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डब्ल्यूटीओ वार्ता 'अधर' में लटकी
लामी
कृषि सब्सिडी और आयात शुल्क के मसले पर विकासशील और धनी देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई
औद्योगिक और कृषि उत्पादों के व्यापार उदारीकरण पर सहमित नहीं बन पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन की दोहा दौर की बातचीत स्थगित हो गई है.

ख़बरों के मुताबिक जिनीवा में यूरोपीय संघ, अमरीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और जापान (जी-6) के बीच बातचीत बिना किसी नतीजे के ही सोमवार को समाप्त हो गई.

ये देश कृषि और औद्योगिक उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर जारी गतिरोध को दूर करने में नाकाम रहे.

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख पास्कल लामी ने पहले ही कह दिया था कि अगर उद्योग और कृषि के मसले पर सहमति नहीं बनी तो वे दोहा दौर की वार्ता स्थगित कर देंगे.

बैठक के बाद भारत के वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने कहा कि वार्ता स्थगित हो गई है.

उन्होंने कहा कि अब दोहा दौर की बातचीत को फिर से आगे बढ़ाने में महीनों या वर्षों लग सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2001 में दोहा में हुई बैठक में डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों ने व्यापार का एजेंडा तैयार किया था जिसके कई पहलुओं पर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है.

पिछले वर्ष हाँगकाँग में हुई मंत्रिस्तरीय बैठक में भी किसानों को मिल रही सब्सिडी, औद्योगिक सामानों पर शुल्क और सेवा क्षेत्र से जुड़े कुछ मसलों पर सहमति नहीं बन पाई थी.

मुद्दा

कमलनाथ ने कहा है कि करोड़ों किसानों के हितों को नजरअंदाज कर भारत कोई समझौता नहीं कर सकता

अमीरका और यूरोपीय संघ की सब्सिडी और शुल्क नीति से विकासशील देश सहमत नहीं हैं.

भारत और ब्राज़ील की अगुआई में विकासशील देशों की माँग रही है कि धनी देश अपने किसानों को सब्सिडी देना कम करें.

दूसरी ओर विकसित देशों की माँग है कि विकासशील देशों के बाज़ार में उनके फ़ैक्ट्री निर्मित सामानों की निर्बाध पहुँच सुनिश्चित की जाए.

इसी मुद्दे पर पूरी बातचीत अटकी हुई है. डब्ल्यूटीओ के एक अधिकारी ने कहा, "जैसे जैसे समय बीत रहा है और कोई प्रगति नहीं हो रही है, हम निराश होते जा रहे हैं."

जिनीवा में जी-6 की बातचीत पिछले महीने भी हुई थी लेकिन यह बेनतीजा ख़त्म हो गई.

भारतीय वाणिज्य मंत्री कमलनाथ इस बैठक को बीच में ही छोड़ कर लौट आए थे.

इस बीच रूस में धनी देशों के समूह जी-8 की बैठक के दौरान इसके सदस्य देशों ने दोहा दौर की वार्ता पर अंतिम समझौते के लिए इस वर्ष अगस्त-सितंबर की समयसीमा तय की है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि जी-6 देशों के बीच सहमति नहीं बना पाने के बाद प्रगति होना काफ़ी मुश्किल लग रहा है.

उनके मुताबिक धनी और विकासशील देश अपने अपना रुख बदलने को तैयार नहीं हैं और असहमति की खाई बढ़ती जा रही है.

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