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मंगलवार, 09 नवंबर, 2004 को 07:26 GMT तक के समाचार
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कचरे के ढेर से निकली रोज़ी-रोटी

कपड़ों की क़तरन से भी रुई बनने लगी
यह कबाड़ लाखों लोगों को रोज़ी देने लगा
यह कचरे के ढेर से रोज़ी-रोटी कमाने का मामला है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्योतिबा फुले नगर के ज़िला मुख्यालय अमरोहा ने क़रीब सौ साल पहले टैक्सटाइल वेस्ट यानी कपड़ा बनाने वाली मशीनों के कचरे से रुई तैयार करने की मशीन ईजाद की थी जिसने अब एक उद्योग का रूप ले लिया है.

एशिया में कॉटन वेस्ट की सबसे बड़ी मंडी के रूप में विख्यात अमरोहा ने एक तो कॉटन के कचरे से रुई का विकल्प तैयार किया है साथ ही इस काम से लाखों लोगों को रोज़गार भी मिला है.

विदेशों में भी पहचान बनाने वाली यह वैकल्पिक रुई भारत की क़रीब साठ फ़ीसदी आबादी द्वारा उपयोग में लाई जाती है.

शुरूआत में केवल कॉटन वेस्ट (बिनौले से रुई निकालने में बचे बेकार अवशेष) से ही रुई बनाने का काम किया जाता था लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवसाय ने उद्योग का रुप ले लिया.

इसके उपरांत टेक्सटाइल्स वेस्ट (कपड़े की कतरन) से रुई बनाने का काम किया जाने लगा और यह एक अनोखा उत्पादन साबित हुआ.

मिट्टी से सोना

इससे पहले कपड़ों के कतरन को जलाकर या कूड़े में डालकर नष्ट किया जाता था लेकिन इस उत्पादन से मिट्टी से सोना बनाने जैसा काम निकला.

कॉटन वेस्ट से रुई बनाने वाली मशीन

यह उद्योग टैक्सटाइल्स वेस्ट के नाम से प्रचलित हुआ और एशिया की नंबर एक टेक्सटाइल्स वेस्ट मंडी के रूप में स्थापित हो गया.

अमरोहा में इस उद्योग की क़रीब बारह सौ इकाइयाँ हैं. अहम बात ये है कि इस उद्योग में लगने वाली मशीनों की आपूर्ति देश भर में ही नहीं बल्कि नेपाल और बांग्लादेश में भी अमरोहा से ही की जाती है.

यहाँ पर हर रोज़ लगभग पाँच सौ टन रुई का उत्पादन होता है जिसके लिए टेक्सटाइल्स वेस्ट पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र आदि राज्यों के अलावा यूरोप, चीन बांग्लादेश आदि देशों से आता है.

तैयार माल देश भर में तो जाता ही है साथ ही बांग्लादेश, नेपाल, चीन, जापान आदि देशों को निर्यात भी किया जाता है. यह रुई सफ़ेद रंग के साथ ही कई लुभावने रंगों में तैयार की जाती है जोकि प्राकृतिक रुई का बेहतर विकल्प माना जाता है.

व्यापक उपयोग

इस टेक्सटाइल्स वेस्ट से तैयार रुई से खेस, दरी, क़ालीन वग़ैरा बनाई जाती हैं और देश भर में लिहाफ़, गद्दे, तकिए, सोफ़ा, वग़ैरा टेक्सटाइल्स वेस्ट का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है.

इस कारोबार में लगे लोग बताते हैं कि अमरोहा में दो लाख जबकि देश भर में क़रीब तीस लाख लोगों को इस उद्योग से रोज़गार मिल रहा है.

कॉटन वेस्ट की धुलाई
कचरे की धुलाई करके सफ़ेद बनाया जाता है

सरकार को भी बड़ी रक़म कर के रूप में मिलती है तथा इसके निर्यात से विदेशी मुद्रा भी.

लेकिन इस उद्योग में लगे लोगों का कहना है कि इस कारोबार को किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिल रही है.

अमरोहा टैक्सटाइल्स वेस्ट एसोसिएशन के महासचिव रियाज़ुद्दीन मंसूरी इस उद्योग के प्रति सरकार के उदासीन रवैए से नाराज़ नज़र आते हैं. मंसूरी कहते हैं, "सरकार सुविधाएँ देने के बजाय तरह-तरह के कर लगा देती है."

मंसूरी अब तक वह सात तरह के करों के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटा चुके हैं.

मंसूरी कहते हैं, "यह उत्पादन नहीं होता तो सरकार को बड़ी मात्रा में आयात करना पड़ता और कर के रूप में मिलने वाले राजस्व का भी नुक़सान होता."

एसोसिएशन के अध्यक्ष हाजी महबूब हसन मंसूरी कहते हैं कि यदि सरकार इस उद्योग को मिलने वाली सभी सुविधाएँ और क़र्ज़ सब्सिडी, मंडी स्थल, बिजली की समुचित व्यवस्था कर दे तो इस उद्योग में चार चाँद लग सकते हैं जिसका सीधा फ़ायदा देश की अर्थव्यवस्था को होगा.

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