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मारुति के 8 फ़ीसदी शेयरों का विनिवेश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार ने मारुति उद्योग के विनिवेश का फ़ैसला किया है. सरकार अपनी आठ फ़ीसदी हिस्सेदारी बेचेगी. मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक के बाद भारी उद्योग मंत्री संतोष मोहन देव ने पत्रकारों को बताया, '' हमने मारूति की 8 फ़ीसदी का हिस्सेदारी बचने का फ़ैसला किया है.'' इसके बाद मारुति में सरकार की हिस्सेदारी 10.28 फ़ीसदी रह जाएगी. सरकार ने अपनी हिस्सेदारी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों सहित सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों को बेचने का फ़ैसला किया है. इस बिक्री के लिए सलाहकार भी नियुक्त किए जाएँगे. लेकिन वामपंथियों ने सरकार के इस फ़ैसले का विरोध किया है. वामपंथी ट्रेड यूनियन, सीटू के एमके पंधे ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वे सरकार के इस फ़ैसले से सहमत नहीं है और इसका विरोध किया जाएगा. सन् 2003 में सरकार के पास मारुति के 13.23 करोड़ शेयर थे और उसकी कंपनी में 45.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी. जून,2003 में सरकार ने घरेलू बाज़ार में कंपनी के 7.94 करोड़ शेयर यानी 27.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच दी थी. मारुति ब्रांड मारूति- भारत में कार का सपना मन में पालनेवाले हर परिवार के लिए एक चिर-परिचित शब्द है. अस्सी के दशक के शुरूआती वर्षों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने एक ऐसी कंपनी खोलने की बात की थी जो पूरी तरह से भारतीय कार बनाए. 1981 के फ़रवरी महीने में संसद में अधिनियम बनाकर मारूति उद्योग लिमिटेड की स्थापना की गई. जापान की सुज़ुकी मोटर कंपनी को भारत सरकार का साझीदार बनाया गया और 13 महीने के भीतर मारूति ने कार बनाना शुरू कर दिया. 14 दिसंबर 1983 को इंदिरा गांधी ने पहली कार की चाभी सौंपी. देखते-ही-देखते मारूति की कारें भारत की सड़कों पर दौड़ती नज़र आने लगीं. फ़िलहाल मारूति कार बाज़ार में फिर से अपनी पकड़ मज़बूत करने में जुटी है और कंपनी के जापानी हिस्सेदार सुज़ुकी का दावा है कि कंपनी भारत में अपने पाँव पसारती जाएगी. |
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