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वित्त बाज़ार का संकट: कारण और असर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी वित्तीय क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों लीमैन ब्रदर्स और मेरिल लिंच की कंगाली हालत से न केवल दुनिया भर के शेयर बाज़ारों के होश फ़ाख़्ता हो गए हैं बल्कि वहाँ की सरकारों की भी नींद उड़ गई है. इससे न केवल देखते देखते अरबों-खरबों रुपए की पूंजी स्वाहा हो गई, बल्कि अब रोजगार अवसरों, विकास कार्यों पर भी आसन्न ख़तरा पैदा हो चुका है. भारतीय स्टॉक बाज़ार की नाक समझे जाने वाले रिलायंस, आईसीसीआई बैंक, भारतीय स्टेट बैंक के शेयर भी इस उठे भूचाल में अपने पाँव नहीं टिका पा रहे हैं. भूसंपदा कंपनियों पर इसकी मार सबसे ज़्यादा पड़ी है. लीमैन के कंगाल होने, मेरिल लिंच के बिकने और एआईजी के ढेर होने की ख़बरों ने विश्व की तमाम अर्थव्यवस्था को महासंकट के कगार पर खड़ा कर दिया है. 'सब प्राइम स्कैंडल' असल में यह संकट वर्ष 2007 के अंत में 'सब प्राइम स्कैंडल' के साथ शुरु हो गया था. लेकिन जिस तरह से इस भयावह कांड को छुपाए रखा गया, उससे यह दैत्य और विकराल हो गया. नतीजा हमारे सामने है.
लेकिन क्या है ये 'सब प्राइम' स्कैंडल? ये घोटाला तब हुआ जब एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ में अमरीकी वित्त कंपनियों ने ऊँची ब्याज दरों पर खरबों डॉलर का कर्ज़ ऐसे लोगों को दे दिया जो उसे वापस करने के क़ाबिल नहीं थे. 'सब प्राइम' कहलाने वाला यह धंधा भस्मासुर में कब तब्दील हो गया, इसका अनुमान ये वित्तीय ज़ादूगर भी नहीं लगा पाए और इस भस्मासुर ने सबसे पहले उन्हीं पर अपना हाथ रख दिया. कहना न होगा कि आँख मूँद कर कमाई के लालच में बेहिसाब कृत्रिम साख़-निर्माण की अमरीकी वित्त कंपनियों की आत्मघाती प्रवृत्ति ने आज विश्व को मंदी के आसन्न ख़तरे की ओर धकेल दिया है. भारत में कुछ निजी बैंक इसका उदाहरण हैं. भारी बिकवाली का अंदेशा अब यह आशंका है कि अमरीकी वित्त कंपनियाँ विदेश में ख़ास तौर से उभरते स्टॉक बाज़ारों में अपने निवेश की भारी बिकवाली करेगी. नतीजतन इन बाज़ारों में गिरावट और तेज़ हो सकती है.
आने वाले दिनों में सेंसेक्स के 12 हज़ार और निफ़्टी के 3700 अंक तक गिरने की आशंका बाज़ार में बलबती हो गई है. विडम्बना देखिए, दुनिया भर में निवेशकों को आस थी कि कच्चे तेल की क़ीमतें 100 डॉलर या उससे नीचे आएंगी तब स्टॉक बाज़ार में तेज़ी का दौर देखने को मिलेगा. लेकिन अब कच्चे तेल की क़ीमतें 100 डॉलर या उससे नीचे आ चुकी है लेकिन शेयर बाज़ार मंदी और गिरावट के ख़तरनाक आशंकाओं से मरणासन्न है. यह कंपनियाँ तो कंगाल हुई. साथ ही साथ इन्होंने करोड़ों निवेशकों को भी कंगाल कर दिया. लेकिन ख़तरा इससे ज़्यादा पसर चुका है. इस भस्मासुर ने अब तरलता, रोजगार और विकास परिजनाओं को लीलने की तैयारी कर ली है. अमरीका और यूरोप में मंदी का ख़तरा गहरा हो रहा है जिसका भारी प्रतिकूल असर भारतीय बीपीओ कंपनियों पर तत्काल प्रभाव से पड़ेगा. देश की पाँच प्रमुख बीपीओ कंपनियों-टीटीएस, इंफ़ोटेक, विप्रो, सत्यम और एचसीएल टेक्नोलॉजी की वृद्धि दर पर भारी मार अवश्यंभावी है. इन कंपनियों में नई भरतियों के लक्ष्य कम हो जाएँगे. रोज़गार जाने का भय वैसे भी इस बार एमबीए और इंजीनियरिंग कॉलेजों में चयन के लिए कंपनियाँ कम जा रही हैं. मोटा वेतन पाने वाले लीमैन और मेरिल लिंच के कर्मियों को रोजी-रोटी की चिंता सताने लगी है. कब यह कंपनियाँ भारत में अपना संचालन बंद कर दें? यह तय है कि अब अनेक विदेशी निवेशक भारत से अपने हाथ खीचेंगे. जाहिर है कि इनसे जुड़े तमाम लोग रोज़गार से हाथ धो सकते हैं. विदेशी वित्त कंपनियों की आर्थिक तंगहाली से तीसरा बड़ा संकट पूंजी और नगदी को लेकर पैदा होगा. जिससे यहाँ की विकास परियोजनाएँ मंद हो सकती है. उदाहरण के लिए रियल इस्टेट क्षेत्र की अगुआ कंपनियाँ डीएलएफ़, यूनिटेक और अंसल्स प्रॉपर्टिज़ को लीजिए. इनके शेयरों के पाँव इस भूचाल में उखर गए हैं जो पहले से ही कुछ पस्त थे. इन कंपनियों में भारी मात्रा में विदेशी पूंजी लगी हुई है. अब अन्य परियोजनाओं के लिए विदेशी पूंजी मिलना दुष्कर हो जाएगा. आधारभूत क्षेत्र की जयप्रकाश एसोशिएट, जेपी हाइड्रो, रिलांयस पावर और रिलांयस इंफ़्रास्ट्रक्चर का भी कमोबेश यही हाल है. 'सब प्राइम' का महासंकट इस शताब्दी की शुरुआत के डॉट कॉम संकट से ज़्यादा बड़ा है. विश्व विख्यात अर्थशास्त्री पॉल क्रगमैन इस वर्ष के शुरु से इस ख़तरे के बारे में आगाह करते रहे हैं. उन्हें डर है कि यह दैत्य विश्व को 1930 की जैसी महामंदी की ओर न धकेल दे. |
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