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एसईजेड में बिहार की रुचि नहीं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक ओर जहाँ देश भर में विशेष आर्थिक ज़ोन की स्थापना के लिए सैकड़ों प्रस्ताव आ रहे हैं, वहीं बिहार इसे विकास के लिए ज़रूरी नहीं मानता और इसके विकल्पों का अध्ययन कर रहा है. योजना आयोग के पूर्व सदस्य और बिहार प्लानिंग बोर्ड के उपाध्यक्ष एन के सिंह का कहना है कि बिहार जैसे राज्य के लिए औद्योगीकरण का मॉडल एक हब की तरह होगा. मसलन लेदर हब, एग्रो प्रोसेसिंग हब, आईटी पार्क, टेक्सटाइल हब. उनका कहना है कि ये ख़ास तरह के हब बिहार जैसे राज्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं. एनके सिंह की राय में एसईजेड बिहार जैसे राज्य के लिए उपयुक्त मॉडल नहीं है. वो कहते हैं, "हम एसईजेड के लिए सोच भी नहीं रहे हैं. यह सघन आबादी वाला राज्य है. इसलिए प्रति परिवार जोत के लायक ज़मीन कम है. साथ ही ज़मीन काफी उपजाऊ है. इसलिए एसईजेड लगाना उतना कारगर नहीं होगा." संभावानाएं उनका कहना है कि बिहार में ख़ासकर उत्तरी ज़िलों में एग्रो प्रोसेसिंग, दक्षिण में चमड़ा और कपड़ा उद्योग के क्षेत्र में संभावनाएँ हैं, इस काम में अगर विदेशी कंपनियाँ दिलचस्पी दिखाती हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए. एन के सिंह ने कहा कि बिहार में पूँजी निवेश के लिए देश के कई उद्योगपतियों ने अपनी इच्छा जताई है. मसलन, आनंद महिन्द्रा लीची और आम जैसी फसलों के एग्रो प्रोसेसिंग के क्षेत्र में निवेश करना चाहते हैं. स्वास्थ्य क्षेत्र में मैक्स ग्रुप के अनलजीत सिंह निवेश की इच्छा रखते हैं. इसके अलावा कई उद्योगपति मल्टीप्लेक्स के निर्माण में रुचि ले रहे हैं. प्रस्ताव है कि मल्टीप्लेक्स के ज़रिए राज्य में रिटेल कारोबार को बढ़ावा दिया जाए. बिहार सरकार को चीनी मिलों की स्थापना के लिए भी 13 प्रस्ताव मिले हैं. ख़ासकर उत्तर बिहार के लिए जहाँ चीनी उत्पादन की समृद्ध परंपरा रही है. कोयम्बटूर की कुप्पास्वामी समूह ने मक्का से बड़े पैमाने पर एथेनॉल बनाने का प्रस्ताव दिया है. सिंह का मानना है कि इस तरह के प्रस्तावों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि राज्य में अधिक पूँजी निवेश हो सके. झारखंड छह साल पहले बिहार से अलग हुए झारखंड राज्य में एसईजेड को लेकर उत्साह देखते ही बनता है. यहाँ सरकारी सहयोग से दो एसईजेड बनने का रास्ता साफ़ हो गया है. इनमें से एक कृषि पार्क और दूसरा मोटर पार्क होगा खनिज संपदा से भरपूर झारखंड विदेशी पूँजीनिवेश के मामले में भी बिहार को कहीं पीछे छोड़ चुका है. झारखंड के उद्योग मंत्री स्टीफन मरांडी ने बताया कि राज्य में अर्जुन मुंडा की पिछली सरकार के कार्यकाल में पूंजी निवेश के 45 से अधिक सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं. मित्तल स्टील और जिंदल स्टील राज्य में स्टील प्लांट लगाने की इच्छा जता चुकी है. हालाँकि विस्थापन का मुद्दा संवेदनशील होने के कारण दोनों परियोजनाओं पर कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पाई है. लेकिन नई सरकार का कहना है कि नई उद्योग नीति बनाई जा रही है. इस नीति में सही विस्थापन और पुनर्वास को ध्यान में रखा जाएगा. मरांडी ने कहा, “ये ठीक है कि कई राज्यों में भूमि अधिग्रहण को लेकर विरोध हो रहा है. लेकिन झारखंड में इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ठोस नीति बना रही है.” उन्होंने कहा कि राज्य सरकार राष्ट्रीय आदिवासी नीति, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की विस्थापन नीतियों का भी अध्ययन कर रही हैं और इसके बाद ही झारखंड की विस्थापन नीति को अंतिम रूप दिया जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें किसानों को मिले भूमि का वाजिब मुआवज़ा19 दिसंबर, 2006 | कारोबार 'कंपनियाँ ही करें ज़मीन का अधिग्रहण'19 दिसंबर, 2006 | कारोबार ठीक नहीं है चीन के मॉडल की नकल 19 दिसंबर, 2006 | कारोबार एसईजेड के ख़ास क़ानून ख़तरनाक19 दिसंबर, 2006 | कारोबार एसईजेड की दौड़ में गुजरात सबसे आगे19 दिसंबर, 2006 | कारोबार हरियाणा में बनेगा सबसे बड़ा एसईजेड19 दिसंबर, 2006 | कारोबार पोस्को के ख़िलाफ़ बढ़ रहा विरोध19 दिसंबर, 2006 | कारोबार एसईजेड को बढ़ावा देने में महाराष्ट्र आगे19 दिसंबर, 2006 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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