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एससीओ समिट: पुतिन आए, शी जिनपिंग आए लेकिन पीएम मोदी क्यों नहीं आए, क्या हैं इसके मायने
- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ समिट कज़ाख़स्तान में तीन से चार जुलाई तक है.
एससीओ में चीन, पाकिस्तान, रूस और भारत समेत नौ सदस्य देश हैं. एससीओ को बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है.
कज़ाख़स्तान में होने वाली एससीओ की 24वीं बैठक में सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुख शामिल हो रहे हैं. मगर भारत की तरफ़ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में शामिल नहीं हुए.
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर इस बैठक में शामिल होने के लिए अस्ताना पहुंच गए हैं.
जयशंकर एससीओ बैठक में भारत का नेतृत्व कर रहे हैं.
इस बैठक में एससीओ के बीते 20 सालों की गतिविधियों की समीक्षा की जाएगी और आपसी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की जाएगी.
विदेश मंत्रालय के जारी बयान के मुताबिक़, एससीओ में भारत की प्राथमिकता प्रधानमंत्री के 'सेक्योर एससीओ' विज़न पर आधारित होगी. भारत का ज़ोर सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, सहयोग, संपर्क, एकता, संप्रभुता का सम्मान, क्षेत्रीय एकता और पर्यावरण सुरक्षा पर है.
एससीओ बैठक में शामिल होने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, पाकिस्तान के पीएम शहबाज़ शरीफ़ कज़ाख़स्तान पहुंच चुके हैं.
मगर पीएम मोदी ने कज़ाख़स्तान नहीं जाने का फ़ैसला किया. आख़िर इसकी वजह क्या हो सकती है?
मोदी के शामिल ना होने की वजह
जेएनयू में मध्य एशिया और रूसी अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार संजय पांडे से बीबीसी ने यही समझने की कोशिश की.
प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, ''नई सरकार गठन के बाद पीएम मोदी की व्यस्तताएं हैं, पर हमें ये भी देखना होगा कि पिछले साल जब भारत एससीओ का अध्यक्ष था, तब भी हमने वर्चुअल समिट करवाया था. कहीं न कहीं इससे ये आशय निकाला जा सकता है कि भारत की प्राथमिकता में एससीओ नहीं है.''
कज़ाख़स्तान ना जाने से पीएम मोदी को राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ़ के साथ मंच साझा नहीं करना होगा.
चीन और पाकिस्तान दोनों ही देशों से भारत के संबंध काफी वक़्त से ख़राब चल रहे हैं.
पीएम मोदी अगले हफ़्ते रूस के दौरे पर जाने वाले हैं, वहां उनकी मुलाक़ात राष्ट्रपति पुतिन से होगी.
माना जा रहा है कि एससीओ में पीएम मोदी की ग़ैर-मौजूदगी से मध्य एशियाई देशों के नेताओं को निराशा हो सकती है.
बीते सालों में ऐसा दूसरी बार हो रहा है, जब पीएम मोदी की इन नेताओं के साथ पहले से तय मुलाक़ात रद्द हुई है.
इससे पहले साल 2022 के भारत के गणतंत्र दिवस में कोरोना के कारण ये नेता दिल्ली नहीं आ सके थे.
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर लिखा है, ''पीएम मोदी संसद में सत्र के कारण एससीओ समिट में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, इसी की भरपाई जुलाई में रूस दौरे से करेंगे.''
आगे भी एससीओ से मोदी रहेंगे दूर?
साल 2023 में एससीओ समिट को भारत ने वर्चुअल करवाया था.
एससीओ समिट की अगली बैठक इस साल के आख़िर में पाकिस्तान में होनी है. 2025 में ये बैठक चीन में होनी है.
ऐसे में भविष्य के एससीओ समिट में भी पीएम मोदी के शामिल होने की संभावनाओं पर सवाल हैं.
प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, ''एससीओ की बात करें तो ये समूह चीन और कुछ हद तक रूस की ओर से संचालित माना जाता है. वर्तमान में इन दोनों देशों के संबंध अमेरिका और पश्चिम देशों के साथ अच्छे नहीं हैं. इस परिप्रेक्ष्य में भी भारत के निर्णय को देखा जा सकता है.''
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने निक्केई एशिया वेबसाइट पर एक लेख लिखा है.
इस लेख में ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, ''एससीओ में अपनी भागीदारी को लेकर भारत फिर से विचार कर रहा है. एससीओ की पहचान पश्चिम विरोधी समूह की रही है. वहीं पीएम मोदी विदेश नीति के मामले में पश्चिम की तरफ झुकाव रखते हैं.''
चेलानी ने लिखा है, ''भारत के अलावा एससीओ के सभी सदस्य चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना का हिस्सा हैं. भारत इस परियोजना का विरोध करता रहा है. एससीओ के देशों में भारत ही पूरी तरह से लोकतांत्रिक देश है. एससीओ में चीन की बढ़ती भूमिका भी भारत को असहज कर रही है.''
पीएम मोदी के एससीओ समिट में ना जाने की वजह संसद सत्र को भी बताया जा रहा है.
मगर ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, ''अधिकारी ये कहेंगे कि मोदी संसद सत्र के कारण कज़ाख़स्तान नहीं गए पर अतीत में संसद सत्र के दौरान पीएम मोदी विदेश जा चुके हैं. इस समूह में भारत एक तरह से फिट नहीं बैठ रहा है. मोदी भारत के सबसे अधिक अमेरिकी समर्थक प्रधानमंत्री के तौर पर देखे जाते हैं जबकि एससीओ की छवि पश्चिम विरोधी वाली है.''
एससीओ में भारत
भारत और पाकिस्तान साल 2017 में एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बने थे. अभी एससीओ के नौ सदस्य हैं.
सदस्य देशों में भारत, ईरान, क़ज़ाख़स्तान, चीन, कीर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, तजाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान शामिल हैं.
इससे पहले अप्रैल 1996 में शंघाई में हुई एक बैठक में चीन, रूस, कज़ाख़स्तान,कीर्गिस्तान और तजाकिस्तान आपस में एक-दूसरे के नस्लीय और धार्मिक तनावों से निपटने के लिए सहयोग करने पर राज़ी हुए थे. तब इसे शंघाई-फ़ाइव के नाम से जाना जाता था.
प्रोफ़ेसर संजय पांडे ने कहा, ''भारत सोच समझकर एससीओ का सदस्य बना था. लेकिन अब भारत एससीओ को बहुत महत्व नहीं देता है. आने वाले समय में रूस में ब्रिक्स समिट होना है. पूरी उम्मीद है कि वहां प्रधानमंत्री जाएंगे. ब्रिक्स ऐसा समूह है, जहां रूस और चीन के अलावा कई ऐसे देश हैं, जिनकी अपनी पहचान है, स्वतंत्र विदेश नीति है, जैसे साउथ अफ्रीका.''
प्रोफ़ेसर पांडे कहते हैं, ''एससीओ की सदस्यता इस ओर ध्यान दिलाती है कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है. अगर वो अमेरिका के साथ क्वाड में रह सकता है तो रूस और चीन के साथ एससीओ में बना रहेगा.''
ब्रह्मा चेलानी अपने लेख में लिखते हैं, ''सच तो ये है कि एससीओ की सदस्यता से भारत को कुछ ही रणनीतिक फ़ायदा मिला है. भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता दिखाने के लिए एससीओ की सदस्यता का सांकेतिक महत्व है.''
चीन की अगुवाई वाले समूह और भारत की असहजता
सितंबर 2023 में जब भारत में जी-20 सम्मेलन हुआ था, तब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत नहीं आए थे.
इससे पहले अगस्त 2023 में जब दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स सम्मेलन हुआ था, तो उसमें भी जिनपिंग और मोदी का आमना-सामना तो हुआ था. मगर दोनों के बीच कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई थी.
बीते साल जब भारत एससीओ की अध्यक्षता कर रहा था तो उसने ये समिट ऑनलाइन करवाया था.
क्या भारत चीन की अगुवाई वाले समूहों से कुछ असहज है?
प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, ''भारत असहज तो है पर वो इन समूह में बना रहेगा. क्योंकि ये समूह पश्चिम विरोधी तो हैं लेकिन भारत विरोधी ना हो जाएं. भारत की बात वहां तक पहुंचती रहे. एससीओ में कई ऐसे देश हैं, जिनसे भारत के अच्छे संबंध हैं और वो इन संबंधों को बनाए रखेगा. भारत चाहेगा कि ये देश एंटी इंडिया ग्रुपिंग का हिस्सा ना बन जाएं. भारत इससे जुड़ा तो रहेगा. पर पूरी तरह से केंद्रित नहीं रहेगा.''
प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, ''जिनपिंग का दिल्ली ना आना भारत के लिए अच्छा रहा. उससे चीन जी-20 के केंद्र में नहीं दिखा, भारत दिखा. मुझे नहीं लगता कि जी-20 में जिनपिंग के ना आने के जवाब के तौर पर इसको देखा जाना चाहिए.''
ब्रिक्स हो या एससीओ- रूस, चीन और भारत इन तीनों का हिस्सा हैं. भारत के रूस से अच्छे संबंध हैं.
तो क्या रूस भारत और चीन की दोस्ती करवा सकता है?
प्रोफ़ेसर संजय पांडे ने जवाब दिया, ''ऐसा माना जाता है कि डोकलाम विवाद के समय रूस ने चीन से बातचीत की थी. रूस ने चीन से कहा था कि इसका कोई समाधान होना चाहिए. इसके बाद भी रूस चाहता है कि चीन और भारत के संबंध अच्छे रहें. ताकि रूस को इन दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखने में दिक़्क़त ना हो. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस चीन पर ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है. इसलिए अब रूस उतनी भूमिका नहीं निभा पा रहा है.''
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