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मंगलवार, 26 अप्रैल, 2005 को 07:40 GMT तक के समाचार
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इंडोनेशिया का भारतीय बाज़ार

जकार्ता का बाज़ार
जकार्ता में भारतीय दुकानों के नाम भी भारतीय ही मिलेंगे
इंडोनेशिया में रहने वाले प्रवासी भारतीय समुदाय की संख्या बीस लाख है, और राजधानी जकार्ता सहित देश के विभिन्न हिस्सों में कपड़ा व्यापार पर भारतीयों का अच्छा नियंत्रण है.

1940 के दशक में पंजाबी और सिंधी समुदाय के लोग भारत से यहा आकर सबसे पहले बसे थे.

छह दशक पहले रोज़गार की तलाश में इंडोनेशिया आए भारतीयों द्वारा की गई तरक्की का पता इस बात से चलता है कि जकार्ता के व्यस्त बाज़ार पासर बारु में बॉम्बे टेक्सटाइल, महाराजा और भारत की शान जैसे दुकानों के नाम हैं.

इस बाज़ार की खास बात ये है कि यहाँ की लगभग सभी कपड़े की दुकानों के मालिक भारतीय हैं.

विजय वासवानी
वासवानी जैसे कई कपड़ा व्यवसायी जकार्ता में धंधा करते हैं

अपने व्यापार और इंडोनेशियाई लोगों के साथ भारतीयों के रिश्तों के बारे में पासर बारु में कपड़े के एक बड़े शोरुम के मालिक विजय वासवानी का कहना है “यहाँ व्यापार अच्छा चल रहा है, और उच्च मध्यम वर्ग के ग्राहक हमारी दुकान पर आते है. इंड़ोनेशिया की जनता हम लोगों के साथ घुलमिल कर रहती है, और यहाँ दोस्ती की संस्कृति है. जब समुदायों में संवाद रहता है तो टकराव नहीं होता”.

बाहर से आए भारतीयों और इस पूर्वी एशियाई देश के मूल निवासियों के बीच किसी तरह के तनाव ना होने की बात का समर्थन इस बाज़ार के अन्य दुकानदार और कुछ ग्राहक भी करते हैं.

साथ ही इंडोनेशिया में बसे भारतीय यहाँ के कानून को जनता के प्रति संवेदनशील मानते हैं और व्यापारियों को लाइसेंस से लेकर मज़दूरों के लिए परेशान नहीं होना पड़ता.

लेकिन क्या मूल निवासियों को किसी अन्य देश के मालिकों के कारखानों और दुकानों पर काम करना अच्छा लगता है ?

इस सवाल का जवाब वृद्ध व्यापारी जेठानंद हरिलाल जवाहरलाल नेहरु के समय के इतिहास को याद करते हुए देते हैं “जब इंडोनेशिया को जापान से आज़ादी मिली, तो यहाँ का काफी क्षेत्र ह़ॉलैंड के कब्ज़े में था. उस समय पंडित नेहरु ने राष्ट्रपति सुकारणो की मदद करते हुए, इस पूरे क्षेत्र को वापिस दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.”

हरिलाल का ये भी कहना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय घटना का इंडोनेशिया में रहने वाले भारतीयों पर विपरीत असर नहीं पड़ा है.

वर्षों से इंडोनेशिया में बसे वज़ुर्ग तो अपने जीवन से खुश हैं, लेकिन जिन युवाओं से बात हुई वो अपने भविष्य को लेकर इतने आशांन्वित नहीं हैं, कारण है यहाँ की मूल जनता की तेज़ी से हो रही तरक्की.

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