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शिशु मल पर नई स्टडी ने खोले नवजात बच्चों की आंतों के रहस्य
- Author, स्मिता मुंडासाद
- पदनाम, हेल्थ रिपोर्टर, बीबीसी न्यूज़
ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने शिशुओं के मल के दो हज़ार से अधिक नमूने इकट्ठा किए और उनकी स्टडी की.
उन्होंने इन नमूनों के माध्यम से यह समझने की कोशिश की कि आख़िर किस प्रकार के बैक्टीरिया नवजात शिशु की आंत में सबसे पहले पनपते हैं.
शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्हें ये जानकर हैरानी हुई कि शिशुओं का मल तीन अलग-अलग माइक्रोबायोलॉजिकल प्रोफाइल के तहत आता है.
हर एक में अलग-अलग "पायनियर बैक्टीरिया" बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं.
पायनियर बैक्टीरिया वो होते हैं जो किसी भी नए वातावरण में सबसे पहले बस सकते हैं और पनप सकते हैं.
1288 शिशुओं के मल के नमूनों की स्टडी
शुरुआती परीक्षणों से पता चला है कि इनमें से एक विशेष बैक्टीरिया है, जिसे बी. ब्रेव (बिफिडोबैक्टीरियम ब्रेव) कहते हैं.
ये शिशुओं को स्तनपान के दौरान दूध में मौजूद पोषक तत्वों को पचाने और उन्हें कीटाणुओं से बचाने में मदद कर सकता है.
नेचर माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित एक प्रारंभिक रिपोर्ट से पता चलता है कि इस बैक्टीरिया का दूसरा प्रकार हानिकारक हो सकता है और इससे शिशुओं में संक्रमण का अधिक ख़तरा होता है.
इस बात के काफी प्रमाण मिले हैं कि किसी इंसान के माइक्रोबायोम यानी उसकी आंत में रहने वाले लाखों अलग-अलग सूक्ष्मजीवों का उस इंसान की सेहत पर बहुत प्रभाव पड़ता है.
लेकिन शिशु के माइक्रोबायोम की बनावट पर बहुत कम काम हुआ है, क्योंकि ये जीवन के शुरुआती दिनों में विकसित होता है.
वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 1,288 सेहतमंद शिशुओं के मल के नमूनों को जांचा.
ये सभी शिशु ब्रिटेन के अस्पतालों में पैदा हुए थे और उनकी उम्र एक महीने से कम थी.
इन वैज्ञानिकों ने पाया कि अधिकांश नमूने तीन व्यापक समूहों में आते हैं, जिनमें अलग-अलग बैक्टीरिया प्रमुख हैं.
बी. ब्रेव और बी. लोंगम बैक्टीरिया समूह लाभकारी माने जाते थे.
उनकी आनुवंशिक प्रोफाइल से पता चलता है कि वो शिशुओं को मां के दूध में मौजूद पोषक तत्वों का इस्तेमाल करने में उनकी मदद कर सकते हैं.
जबकि प्रारंभिक परीक्षणों से पता चलता है कि ई. फेकेलिस से कभी-कभी शिशुओं को संक्रमण होने का जोखिम भी हो सकता है.
कई फै़क्टर करते हैं काम
वैज्ञानिकों ने जिन शिशुओं को स्टडी में शामिल किया था उन्हें पैदाइश के शुरुआती कुछ हफ्तों में पूरी तरह या आंशिक रूप से स्तनपान कराया गया था.
लेकिन शोधकर्ताओं का ये भी कहना है कि बच्चे को स्तनपान कराने या फॉर्मूला दूध देने से उनकी आंत में रह रहे पायनियर बैक्टीरिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.
इसी दौरान ये भी देखा गया कि जिन शिशुओं की माताओं को प्रसव के दौरान एंटीबायोटिक्स दिया गया था, उनके शिशुओं में ई. फेकेलिस (एंटरोकोकस फेकेलिस) होने की संभावना ज़्यादा थी.
ये अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इसका स्वास्थ्य पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है या नहीं.
और दूसरे फैक्टर, जैसे कि मां की उम्र, नस्ल और मां ने कितनी बार बच्चे को जन्म दिया है, ये सब भी विकासशील माइक्रोबायोम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
बच्चों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर इन माइक्रोबायोम के सटीक प्रभाव को जानने के लिए इस दिशा में और अधिक काम किये जा रहे हैं.
वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट के डॉ. यान शाओ का कहना है, "हमने 1,200 से अधिक शिशुओं से मिले उच्च-रिज़ॉल्यूशन जीनोमिक जानकारी का विश्लेषण करके तीन पायनियर बैक्टीरिया की पहचान की है. ये वे बैक्टीरिया हैं जो आंत माइक्रोबायोटा के विकास को संचालित करते हैं और जिससे हम उन्हें शिशु माइक्रोबायोम प्रोफाइल में वर्गीकृत कर सकते हैं."
"इन ईको सिस्टम की संरचना और उनमें अंतर को देख और समझ पाना, स्वस्थ माइक्रोबायोम को सहारा देने के लिए प्रभावी व्यक्तिगत चिकित्सा विकसित करने की दिशा में पहला क़दम है."
जानकार क्या कहते हैं?
सी बीच क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में माइक्रोबायोम विज्ञान के लेक्चरर, डॉ. रुआरी रॉबर्टसन ने कहा कि, "ये स्टडी जीवन के पहले महीने में आंत के माइक्रोबायोम के निर्माण के बारे में मौजूदा जानकारी को काफ़ी हद तक बढ़ाता है." हालांकि वो इस शोध में शामिल नहीं थे.
वो कहते हैं, "हमने हाल के वर्षों में आंत माइक्रोबायोम संयोजन पर और अस्थमा और एलर्जी जैसे सामान्य बाल विकारों पर जन्म के तरीके़ और स्तनपान के प्रभाव से जुड़ी बहुत जानकारी प्राप्त कर ली है."
"लेकिन इसे अभी तक प्रभावी माइक्रोबायोम केन्द्रित उपचारों में बदला नहीं जा सका है."
लिवरपूल यूनिवर्सिटी के प्रोफे़सर लुईस केनी का कहना है कि बच्चे के जन्म और स्तनपान से जुड़े निर्णय "जटिल और व्यक्तिगत" होते हैं और जब बात सर्वोत्तम विकल्पों की आती है तो "सभी के लिए एक ही दृष्टिकोण" नहीं अपनाया जा सकता है.
उन्होंने कहा, "हमारे पास अभी भी इस बात की अधूरी जानकारी है कि जन्म के तरीके़ और शिशु को दूध पिलाने के विभिन्न तरीके़ माइक्रोबायोम के विकास को किस प्रकार प्रभावित करते हैं और यह बाद में उनके स्वास्थ्य पर किस प्रकार प्रभाव डालते हैं. इसलिए यह शोध महत्वपूर्ण है."
ये शोध यूके बेबी बायोम पर चल रही स्टडी का हिस्सा है और इसकी फंडिंग वेलकम और वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट ने की है.
इन लेखकों में से एक, डॉ. ट्रेवर लॉली, वयस्क प्रोबायोटिक्स पर काम करने वाली एक कंपनी के सह-संस्थापक होने के साथ ही वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट में शोधकर्ता भी हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित