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शादियों की धूम पर मंदी की धुंध | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिसंबर में भारत में शादियों का मौसम शुरू होता है लेकिन इस साल आर्थिक मंदी की मार शादी की धूम पर भी पड़ती दिख रही है. सर्दियों के मौसम में परंपरागत धूम-धाम के साथ सैकड़ों जोड़ियाँ बनती हैं, शादियाँ इस बार भी हो रही हैं और धूमधाम से ही हो रही हैं लेकिन लोगों के हाथ पहले के मुक़ाबले कुछ तंग हैं. एक दशक से अधिक समय से शादियों का आयोजन करने का ठेका लेने वाली सुधा खन्ना से मुंबई के मशहूर पाँच सितारा होटल में एक शादी के समारोह में मुलाक़ात हुई, पाँच सितारा होटल में धूमधाम से शादी का मतलब है लाखों रुपए का ख़र्च. सुधा खन्ना जी-जान से लगी हुई थीं कि शादी पूरे शानो-शौकत के साथ हो और कोई कसर न रह जाए लेकिन उन्हें अब महसूस होने लगा है कि बदले हुए माहौल में लोग कंजूसी बरतने लगे हैं. शादी के काम में लगे मज़दूरों को ठीक से फूल टाँगने के निर्देश देते हुए सुधा बताती हैं, "लोग आर्थिक मंदी की वजह से ख़र्चे को लेकर बहुत सजग हो गए हैं. हम बहुत महँगी और शानदार शादियों का आयोजन बरसों से करते रहे हैं लेकिन इस साल लोग जितना ज़रूरी है उससे ज्यादा कोई ख़र्च नहीं करना चाहते." सुधा कहती हैं, "पिछले साल के मुक़ाबले लोग शादी के अपने बजट को पाँच से 10 प्रतिशत तक कम कर रहे हैं, यह बहुत अधिक नहीं लगता लेकिन अगर शादी जैसे जीवन के सबसे बड़े आयोजन में कटौती हो रही है तो आप समझ ही सकते हैं." एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल लगभग डेढ़ करोड़ शादियाँ होती हैं और एक पूरी 'मैरिज इंडस्ट्री' है जिसमें फूल वाले, कैटरिंग वाले, तंबू-शामियाने वाले, घोड़ी वाले सब शामिल हैं, हज़ारों मज़दूरों को शादियों के मौसम में काम मिलता है. शादी के आयोजन के धंधे से जुड़े हर क्षेत्र के लोग मंदी के असर को महसूस करते दिख रहे हैं. मुरझाए फूल मुंबई में कल्पना सांगानेरिया फूलों की महँगी सजावट का कारोबार करती हैं, भव्य शादियों की सजावट के ऑर्डर उनके पास भारी संख्या में आया करते हैं. उनका कहना है कि ऑर्डरों में कमी आई है और लोग अगर ऑर्डर देते भी हैं तो पहले की तरह पैसे ख़र्च करने को तैयार नहीं हैं. मुंबई की फूल मंडी में बात करते हुए उन्होंने बताया, "ऑर्डरों में तो साफ़ तौर पर कमी आई है, मेरे ख़याल से 15 से 20 प्रतिशत तक की कमी, लोग फूलों पर पहले की तरह पैसे ख़र्च करने को तैयार नहीं है. उन्हें लगता है कि फूलों की सजावट में थोड़ी कटौती से पैसे बचाए जा सकते हैं." वे कहती हैं, "पहले ऐसा नहीं था, लोग कहते थे जितने ज्यादा फूल हों, उतना अच्छा है, लेकिन इस साल लोग ऑर्डर देने से पहले सोच रहे हैं, शायद अगले साल मंदी की हालत सुधरे तो हमारा कारोबार भी बेहतर हो." हनीमून ट्रैवल एजेंटों का कहना है कि उन पर सबसे अधिक मार पड़ी है, आर्थिक मंदी और हवाई टिकटों के दामों में बढ़ोतरी की वजह से नई जोड़ियाँ स्विट्ज़रलैंड जाने के बदले मनाली जाने की सोच रही हैं. राजेश रतारिया मुंबई में एक दशक से ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं, उनका कहना है कि उनका धंधा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. वे कहते हैं, "लोग महँगे हनीमून पैकेज ख़रीदने से कतरा रहे हैं, हमारे कारोबार में 35 प्रतिशत तक की कमी आई है. ऐसा नहीं है कि नई जोड़ियाँ हनीमून नहीं मना रहीं लेकिन वे ज्यादा दूर जाने के बदले पास ही कहीं जाना चाहते हैं." वे कहते हैं, "जो लोग पहले यूरोप जाते थे वे अब मलेशिया जा रहे हैं, हर कोई पैसे बचाना चाहता है. कोई नहीं जानता कि अगले साल क्या होगा." | इससे जुड़ी ख़बरें 'भारतीय अर्थव्यवस्था पश्चिम से अलग'22 जनवरी, 2008 | कारोबार भारत ने आर्थिक पैकेज की घोषणा की07 दिसंबर, 2008 | कारोबार औद्योगिक विकास की दर में गिरावट12 दिसंबर, 2008 | कारोबार भारत में होम लोन हुआ सस्ता15 दिसंबर, 2008 | कारोबार 'तीन महीनों के दौरान 65 हज़ार नौकरियाँ गईं'15 दिसंबर, 2008 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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