इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस, जजों को हटाने की क्या है प्रक्रिया

इन दिनों इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ख़ूब सुर्ख़ियाँ बटोर रहे हैं.

पिछले दिनों विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक कार्यक्रम में उनकी टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हो गया था.

अब कई विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा में उनके ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस भेज दिया है.

राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की अगुआई में सदन के सेक्रेटरी जनरल को ये नोटिस सौंप दिया गया.

इस नोटिस पर राज्यसभा के 55 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं.

श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ़्रेंस के सांसद आग़ा सईद रुहुल्लाह मेहदी ने बताया कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस नोटिस का समर्थन किया है.

इन सांसदों में तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट करके लिखा है कि उन्होंने अपनी पार्टी के अन्य सांसदों के साथ जस्टिस यादव के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं.

कैसे शुरू हुआ विवाद

रविवार यानी आठ दिसंबर को वीएचपी के विधि प्रकोष्ठ (लीगल सेल) ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के लाइब्रेरी हॉल में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था. इस कार्यक्रम में जस्टिस शेखर यादव के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक और मौजूदा जज जस्टिस दिनेश पाठक भी शामिल हुए.

कार्यक्रम में 'वक़्फ़ बोर्ड अधिनियम', 'धर्मांतरण-कारण एवं निवारण' और 'समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता' जैसे विषयों पर अलग-अलग लोगों ने अपनी बात रखी.

इस दौरान जस्टिस शेखर यादव ने 'समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता' विषय पर बोलते हुए कहा कि देश एक है, संविधान एक है तो क़ानून एक क्यों नहीं है?

लगभग 34 मिनट की इस स्पीच के दौरान उन्होंने कहा, "हिन्दुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यकों के अनुसार ही देश चलेगा. यही क़ानून है. आप यह भी नहीं कह सकते कि हाई कोर्ट के जज होकर ऐसा बोल रहे हैं. क़ानून तो भैय्या बहुसंख्यक से ही चलता है."

जस्टिस शेखर यादव ने ये भी कहा कि 'कठमुल्ले' देश के लिए घातक हैं.

जस्टिस यादव कहते हैं, "जो कठमुल्ला हैं, 'शब्द' ग़लत है लेकिन कहने में गुरेज़ नहीं है, क्योंकि वो देश के लिए घातक हैं. जनता को बहकाने वाले लोग हैं. देश आगे न बढ़े इस प्रकार के लोग हैं. उनसे सावधान रहने की ज़रूरत है."

इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अयोध्या में मौजूद राम मंदिर पर भी अपनी बात रखी.

उन्होंने कहा, "कभी कल्पना की थी क्या आपने कि हम राम मंदिर को अपनी आंखों के सामने देखेंगे, लेकिन देखा है आपने. हमारे पूर्वज तमाम बलिदान देकर चले गए इसी आस में कि हम रामलला का भव्य मंदिर बनते देखेंगे लेकिन वो देख नहीं पाए. किया उन्होंने, लेकिन देख आज हम रहे हैं."

उनकी इन्हीं टिप्पणियों पर विवाद हो गया है. उनके विवादित बयान वाले वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हैं. कई नेता, वकील और बुद्धिजीवी उनके बयान की आलोचना कर रहे हैं. इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि एक मौजूदा जज का ऐसे कार्यक्रम में शामिल होना कितना उचित है.

हालाँकि बीबीसी के साथ बातचीत में जस्टिस शेखर यादव ने कहा है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर चलाया जा रहा है.

जजों को हटाने की क्या है प्रक्रिया

संविधान में जजों को हटाने की पूरी प्रक्रिया बताई गई है. संविधान के अनुच्छेद 124(4), (5), 217 और 218 में इन प्रक्रियाओं का ज़िक्र है.

इसके तहत सबसे पहले जजों को हटाने के लिए नोटिस देना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत संसद के किसी भी सदन यानी लोकसभा या राज्यसभा में हो सकती है.

इसके लिए सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस देना पड़ता है. अगर ये नोटिस लोकसभा में दिया जा रहा है, तो इसके लिए 100 या इससे अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए.

अगर ये प्रक्रिया राज्यसभा में शुरू हो रही है, तो इसके लिए 50 या इससे अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए.

नोटिस के बाद अगर लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के सभापति को इसे स्वीकार करते हैं, तभी किसी जज को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.

संविधान के प्रावधानों के अनुसार अगर ये नोटिस स्वीकार होता है, तो सदन के चेयरमैन या स्पीकर तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन करते हैं, ताकि जजों को हटाने के लिए जो आधार बताए जा रहे हैं, उनकी जाँच हो सके.

इस समिति में ये सदस्य होते हैं-

  • सुप्रीम कोर्ट के एक जज
  • एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
  • चेयरमैन या स्पीकर की सहमति से चुने गए एक न्यायविद

अगर ये नोटिस संसद के दोनों सदनों में स्वीकार किया जाता है, तो जाँच समिति का गठन लोकसभा के स्पीकर और राज्य सभा के सभापति मिलकर करते हैं.

ऐसी स्थिति में जिस सदन में बाद में नोटिस दिया जाता है, उसे रद्द माना जाता है. जाँच समिति अपनी पड़ताल के बाद औपचारिक रिपोर्ट बनाती है. इस रिपोर्ट को संबंधित सदन के स्पीकर को दिया जाता है.

सदन के स्पीकर इस रिपोर्ट को सांसदों के सामने रखते हैं.

अगर जाँच रिपोर्ट में जज को दोषी पाया जाता है, तो जज को हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में मतदान के लिए रखा जाता है.

संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के मुताबिक़ जज को हटाने की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ती है, जब इस प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों में से बहुमत का समर्थन मिलता है.

साथ ही प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों की दो तिहाई संख्या से कम नहीं होनी चाहिए.

जज को हटाने की सारी प्रक्रिया अगर पूरी हो जाती है, तो ये प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास जाता है. इसके बाद राष्ट्रपति के आदेश पर ही जज हटाए जा सकते हैं.

अब तक नहीं हटाया जा सका है कोई जज

वर्ष 1991 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी रामास्वामी को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी.

जाँच समिति ने भी उन्हें दोषी पाया था. लेकिन महाभियोग प्रस्ताव को पर्याप्त सांसदों का समर्थन नहीं मिला. इस कारण ये प्रस्ताव गिर गया.

वर्ष 2011 में सिक्किम हाई कोर्ट के जज पीडी दिनाकरन को भी हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी.

मामला जाँच समिति तक गया. लेकिन इस प्रक्रिया को उस समय रोकना पड़ा, जब जस्टिस दिनाकरन ने जाँच समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया.

वर्ष 2011 में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के ख़िलाफ़ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी. जाँच समिति ने भी उन्हें दोषी पाया. महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा में काफ़ी समर्थन मिला. लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले ही जस्टिस सौमित्र सेन ने इस्तीफ़ा दे दिया.

वर्ष 2015 में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस पार्दीवाला को भी हटाने का प्रस्ताव आया था. मामला था आरक्षण के ख़िलाफ़ उनके फ़ैसले में 'जातिगत टिप्पणी' का. लेकिन ये प्रस्ताव उस समय बेमानी हो गया, जब जस्टिस पार्दीवाला ने अपने फ़ैसले में से विवादित टिप्पणी को हटा दिया.

2015 में ही मध्य प्रदेश के हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेले को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. लेकिन राज्य सभा की जाँच समिति ने उन्हें क्लीन चिट दे दी.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के ख़िलाफ़ 2016 और 2017 में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी. लेकिन जाँच समिति के गठन से पहले ही दोनों ही बार इस प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)