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भारत में प्रति व्यक्ति आय 14 फ़ीसदी बढ़ी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ताज़ा सरकारी आंकड़े के अनुसार वर्ष 2006-07 में देश में प्रति व्यक्ति आय में 14.2 फ़ीसदी की वृद्धि हुई और सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी दर 9.6 प्रतिशत रही है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की ओर से गुरुवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2005-06 के दौरान प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 25, 956 रुपए थी, जो 2006-07 के दौरान बढ़कर 29,642 रुपए हो गई. आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत में आय में बढ़ोतरी से खुदरा क्षेत्र, वाहन उद्योग, मोबाइल और ब्रांडेड उत्पादों की माँग में ज़बरदस्त तेज़ी आई है. देश के सकल घरेलू उत्पाद को देश की कुल जनसंख्या से विभाजित करने पर प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा सामने आता है लेकिन इस औसत का अर्थ यह नहीं होता कि हर व्यक्ति की आय बढ़ रही है. पिछले दिनों ही एक अन्य सरकारी संस्था (एनसीईयूएस) ने रिपोर्ट दी थी भारत में 77 प्रतिशत लोगों की औसत आय अभी भी 20 रुपए प्रतिदिन है. आँकड़े इस अवधि के दौरान भारतीयों ने औसतन 20, 714 रुपये ख़र्च किए, जो कि उनकी आमदनी का 70 प्रतिशत है. जबकि पिछले वर्ष लोगों ने 71.83 प्रतिशत खर्च किया था और बाक़ी बचत की थी. संचार के क्षेत्र में लोगों ने सबसे अधिक ख़र्च किया. इसके तहत टेलीविज़न, मोबाइल और समाचार पत्र आदि आते हैं. पिछले साल के मुक़ाबले इस क्षेत्र में लोगों को ओर से किए जाने वाले औसत ख़र्च में 35.6 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. टेलीकॉम और मीडिया के क्षेत्र में पिछले वर्ष के 45,475 करोड़ रुपये के मुक़ाबले वर्ष 2006-07 में 61, 655 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए. चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी लोगों ने पिछले वर्ष की तुलना में 6 फ़ीसदी अधिक खर्च किया. जीडीपी दर 9.6 फ़ीसदी रहने में खनन, औद्योगिक उत्पादन और सेवा क्षेत्रों के ज़बरदस्त प्रदर्शन का ख़ासा योगदान रहा है. वर्ष 2005-06 के दौरान जीडीपी विकास दर 9.4 फ़ीसदी थी. कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 3.8 फ़ीसदी रही, जो पहले के 6.1 प्रतिशत के आँकड़े से कम है. औद्योगिक क्षेत्र ने 12 फ़ीसदी, संचार के क्षेत्र में 16.6 फ़ीसदी और खनन क्षेत्र में 5.7 की वृद्धि दर्ज की गई है. हक़ीकत एचडीएफ़सी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ का कहना है, "लोगों की आय बढ़ रही है और इसका असर उनके निजी जीवन पर दिखना लाज़मी है." लेकिन अर्थशास्त्री आलोक पुराणिक का कहना है कि ये आंकड़े भ्रमित करने वाले भी हो सकते हैं. उनका कहना है, "चार लोगों के परिवार में यदि दो लोगों को अच्छी नौकरी मिल गई तो उस परिवार की आय बढ़ सकती है और चारों सदस्यों की औसत आय बढ़ सकती है लेकिन हो सकता है कि परिवार के दो लोगों की आय बहुत कम हो." उनका कहना है कि यह मानना ठीक नहीं होगा कि प्रति व्यक्ति औसत आय बढ़ने का मतलब यह होगा कि देश ख़ुशहाल ही हो रहा है. वे कहते हैं, "यह शहर के मॉल-बाज़ार वाले लोगों की आय का बढ़ना हो सकता है और हो सकता है कि ग़रीबों तक इसमें से कुछ भी न पहुँचा हो." इस सवाल पर कि क्या आगे इसका फ़ायदा ग़रीबों को भी मिलने की उम्मीद की जानी चाहिए, उन्होंने कहा, "सिर्फ़ उम्मीद की जा सकती है क्योंकि उम्मीद पर दुनिया क़ायम है." | इससे जुड़ी ख़बरें 'ग़रीबी आकलन की पद्धति में बदलाव हो'23 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस भारत में रिकॉर्ड विकास दर की उम्मीद07 फ़रवरी, 2007 | कारोबार भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती रफ़्तार 31 मई, 2006 | कारोबार अर्थव्यवस्था में उम्मीद से ज़्यादा विकास30 नवंबर, 2005 | कारोबार 'विकास के फ़ायदे ग़रीबों तक नहीं'07 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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