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फ़िल्म इंडस्ट्री घाटे की खाई में गिरी?
- Author, चिरंतना भट्ट
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
जब भी हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की बात होती है तब करोड़ों से कम के आंकड़ों की चर्चा नहीं होती. कोई फ़िल्म 100 करोड़ या 300 करोड़ के क्लब में आ गई यही उसकी सफ़लता का मापदंड बन जाता है.
कुछ वक्त पहले जब डिज़नी इंडिया के यूटीवी मोशन पिक्चर्स ने हिंदी फिल्में प्रोड्यूस न करने की घोषणा की, तब अचानक दूसरे बड़े स्टूडियोज़ के भी बंद होने की खबरें आने लगी थीं.
वायाकॉम 18, रिलांयस बिग पिक्चर्स, बालाजी मोशन पिक्चर्स, सोनी, फॉक्स स्टार जैसे स्टूडियोज़ को हुए बड़े घाटों की बातों के साथ कुछ के बंद होने की ख़बरें चर्चा में रहीं.
माहौल बना जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री घाटे की खाई में जा चुकी है. ऐसे में बीबीसी हिंदी ने फ़िल्म जगत से जुड़े कुछ अहम लोगों से यह जानने की कोशिश की कि आख़िर फ़िल्म इंडस्ट्री में धंधे का गणित कैसे काम करता है और क्या वाकई फ़िल्मी दुनिया घाटे में है.
'विक्की डोनर, 'पीकू' और अब 'पिंक' जैसी फ़िल्में बनाने वाले रोनी लाहिरी और शूजीत सरकार दोनों मानते हैं कि एमबीए स्टाइल पीपीटी (पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन) से फ़िल्में नहीं बनाई जा सकती.
मार्केटिंग और प्रोडक्शन संभालने वाले रोनी कहते हैं, "फ़िल्म इंडस्ट्री घाटे में है कहना सही नहीं है. क्योंकि इतने विशाल कारोबार में घाटा तो होता ही रहता है. लेकिन इस दौर को आप करेक्शन का दौर मान सकते हैं."
वो आगे कहते हैं, "हर मार्केट में करेक्शन आना ज़रूरी है और वही हो रहा है. बड़े स्टूडियोज़ फ़ेल हुए हैं तो इंडिविज़्युअल फ़िल्में भी फ़ेल हुई हैं. ये सही है कि कॉरपोरेट सिस्टम के आ जाने से फ़िल्म इंडस्ट्री में एक सलीका आया है. लेकिन उसके चलते क्रिएटिविटी या रचनात्मकता कहीं पीछे छूट गई."
रोनी को यक़ीन है कि बड़े स्टूडियो की विफलता का कारण कहानी पर कम और फ़िल्म के प्रोडक्शन पर ज़्यादा ध्यान देना था. अब इंडस्ट्री में मौजूद प्लेयर्स पिछली गलतियों को समझ कर सुधरेंगे.
वो कहते हैं, "अगर 300 करोड़ में फ़िल्म बन रही है तो आप पहले से ही अपनी फ़िल्म को बडे रिस्क से जोड़ रहे हैं. देश की 120 करोड की आबादी में से दो करोड लोगों तक ही यह पहुंचने वाली है और फिर मल्टीप्लेक्स हैं ही कितने? सिंगल स्क्रीन थिएटर्स जिस हाल और नंबर्स में हैं, उसके चलते फ़िल्म तक कम लोग ही पहुंचेंगे और आप घाटे में होंगे."
निर्माता निर्देशक शूजित सरकार कहते हैं, "देखिए कॉरपोरेट स्टूडियोज़ के साथ समस्या यही थी कि वो फ़िल्म को कला का नहीं, व्यापार का माध्यम मान कर चल रहे थे. फ़िल्म निर्देशक का माध्यम है लेकिन स्टूडियोज़ ने अपने पैसे बड़े एक्टर्स, नामी चेहरों और तड़क भड़क पर खर्च कर दिए."
वो कहते हैं, "फ़िल्म अच्छी हो लेकिन उसे ठीक से परोसा ना जाए, तो फ़िर दर्शक नहीं मिलते. एक छोटी बजट की फ़िल्म भी कमाल कर सकती है और पीकू या पिंक इसका उदाहरण हैं, बशर्ते आप कहानी को परोसें सही तरीके से."
शूजित एक मर्यादित बजट में फ़िल्म बनाने को भी बेहद ज़रूरी मानते हैं क्योंकि इससे रिस्क कम होता है.
उनके मुताबिक़, "दुर्भाग्य से फ़िल्म एक ऐसी कला है जिसमें पैसे लगते हैं और हर फ़िल्म अलग चैलेंज होती है. कॉर्पोरेट स्टूडियोज़ फ़िल्मों को प्रोजेक्ट के तौर पर देखेंगे तो बात नहीं बनेगी."
रोनी के मुताबिक़, "ज़रुरी नहीं कि सुपर स्टार के होने से फ़िल्म हिट हो जाएगी. फ़िल्म का स्टार पावर सिर्फ़ पहले वीकेंड में चलता है और इसके बाद कंटेंट ही उसे चलाता है. जैसे विक्की डोनर में बड़े नाम नहीं थे. शुरुआत धीमी रही लेकिन फिर लोगों ने उसे बहुत सराहा."
वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार जयप्रकाश चौकसे फ़िल्म इंडस्ट्री को होने वाले इस घाटे को लेकर कम सिनेमा स्क्रीन का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हैं.
वो कहते हैं, "आज फ़िल्म बनाना आसान है क्योंकि सितारे कम पैसे में काम कर लेते हैं और बाद में फ़िल्म के प्रॉफ़िट में हिस्सा ले लेते हैं. लेकिन इसके बाद सबसे बड़ी तकलीफ़ आती है सिंगल स्क्रीन थिएटर्स की कम संख्या की. भारत में अगर 13,000 स्क्रीन्स हैं तो उसमें से 10,000 सिंगल स्क्रीन थिएटर होंगे."
वो आगे बताते हैं, "ऐसे में एक बड़ी बजट की फ़िल्म के लिए इतनी कम स्क्रीन से अपनी लागत वसूलना मुश्किल हो जाता है."
वो बताते हैं कि बॉलीवुड में सालाना करीब 250 हिंदी फ़िल्में रिलीज़ होती हैं और बड़े बजट की फ़िल्में केवल पांच या सात ही होती हैं. ऐसे में इन 250 फ़िल्मों में से प्रॉफ़िट कमाने वाली फ़िल्में अगर 15-20 हों तो उसे अच्छा साल माना जाता है.
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