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फैशन का नया अंदाज़, बाँस के लिबास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाँस की बात करने पर आपको बाँसुरी का ध्यान तो आ सकता है पर बाँस से कपड़ा? शायद ये आप नहीं सोच पाएँ, लेकिन यह सच है. बाँस से बनने वाला कपड़ा अपनी ख़ासियतों के चलते धीरे-धीरे बाज़ार पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रहा है. हस्तशिल्प विभाग की विकास-आयुक्त टीनू जोशी का कहना है कि "फिलीपींस के दौरे पर जब मैंने केले और अनानास के रेशे से बने कपड़े देखे तो भारत में इसे बाँस पर आज़माने की सोची, और इसके बेहतरीन परिणाम सबके सामने हैं." अब दिल्ली की एक कंपनी व्यवासायिक तौर पर इस कपड़े को बना रही है. सर्दी हो या गर्मी, हर तरह की आबो-हवा को ध्यान में रख कर बाँस के रेशे को कपास, रेशम और ऊन के साथ मिला कर नया रुप भी दिया जा रहा है. जहाँ रेशम मिला कपड़ा भारतीय डिज़ाइनरों की पहली पसंद बना है तो वहीं सिर्फ़ बाँस से बना कपड़ा विदेशों में खूब पसंद किया जा रहा है. बढ़ती माँग भारत में बाँस के कपड़े को बनाने वाली कंपनी के प्रमुख सुशांतो मित्रा का कहना है कि "ब्राज़ील, अमरीका, बेल्जियम और ब्रिटेन में इस कपड़े की काफी माँग है और अभी से इसकी माँग इतनी बढ़ गई है कि उसे पूरा करना मुश्किल हो रहा है." इसी संस्था की निदेशक कांता गिरी का कहना है कि "उचित क़ीमत, नई डिज़ाइन और सही मार्केटिंग से ये दूसरे कपड़ों को पीछे छोड़ सकते हैं. उन्होंने बताया कि शोध से पता चला है कि बाँस से बना कपड़ा प्राकृतिक रुप से बैक्टीरियारोधी है, सूत से दो प्रतिशत अधिक ठंडक देता है और दूसरे कपड़ो की तरह ही मज़बूत और मुलायम है." तो तैयार हो जाएँ बाँस से बनी साड़ियाँ, टी-शर्ट, कुर्ते और स्कार्फ पहनने के लिए. और तो और, इस कपड़े को फ़र्निशिंग के काम में भी लिया जा रहा है. मशहूर फैशन डिज़ायनर मधु जैन तो इसे ग़रीबों का कपड़ा मानती हैं, उनका कहना है कि "सस्ता और टिकाऊ होने की वजह से ये जल्दी ही लोकप्रिय हो जाएगा, इस कपड़े पर हर रंग खिलता है और इसकी ‘फॉल‘ भी बहुत बढ़िया आती है इसलिए ये हम डिज़ाइनरों का भी मनपसंद कपड़ा बनने वाला है." पहली नज़र में आप बाँस से बने कपड़े को पहचान ही नहीं पाएँगे और यही इसकी ख़ासियत भी है. लोकप्रिय मॉडल मिलिंद सोमन का कहना है कि "पहनने पर मुझे ये बेहद आरामदेह और अविश्वसनीय रुप से मुलायम लगा." सुनहरा भविष्य भारत में क़रीब 90 लाख हेक्टेयर में बाँस की लगभग 136 किस्में उगाईं जातीं हैं.
इनमें कई किस्में ऐसी हैं जो कपड़ा बनाने के काम आ सकती हैं, और चूंकि बाँस का पेड़ लगभग तीन साल में ही बड़ा हो जाता है, इसलिए भारी पैमाने पर उत्पादन में काम आने पर भी पर्यावरण पर इसका कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. टीनू जोशी के अनुसार "बाँस उत्पादकों और इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की सहायता के लिए एक सरकारी तकनीकी मिशन भी बनाया गया है." बाँस के इस नए इस्तेमाल ने इसे उगाने वालों और बुनकरों को रोज़गार का एक नया ज़रिया दिया है. अभी तक ये कपड़ा मध्य प्रदेश के चंदेरी में ही बनाया जा रहा है, लेकिन धीरे-धीरे इसे उन इलाक़ो में भी बनाया जाएगा जहाँ बाँस की पैदावार ज़्यादा होती है. ऐसा लगता है बाँस का कद और बढ़ गया है. |
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