' (1982), 'रज़िया सुल्तान' (1983) एवं 'अंजुमन' (1986) जैसी उत्कृष्ट फ़िल्मों से अपने संगीत में कुछ और मौलिक क़िस्म की स्थापनाएं पिरोईं.

समवर्ती संगीतकारों की शैली

यह देखना ज़रूरी है कि किस तरह 'शगुन' (1964) से लेकर 'रज़िया सुल्तान' (1983) तक आते-आते ख़य्याम के यहाँ ग़ज़ल की संरचना में भी गुणात्मक स्तर पर सुधार हुआ और वह पहले की अपेक्षा कुछ ज़्यादा अभिनव ढंग से चमक कर निखर सकी.

इस दौरान ख़य्याम का संगीत कुछ ज़्यादा ही सहज ढंग से रेशमी होता गया है जिसमें प्रणय व उससे उपजे विरह की सम्भावना को कुछ दूसरे ढंग की हरारत महसूस हुई है.

ऐसा महीन, नाज़ुक सुरों वाला वितान जो सुनते हुए यह आभास देता है कि वह बस हाथ से सरक या फिसल जाएगा- अपनी मधुरता में दूर तक बहा ले जाता है.

इसी मौलिकता को बरकरार रखने के जतन में ख़य्याम अपनी धुनों को लेकर इतने चौकस हैं कि ग़लती से भी कहीं दूसरे प्रभावों या कि समवर्ती संगीतकारों की शैली से मिलती-जुलती कोई बात कहने में सावधान बने रहते हैं.

'थोड़ी सी बेवफ़ाई'

शायद इसलिए उनके हुनर से विकसित कोई प्रेम-गीत हो या ग़ज़ल; दर्द भरा नग़मा हो या फिर उत्सव का माहौल रचने वाला गाना-सब कुछ जैसे किसी गहन वैचारिकी के तहत अपना रूपाकार पाता है.

इस बात की पड़ताल के लिए हम आसानी से 'शंकर हुसैन', 'नूरी', 'कभी-कभी', 'संकल्प', 'रज़िया सुल्तान', 'उमराव जान', 'थोड़ी सी बेवफ़ाई' और 'बाज़ार' के गीतों से मुख़ातिब हो सकते हैं.

अनायास ही इन फ़िल्मों के गाने अपनी शाइस्तगी को बयां करते हैं, जब कभी भी उनके चन्द मिसरे या टुकड़े कानों में पड़ जाते हैं.

ख़य्याम होना इसी अर्थ में, फ़िल्मी धुनों को रेशमी धरातल पर कुछ और मुलायम रचता हुआ अमर करता है.

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)

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