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बुधवार, 20 जुलाई, 2005 को 18:28 GMT तक के समाचार
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व्यापार प्रगति के लिए सीईओ फ़ोरम

भारत का सीईओ फ़ोरम
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी अमरीका यात्रा में भारत में अमरीकी निवेश पर काफ़ी ज़ोर दिया है लेकिन यह भी माना जा रहा है कि सहयोगी राजनीतिक पार्टियों के दबाव के कारण वो खुदरा क्षेत्र में सीधे अंतरराष्ट्रीय निवेश के मामले में कुछ नहीं कर पाए.

मगर इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की ओर एक महत्वपूर्ण क़दम उठाया गया है - दोनों देशों के उद्दोगपतियों का एक मंच मनाकर.

यह मंच सीईओ फ़ोरम के नाम से जाना जाएगा और भारत की ओर से इसमें टाटा संस के रतन टाटा, रिलायंस उद्योग समूह के मुकेश अंबानी, आइटीसी के वाई सी देवेश्वर, आइसीआईसीआई वन सोर्स के अशोक गांगुली, एचडीएफ़सी के दीपक पारेख जैसी हस्तियों को शामिल किया गया है तो वहीं अमरीका से माइक्रोसॉफ़्ट, सिटीग्रुप, कारगिल ऐंड हनीवेल जैसी कंपनियाँ हैं.

रतन टाटा का कहना है कि इसका मुख्य उद्देश्य है एक दूसरे के प्रति समझ और साझेदारी बढ़ाना. सीईओ फ़ोरम और व्यापार से जुड़े अन्य मामलों पर मैंने वाशिंगटन में बात की भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टीम के एक प्रमुख सदस्य मोंटेक सिंह अहलूवालिया से.

सीइओ फ़ोरम या मुख्य कार्यकारी अधिकारियों का ये फ़ोरम किस तरह से काम करेगा?

ये फ़ोरम स्वयं ही अपनी कार्यप्रणाली तय करेगा लेकिन इसके पीछे सोच ये थी कि भारत में निजी क्षेत्र में काफ़ी तरक्की हो रही है और कई क्षेत्रों में विकास के लिए ये अब प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं. तो ऐसे में एक ऐसा मंच बने जिसमें भारत के दस प्रमुख सीईओ अमरीका के दस प्रमुख कार्यकारी अधिकारियों के साथ सीधी बात करें. वैसे तो दोनों देशों के उद्योग संघ बात करते रहते हैं लेकिन यहाँ अंतर ये है कि भारत की ओर से इन दस नामों का चुनाव प्रधानमंत्री ने किया है और अमरीका की ओर से बुश प्रशासन ने.

क्या इसके पीछे ये भी सोच थी कि भारत और अमरीका के बीच व्यापार में जो रुकावटें हैं, बाधाएँ हैं उनपर सरकारों की जगह उद्दोगपति बात करें तो ज़्यादा बेहतर होगा?

देखिए परेशानियाँ और रूकावटें हर व्यापारिक संबंधों में होती हैं. अब भारत एक ऐसी स्थिति में आ गया है जहाँ हम नए आर्थिक संबंध तलाश कर रहे हैं. तो ये गुट एक तरह से भविष्य की योजनाओं को तय करने वाला गुट है. ये लोग आपस में तय करके बताएंगे कि भारत और अमरीका के व्यापार संबंध आने वाले दिनों में किस दिशा में बढ़ सकते हैं. साथ ही जो कुछ रुकावटें हैं उन्हें हम सरकार के स्तर पर भी दूर करने की कोशिश कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री की इस यात्रा से व्यापार के क्षेत्र में किस तरह का फ़ायदा हो पाया है?

देखिए, व्यापार तो सरकार नहीं तय करती है और न ही ये मुख्य एजेंडा था. लेकिन कई ऐसे समझौते हुए हैं जिनसे आर्थिक एजेंडा काफ़ी बढ़ गया है. उर्जा क्षेत्र में काफ़ी तरक्की हो सकती है.

परमाणु उर्जा के क्षेत्र में एक दूरगामी समझौता हुआ है और जैसा कि राष्ट्रपति बुश ने वादा किया है, यदि भारत के प्रति जो परमाणु नीति है वो क़ानून बदल जाता है तो भारत का परमाणु उर्जा कार्यक्रम बहुत तरक्की करेगा.

अमरीका ने पिछले कुछ समय में भारत-ईरान गैस पाइपलाइन योजना पर अपनी चिंताएँ जताई हैं, क्या उस पर भी कोई बात हुई है?

जी नहीं.

भारत में रीटेल सेक्टर या ख़ुदरा क्षेत्र को सीधा विदेशी निवेश के लिए खोलने के लिए लगातार वालमार्ट जैसी अमरीकी कंपनियाँ दबाव देती रही हैं. क्या इस दौरे में उस संबंध में कोई बात हुई?

दबाव नहीं था. लेकिन सही है कि कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ चाहती हैं कि हम ऐसा करें लेकिन सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया है. भारत में एक शोध करवाया है उपभोक्ता मंत्रालय ने. लेकिन यहाँ इस पर कोई बात नहीं हुई.

प्रधानमंत्री की इस यात्रा को कितना सफ़ल मानते हैं आप?

यह एक ऐतिहासिक दौरा कहलाएगा. उनकी कोशिश थी कि हम अपने रिश्तों को ऐतिहासिक साझेदारी में बदल दें और इसमें वो काफ़ी सफल रहे हैं. मुझे लगता है कि अमरीका ने भारत की क्षमता को पहचाना है और मेरी समझ में हमने एक नई शुरूआत की है.

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