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मंगलवार, 29 अगस्त, 2006 को 13:13 GMT तक के समाचार
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'विकास के फ़ायदे से वंचित हैं मज़दूर'
मज़दूर
रिपोर्ट के मुताबिक कई एशियाई देशों में मज़दूरों के काम करने के घंटे काफ़ी ज़्यादा होते हैं
अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संघ यानी आईएलओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है एशियाई मज़दूरों को उनके देश में हो रही आर्थिक तरक्की का पूरा फ़ायदा नहीं मिल पा रहा है.

आईएलओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एशियाई मज़दूरों से ज़्यादा समय काम करवाया जाता है लेकिन काम की तुलना में उन्हें काफ़ी कम वेतन दिया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक एशिया में करीब 60 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं. इन लोगों को रोज़ाना करीब 45 रुपए का भुगतान किया जाता है जो उनके जीवनयापन के लिए काफ़ी नहीं है.

आईएलओ के उप क्षेत्रीय निदेशक लिन लेन लिम का कहना है एशिया में आथिर्क तरक्की के बावजूद रोज़गार के क्षेत्र में उतना विकास नहीं हुआ है.

आईएलओ की ये रिपोर्ट ऐसे समय आई जब दो एशियाई देश -भारत और चीन की अर्थव्यवस्था में तेज़ी से विकास हो रहा है.

आईएलओ ने अपनी रिपोर्ट एशिया एंड द पेसिफ़िक 2006 में बताया है कि आने वाले सालों में एशियाई मुल्कों में करीब 25 करोड़ ऐसे लोग होंगे जिन्हें रोज़गार अवसरों की तलाश होगी.

सन 2005 में एशिया प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था 6.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी है लेकिन रोजगार मात्र 1.4 प्रतिशत की दर से ही बढ़ा है.

चीन में सन 2000 से 2004 के दौरान अर्थव्यवस्था में 59 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई लेकिन इस तुलना में रोज़गार केवल 5 प्रतिशत ही बढ़ा है.

आईएलओ के निदेशक युआन सोमाविया का कहना है विकास और रोज़गार अवसरों के बीच असंतुलन के चलते ग़रीबी घटाने के प्रयासों में बाधा आ रही है.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बढ़ती प्रतियोगिता और बेहतर विकास हासिल करने की होड़ का मतलब ये नहीं होगा कि आने वाले दिनों में बेहतर वेतन मिलेगा और काम करने के घंटे कम होंगे.

विश्व में सबसे ज़्यादा काम के घंटे वाले देशों में भी एशियाई देशों जैसे बांग्लादेश, हॉंग-कॉंग, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और थाइलैंड में हालात काफ़ी खराब हैं.

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