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इसराइल-हमास युद्ध: इस दक्षिण अमेरिकी देश में फलस्तीनी लोगों के बसने और कामयाब होने की कहानी
- Author, फर्नांडा पॉल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
हमास ने सात अक्टूबर को इसराइल पर हमला किया था. इसके बाद से लातिन अमेरिकी देशों में रह रहे इसराइली और फ़लस्तीनी समुदाय मध्य-पूर्व की घटनाओं पर बारीकी से नजर रख रहा है.
लातिन अमेरिका के प्रमुख शहरों में इस संघर्ष के किसी न किसी एक पक्ष के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं.
इस संघर्ष में हमास के हमले के बाद से अब तक 1,400 इसराइली और करीब 11,000 फ़लस्तीनियों के मारे जाने का दावा किया जा रहा है.
पिछले हफ़्ते लातिन अमेरिकी देश चिली की राजधानी सैंटियागो में हजारों लोगों ने एक रैली में हिस्सा लिया. यह उस देश में हुआ जहां अरब दुनिया के बाहर फ़लस्तीनी मूल के लोगों की सबसे बड़ी आबादी रहती है.
एक अनुमान के मुताबिक़ चिली में क़रीब पांच लाख फ़लस्तीन मूल के लोग रहते हैं.
चिली कैसे और क्यों पहुंचे फ़लस्तीनी
चिली में फ़लस्तीनी समुदाय के कार्यकारी निदेशक डिएगो खामिस ने बीबीसी से कहा, "ग़ज़ा में जो कुछ हो रहा है, उससे हम बहुत प्रभावित हैं. वहां से आने वाली तस्वीरें बहुत परेशान करने वाली हैं."
इस दक्षिण अमेरिकी देश में फ़लस्तीन के राजदूत, वेरा बबून ने बताते हैं कि "ऐतिहासिक रूप से चिली में रह रहा फ़लस्तीनी समुदाय उन सभी अत्याचारों को खारिज करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है, जो फ़लस्तीनी देश अनुभव करता है."
कई लोगों के रिश्तेदार ग़ज़ा पट्टी या उसके आसपास के इलाक़ों में रहते हैं. ये लोग उन लोगों से इसराइल द्वारा इंटरनेट और संचार के माध्यमों पर लगाई गई पाबंदी के बीच संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.
सबसे अधिक प्रभाव डालने वाले मामलों में से एक है 7 साल के चिली-फ़लस्तीनी लड़के घासन साहुरी का मामला, वह कई दिनों तक ग़ज़ा में गायब थे. उसके चाचा ने चिली में पत्रकारों को बताया कि घासन साहुरी एक स्थानीय अस्पताल में मिल गए हैं.
लेकिन चिली ने फ़लस्तीनी समुदाय के साथ इतना मजबूत रिश्ता कैसे बना लिया? इतने सारे फ़लस्तीनियों ने अपने देश से 13 हजार किलोमीटर दूर जाकर चिली में रहने का फैसला क्यों किया?
आख़िर चिली ही क्यों आए?
चिली में फ़लस्तीनी प्रवासियों के चिली आने की घटना को समझने के लिए, हमें 19वीं सदी के अंत में जाना होगा.
जॉर्डन नदी और भूमध्य सागर के बीच फ़लस्तीन का क्षेत्र को मुसलमानों, यहूदियों और कैथोलिकों के लिए पवित्र माना जाता है. उस समय वहां ऑटोमन साम्राज्य था.
वह दौर परस्पर तनाव का समय था.
सेंटर फॉर स्टडीज़ के रिकार्डो मार्ज़ुका ने 2021 में बीबीसी को बताया था, "फ़लस्तीनियों, सीरियाई और लेबनानी लोगों का प्रस्थान आर्थिक संकट, ऑटोमन साम्राज्य के पतन और इस क्षेत्र के पहले अरब राष्ट्रवादी आंदोलनों के दमन के बीच हो रहा था.''
कई अन्य समुदायों की तरह इस समुदाय में भी अमेरिका को अवसरों से भरी एक नई दुनिया के रूप में देखा जाता था.
इस तरह कई युवा फ़लस्तीनी ज़मीन के रास्ते पहले यूरोप पहुंचे और वहां से समुद्र के रास्ते ब्यूनस आयर्स का रास्ता पकड़ा.
लेकिन अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स जो कि अधिक अमीर और अधिक यूरोपीय प्रभाव वाली थी, में रहने की जगह कुछ लोगों ने एंडीज़ को पार कर चिली की ओर बढ़ना पसंद किया.
लोरेंजो एगर कोर्बिनोस्ला की किताब 'द अरब वर्ल्ड एंड लैटिन अमेरिका' के मुताबिक 1885 और 1940 के बीच चिली में अरब मूल के लोगों की संख्या 8,000 से 10,000 के बीच थी. इनमें से आधे फ़लस्तीनी थे.
लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ऑटोमन साम्राज्य का विघटन हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, 14 मई, 1948 को जब इसराइल बना तो और प्रवासी चिली पहुंचे.
क़रीब साढ़े सात लाख फ़लस्तीनियों को यहूदी सैनिकों ने भगा दिया. ये लोग दूसरे देशों में चले गए.
चिली की ज़रूरत क्या थी?
अन्य नए देशों की तरह, चिली को भी अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए अप्रवासियों की जरूरत थी.
चिली के अभिजात्य वर्ग ने हमेशा से यूरोपीय लोगों को चुना, उन्होंने उन्हें 19वीं शताब्दी की शुरुआत से ज़मीन और अधिकार देने की पेशकश की, लेकिन कई अरब और फ़लस्तीनियों ने इस लालसा का फायदा उठाया.
मार्ज़ुका कहते हैं, "कई कारकों का एक समूह है जिसने इस सेटलमेंट को बढ़ावा दिया: जलवायु- क्योंकि फ़लस्तीनी क्षेत्र और चिली के बीच कुछ समानताएं हैं, स्वतंत्रता- कुछ ऐसा जो ऑटोमन साम्राज्य में दमन और बाद में ब्रिटिश जनादेश के दमन की वजह से छूट गया था और आर्थिक समृद्धि.''
कपड़ा उद्योग में फ़लस्तीन मूल के लोगों का दख़ल
मध्य पूर्व से आए लोगों ने व्यापार और कपड़ा उद्योग को चुना. उन्होंने अपनी परंपरा का पालन किया. वे सौदेबाज़ी जानते थे, लेकिन उन्होंने एक लंबित मांग को भी पूरा किया. वे पार्सल वस्तुओं के साथ ग्रामीण इलाकों या चिली के शहरों में पहुंचे, जहां खरीदने के लिए बहुत कुछ नहीं था.
मार्ज़ुका कहते हैं, "शुरुआत में फ़लस्तीनियों स्ट्रीट वेंडर के रूप में काम शुरू किया. इसके बाद उन्होंने छोटे व्यवसाय शुरू किए और फिर, 1930 के दशक में कपड़ा उद्योग के विकास में इन परिवारों का महत्वपूर्ण योगदान था."
अबुमोहोर परिवार आज चिली में वाणिज्य, वित्तीय क्षेत्र और यहां तक कि फुटबॉल के व्यवसाय में सबसे बड़े समूहों में से एक है.
एक अन्य उदाहरण कासा सैह कंपनी है. इसका स्वामित्व भी फ़लस्तीनी मूल के एक परिवार के पास है. इस कंपनी की शुरुआत 1950 के दशक में ताल्का शहर में हुई थी.
अन्य प्रवासियों ने स्थानीय कारीगरी के काम या महंगे यूरोपीय आयात की जगह कपास या रेशम बनाने का काम शुरू किया.
फ़लस्तीनी मूल के उपनाम जैसे हिरमास, सईद, यारूर और सुमार एक शक्तिशाली कपड़ा उद्योग का पर्याय बन गए हैं.
अर्थव्यवस्था में योगदान
1980 और 1990 के दशक में अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद चीनियों के साथ मुक़ाबले में अधिकांश फ़लस्तीनी व्यसायी परिवारों ने फाइनेंस, रियल एस्टेट, कृषि, अंगूर के बगान, कृषि, भोजन और मीडिया के क्षेत्र में क़दम रखा.
अर्थव्यवस्था में योगदान देने के अलावा इन लोगों ने विभिन्न तरह के संस्थानों का विकास किया, इसमें फ़लस्तीनी क्लब जैसी फ़ुटबॉल टीम से लेकर धर्मार्थ सोसाइटी और सांस्कृतिक संगठन तक शामिल थे.
वे चिली के अलग-अलग शहरों में बसने में भी सफल रहे. यह चिली के विभिन्न समुदायों के साथ संबंध बनाने के लिए महत्वपूर्ण था.
साल 1952 में अपने परिवार के साथ चिली पहुंचे मौरिस खामिस कहते हैं, "एक कहावत चिली में बहुत बार दोहराई जाती है कि प्रत्येक प्रांत में एक चौराहा, एक चर्च, एक पुलिस चौकी और एक नागरिक होता है. हम हर जगह शामिल हैं!"
व्यवसाय के अलावा इस समुदाय में महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तियां भी हैं, जो पार्टी नेता, सीनेटर, डिप्टी, मेयर और पार्षद हैं.
राजदूत वेरा बबून के लिए चिली में रह रहे फ़लस्तीनी समुदाय की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे चिलीवासी के रूप में पूरी तरह से एकीकृत हैं. इसके साथ ही वे आंतरिक रूप से वो अपनी मातृभूमि से भी जुड़े हुए हैं. फ़लस्तीन उनके जीवन में है.
लेकिन ये सब इतना आसान नहीं था.
ख़ून पानी नहीं बनता है
इतिहासकार और विशेषज्ञों के मुताबिक़ चिली में फ़लस्तीनी एकीकरण बेहद सफल रहा है, लेकिन इसमें जटिल क्षण भी शामिल थे.
अरब जगत के लोगों को चिलीवासियों की ओर से अस्वीकृति का रवैया भी सहना पड़ा. यह लंबे समय तक चला, खासकर शुरुआती दिनों में.
उन्हें अपमानजनक रूप से 'तुर्क' कहा जाता था, यह फ़लस्तीनियों को न केवल इसलिए आहत करता था क्योंकि यह उनकी पहचान को गलत बताता था, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें ऑटोमन साम्राज्य के दौर का उत्पीड़क माना गया.
डिएगो खामिस से जब यह पूछा कि फ़लस्तीनी समुदाय इसराइल पर हमास के हमले को कैसे देखता है, इस सवाल पर वो कहते हैं, "वे फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) को फ़लस्तीनी लोगों के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देते हैं."
वो कहते हैं, ''हमास पीएलओ का हिस्सा नहीं है. हम यह नहीं मानते, न तो चिली में और न ही फ़लस्तीन में कि हिंसा राजनीतिक कार्रवाई का एक वैध तरीका है."
वो कहते हैं कि अगर चिली में कोई यहूदी संस्थानों पर हमले की अपील करे तो हम किसी भी हमले या यहूदी संस्थानों पर हमले की निंदा करने में एक सेकेंड की भी चूक नहीं करेंगे.
रिकार्डो मार्ज़ुका के मुताबिक़ चिली के फ़लस्तीनी कभी भी अपने मूल समाज से अलग नहीं हुए.
मौरिस खामिस कहते हैं, "एक समय था जब चिली में फ़लस्तीनी भावना इतनी स्पष्ट नहीं थी. लेकिन वह बदल गया. आज वहां जो हो रहा है वह पारदर्शी हो गया है और समस्याएं दिखाई देने लगी हैं."
वो कहते हैं, "यहाँ हम कितना भी घुल-मिल जाएँ, खून पानी नहीं बनता है. खून खींचता है."
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