मोदी-शाह ने क्या विपक्षी एकता की काट खोज ली है, कांग्रेस और दूसरे दलों के पास क्या है प्लान

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने एनडीए में शामिल होने का एलान किया है.

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का बड़ा जनाधार पूर्वी उत्तर प्रदेश में है.

इसे उत्तर प्रदेश के राजभर समुदाय का समर्थन हासिल है, जो राज्य की आबादी में चार फीसदी के बराबर है.

राजभर 2017 में बनी योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री थे लेकिन उपेक्षा का आरोप लगा कर उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. 2022 का विधानसभा चुनाव उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ मिल कर लड़ा था.

राजभर के अलावा घोसी से समाजवादी पार्टी के दारा सिंह चौहान ने भी बीजेपी के साथ जाने के संकेत दिए थे. अब उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है.

उन्होंने दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की है. माना जा रहा है कि वो जल्द ही बीजेपी में शामिल होने का एलान कर सकते हैं.

राजभर की तरह ही ओबीसी समुदाय से आने वाले चौहान भी 2017 की योगी सरकार में मंत्री थे. लेकिन 2022 का चुनाव उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीता था.

2017 में योगी सरकार से इस्तीफा देने के बाद ओमप्रकाश राजभर पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को आड़े हाथ लेते रहे थे.

राजभर ने अपने कई बयानों में उन्हें 'झूठा' करार दिया था.

लेकिन अमित शाह ने रविवार को ट्वीट कर राजभर के एनडीए में शामिल होने का स्वागत किया.

मोदी-शाह की पुराने 'दोस्तों' के दर पर दस्तक

मोदी, शाह और योगी की कड़ी आलोचना करते रहे ओमप्रकाश राजभर की पार्टी को एनडीए में शामिल करना ये बता रहा है कि बीजेपी ने अपने पुराने सहयोगियों को दोबारा अपने पाले में लेने की कोशिश किस कदर तेज कर दी है.

खास कर विपक्षी दलों की एकता के लिए पटना में हुई बैठक के बाद बीजेपी अपनी तैयारियों में ज्यादा चाक-चौबंद दिख रही है

अमित शाह ने विपक्षी दलों की पटना की बैठक को '20 लाख करोड़ रुपये का घोटाला करने वाली पार्टियों की बैठक' करार दिया था.

लेकिन इसके बाद जैसे ही बेंगलुरू में विपक्षी दलों की दूसरी बैठक की ख़बरें आने लगीं, बीजेपी की ओर से एनडीए के अपने सहयोगियों के साथ बैठक करने की चर्चा भी तेज हो गई है.

बेंगलुरू में विपक्षी दलों की बैठक 17 और 18 जुलाई को हो रही है. वहीं बीजेपी ने भी नई दिल्ली में एनडीए के सहयोगी दलों की बैठक 18 को ही बुलाई है.

बीजेपी की ये बैठक संसद के मानसून सत्र शुरू होने से दो दिन पहले हो रही है.

कहा जा रहा है कि ये बैठक सदन में सहयोगी दलों के बीच समन्वय की रणनीति पर विचार करने के लिए बुलाई गई है.

लेकिन माना जा रहा है कि ये बीजेपी की ओर से एनडीए के नए-पुराने सहयोगियों को एकजुट करने की कवायद है.

एनडीए की बैठक के लिए किसे न्योता

‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि एनडीए के नए-पुराने सहयोगियों को मिलाकर कुल 19 पार्टियां इस बैठक में हिस्सा लेने की पुष्टि कर चुकी हैं.

मेघालय के मुख्यमंत्री और बीजेपी की सहयोगी पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी के प्रमुख कोनार्ड संगमा,एनडीडीपी प्रमुख और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल, आरपीआई के रामदास अठावले, शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे, एनसीपी के एक गुट के नेता अजित पवार, जन सेना पार्टी के पवन कल्याण भी इसमें शामिल होंगे.

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी और लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास पासवान) के प्रमुख चिराग पासवान ने इस बैठक शामिल होने की मंजूरी दे दी है.

उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, संजय निषाद की निषाद पार्टी, हरियाणा में बीजेपी की सहयोगी जेजेपी, तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक, तमिल मानिला कांग्रेस, आईएकेएमके (तमिलनाडु), आजसू, सिक्किम की पार्टी एसकेएफ, जोरम थंगा के नेतृत्व वाले मिजो नेशनल पार्टी और असम की असम गण परिषद भी बैठक में हिस्सा ले रही हैं.

सूत्रों के मुताबिक़ एनडीए की पुरानी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी को एनडीए में शामिल करने की कोशिश हो रही है.

हालांकि इनमें से किसी भी पार्टी ने ये नहीं कहा है कि वे इस बैठक में हिस्सा लेने जा रही हैं. शिरोमणि अकाली दल कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ किसानों का समर्थन करते हुए सरकार से अलग हुआ था.

बीजेपी कर रही छोटी पार्टियों की मनुहार

एनडीए में रहे दलों को दोबारा जोड़ने के मामले में इस बार एनडीए के रुख में थोड़ा बदलाव भी दिख रहा है.

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के चीफ चिराग पासवान को एनडीए में शामिल करने की बातचीत के लिए खुद केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय उनके पास पहुंचे थे.

राय बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा की चिट्ठी लेकर उनके पास पहुंचे थे. चिराग को एनडीए में शामिल करने के लिए राय उनसे दो बार मिल चुके हैं.

जबकि पिछले साल ही पासवान परिवार से नई दिल्ली स्थित 12 जनपथ का उनका सरकारी आवास खाली करवा लिया गया था. ये बंगला उनके पिता स्वर्गीय रामविलास पासवान के नाम आवंटित था.

चिराग पासवान ने इस तरह बंगला खाली करवाने को ‘अपमानजनक’ करार दिया था. इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ कानूनी मदद लेने के बाद भी उनकी कोशिश नाकाम रही थी.

इस ‘कड़वाहट’ के एक साल बाद बीजेपी का चिराग पासवान की पार्टी से गठबंधन की दिलचस्पी बताता है कि बीजेपी विपक्षी पार्टियों की एकता को कोशिश को गंभीरता से ले रही है.

भले ही उसके नेता सार्वजनिक तौर पर विपक्षी एकता की कोशिशों को खारिज करते रहें.

दिलचस्प ये है कि लोक जनशक्ति पार्टी के दूसरे गुट के नेता चिराग पासवान के चाचा पशुपति नाथ पारस को भी एनडीए की बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया गया है.

विपक्ष की क्या है रणनीति?

एनडीए के अपने पुराने और नए सहयोगियों को दोबारा गोलबंद करने की बीजेपी की ये कवायद क्या विपक्षी पार्टियों की एकता की कोशिश की काट है.

क्या बीजेपी और सहयोगी दलों को 2024 में अपनी सीटोंं में बड़ी गिरावट की चिंता सता रही है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं,‘’2019 के चुनाव में बीजेपी ने कई राज्यों में एकतरफा जीत हासिल की थी. लेकिन दस साल के बाद उस लेवल को बनाए रखना बड़ा मुश्किल है.दस साल में सत्ता विरोधी माहौल तो बन ही जाता है. दूसरी बड़ी बात ये है कि लोगों को अब बेरोजगारी और महंगाई के सवाल परेशान करने लगे हैं. यही वो मुद्दे हैं, जो विपक्ष के लिए मौका मुहैया करा सकते हैं.’’

लेकिन सवाल ये है कि बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए की इन कमजोरियों को विपक्षी दल भुना पाएंगे. क्या उनकी रणनीति इतनी सधी होगी कि वो 2024 में चुनावी फायदा उठा सकें.

नीरजा चौधरी कहती हैं.’’कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल सीधे मुकाबले की रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं. यानी जिन सीटों पर विपक्ष को जीतने की संभावना दिख रही हो वहां संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार खड़े हों.’’

वो कहती हैं ‘’2019 के चुनाव में भी एनडीए को 37 फीसदी वोट मिले थे. 63 फीसदी वोट विपक्षी दलों के खाते में गए थे.विपक्ष इसी 63 फीसदी वोटों को एक जगह इकट्ठा करने की कोशिश में है. उसे लग रहा है कि अगर वो बीजेपी और सहयोगी दलों की 70-80 सीटें भी घटा सकी तो चुनावी नतीजों पर बड़ा फर्क पड़ सकता है.’’

बीजेपी तीन चीजों को ध्यान में रख कर काम कर रही है. पहली सत्ता विरोधी लहर की आशंका, दूसरी 2019 जैसा प्रदर्शन न होने के आसार और तीसरी 40 से 50 सीटों के नुकसान का डर.

पार्टी इन्हीं तीन पहलुओं को देखकर छोटी-छोटी पार्टियों का भी सहयोग लेने की कोशिश में है.

बिहार में हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा, लोक जनशक्ति पार्टी और यूपी में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसी पार्टियों को साथ लेना इसी रणनीति का हिस्सा है.

किसकी रणनीति कितनी दमदार?

‘द प्रिंट’ के राजनीतिक संपादक डीके सिंह कहते हैं,‘’इन पार्टियों के चार, पांच या छह फीसदी वोटों के समर्थन से चुनावी नतीजों पर काफी फर्क पड़ सकता है. 2014 में बीजेपी ने बिहार में छोटी-छोटी पार्टियों की मदद से काफी अच्छा प्रदर्शन किया था. इस बार तो वहां विपक्ष काफी मजबूत है. ऐसे में इन छोटी-छोटी पार्टियों के पांच, छह या सात फीसदी वोटों से बीजेपी को काफी फायदा हो सकता है.’’

हालांकि वो ये भी कहते हैं कि छोटी पार्टियों की तुलना में शिरोमणि अकाली दल, तेलुगुदेशम,अन्नाद्रमुक जैसी बड़ी पार्टियों का साथ नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है.

डीके सिंह कहते हैं,‘’एनडीए की सहयोगी पार्टियों को साथ लाने की ये कोशिश कितनी कारगर होगी ये आने वाले दिनों में होने वाली सौदेबाजी पर निर्भर करेगी.’’

वो कहते हैं,‘’महाराष्ट्र को देखें तो पाएंगे कि वहां तीन अलग-अलग पार्टी सरकार में पार्टनर हैं. इसलिए ये देखना होगा कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना,अजित पवार का गुट और बीजेपी में सीटों पर कैसा तालमेल होता है. तेलुगुदेशम पार्टी साथ आएगी या नहीं. चिराग पासवान और उनके चाचा में तालमेल होगा कि नहीं. ये सारे सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब अभी नहीं मिल सकता.’’

उनकी नज़र में फिलहाल बीजेपी की ये कोशिश विरोधियों पर मानसिक दबाव डालने की रणनीति है.

2024 के चुनाव में अभी आठ-नौ महीने का वक़्त है और जैसे-जैसे ये नजदीक आएगा तस्वीर साफ होने लगेगी.

'मोदी बनाम एकजुट विपक्ष'

कइयों को लगता है कि विपक्षी दलों में नेतृत्व या प्रधानमंत्री पद का तथाकथित झगड़ा एनडीए के ख़िलाफ़ उनकी गोलबंदी कमजोर कर सकती है.

लेकिन नीरजा चौधरी इस नज़रिये से इत्तेफाक नहीं रखतीं.

वह कहती हैं,’’लीडरशिप के सवाल को लेकर विपक्षी दल सधी हुई चाल चल रहे हैं. उनका कहना है कि ये चुनाव मोदी बनाम मोदी होगा.यानी मुकाबला मोदी समर्थकों और मोदी विरोधियों के बीच होगा.वो फिलहाल मोदी के सामने अपना कोई लीडर सामने नहीं ला रहे हैं.’’

नीरजा चौधरी कहती हैं,‘’यूपीए पिछली बार 17 पार्टियों को साथ लाने की कोशिश कर रही थी. इस बार वो 24 पार्टियों को साथ लाने की कवायद में लगी है. कांग्रेस इस बार नेतृत्व को लेकर सतर्क रवैया अपना रही है. वो विपक्षी दलों के नेतृत्व का दावा नहीं कर रही है. उसका कहना है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी पार्टियों की ओर से जीती सीटों के आधार पर तय होगा.’’

वो कहती हैं, ‘’कांग्रेस ने अध्यादेश के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी के रुख का समर्थन का भी एलान कर दिया है. जबकि पटना में विपक्षी दलों क बैठक में ये मुद्दा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच विवाद का विषय बन गया था. इससे लगता है कि विपक्षी दल संभल कर चल रहे हैं. ’’

नीरजा चौधरी का कहना है कि विपक्षी एकता की अभी तक की कोशिश काफी अच्छी रही है. देखना ये होगा कि आने वाले समय में ये पार्टियां इस गठजोड़ को कितना मजबूत कर पाती हैं. चुनाव मैदान में उतरने से पहले एकता के समीकरणों को साधना उसकी लिए बड़ी चुनौती होगी.

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