‘पृथ्वी के मंगल’ पर एक साल बिताने वाले वैज्ञानिकों ने मुश्किल हालात का सामना कैसे किया?

    • Author, निकोले वोरोनिन
    • पदनाम, बीबीसी ग्लोबल न्यूज़

केवल आधी सदी पहले तक मंगल ग्रह पर जाने की बातें साइंस फ़िक्शन लगती थीं लेकिन आज वैज्ञानिक इस बात पर गंभीरता से ग़ौर कर रहे हैं कि भविष्य में इस लाल ग्रह पर जाकर नई आबादी बसाने वालों को किन चीज़ों में महारत की ज़रूरत होगी?

मंगल ग्रह की लंबी यात्रा के दौरान वह ख़ुद को कैसे सुरक्षित रख सकेंगे और उन्हें वहां के संभावित हालात से निपटने के लिए कैसे तैयार किया जा सकता है.

इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए 25 जून, 2023 को केली हैस्टन, रॉस ब्रोकवेल, नाथन जोन्स और अंका सेलारिऊ एक ‘अंतरिक्ष यात्रा’ पर रवाना हुए.

उनकी मंज़िल मंगल ग्रह नहीं बल्कि उसका एक थ्री डी (3D) प्रिंटेड मॉडल है जहां लाल ग्रह के जलवायु और वहां के हालात की कॉपी की गई ताकि उन्हें मंगल के जलवायु से अवगत कराया जा सके.

यह जगह टेक्सस के शहर ह्यूस्टन में स्थित नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर के एक प्रशिक्षण अड्डे पर बनाई गई है. यहां वैज्ञानिकों ने उन हालात की नक़ल करने की कोशिश की है जिनका भविष्य में मंगल पर जाने वालों को सामना करना पड़ सकता है.

साल भर जारी रहने वाला यह प्रयोग अब तक का सबसे लंबा और विविधतापूर्ण ‘अंतरिक्ष उड़ान’ का प्रयोग था.

पिछले एक साल के दौरान वैज्ञानिकों ने मिशन में शामिल लोगों की दूर से निगरानी की और उन्हें समय-समय पर कई काम सौंपे. ये वैज्ञानिक उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में लगातार डेटा इकट्ठा करते रहे.

शनिवार 6 जुलाई को ‘अंतरिक्ष उड़ान’ का यह प्रयोग औपचारिक रूप से पूरा हो गया.

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि उन्हें इस प्रयोग से यह मालूम करने में मदद मिलेगी कि लोग इतने लंबे समय तक अपने लोगों से दूर बिना किसी विवाद और मानसिक स्वास्थ्य को बरक़रार रखते हुए कैसे जीवित रह सकते हैं.

थ्री डी दुनिया में एक साल

इस प्रयोग के भागीदारों ने लगभग एक साल तक आसमान नहीं देखा था. चारों भागीदार ‘दी क्रू हेल्थ ऐंड परफ़ॉर्मेंस एक्सप्लोरेशन एनालॉग’ के तहत लगभग 370 दिनों तक बिल्कुल अकेले रहे.

इस प्रयोग में हिस्सा लेने के इच्छुक लोगों की कमी नहीं थी. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की ओर से घोषित चार वॉलिंटियर्स की वैकेंसी के लिए दस हज़ार से अधिक आवेदन मिले थे.

मंगल ग्रह की एक तरफ़ की यात्रा लगभग नौ माह में पूरी होती है. इस मिशन का मक़सद इतनी लंबी ‘अंतरिक्ष यात्रा’ से इसमें भाग लेने वालों पर पड़ने वाले प्रभावों का पता लगाना है.

एक सौ साठ वर्ग किलोमीटर पर फैले मंगल के इस मॉडल को थ्री डी प्रिंटर की मदद से बनाया गया है.

वैज्ञानिकों की राय है कि मंगल पर निर्माण का एक तरीक़ा 3D प्रिंटर का इस्तेमाल है. पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर होने के कारण वहां तक निर्माण सामग्री लेकर जाना व्यावहारिक नहीं है.

मंगल पर जाने वालों को वहां पहले से उपलब्ध सामग्री जैसे कि उस ग्रह की मिट्टी को ही इस्तेमाल करना पड़ेगा.

उम्मीद की जा रही है कि उन सामग्रियों को 3D प्रिंटिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा.

समस्या होने पर पृथ्वी से संपर्क करने में 22 मिनट लगेंगे

सुज़ैन बेल जॉनसन स्पेस सेंटर के ‘नासा’ के परफ़ॉर्मेंस लैबोरेट्री की प्रमुख है. उनका कहना है की मंगल के मुश्किल हालात के बारे में बिल्कुल सही जानकारी हासिल करना मुमकिन नहीं है.

मंगल के जलवायु में सांस नहीं ली जा सकती और इसके अलावा पृथ्वी की तुलना में कम गुरुत्वाकर्षण और अधिक विकिरण (रेडिएशन) से इस लाल ग्रह पर बसना संभव नहीं.

लेकिन इस सभी प्रयोगों के तहत पूरे दल के सभी लोगों को मंगल पर वास्तविक मिशन के दौरान पेश आ सकने वाली किसी भी संभावित चुनौती के लिए तैयार करने की कोशिश की गई है.

पूरे साल के दौरान भागीदारों ने केवल वही खाया जो उन्हें ‘अंतरिक्ष यात्रा’ के दौरान मिला था जैसे कि टिन पैक्ड फ़ूड या ऐसी ख़ुराक जो मंगल ग्रह पर उगाई-बनाई जा सकती हो.

मंगल के मिशन के दौरान पूरे दल को जो सबसे बड़ी परेशानी पेश आ सकती है वह कम्यूनिकेशन या संपर्क साधने में देरी है.

अगर मंगल पर मौजूद लोग पृथ्वी पर मौजूद मिशन कंट्रोल से संपर्क करने की कोशिश करेंगे तो उनकी बात. को वहां तक पहुंचने में कम से कम 22 मिनट लगेंगे

इसका जवाब आने में भी 22 मिनट लगेंगे. इस तरह दो तरफ़ के संवाद में कमोबेश 45 मिनट लग जाएंगे.

इसका मतलब यह है कि अगर इस दल को कोई मुश्किल पेश आ जाए तो कंट्रोल रूम से इसका हल जानना आसान नहीं होगा.

व्यवस्थापकों ने इस प्रयोग को व्यापक बनाने के लिए इसमें हर तरह के अप्रत्याशित मुश्किलों और असहजता को शामिल किया है जिनमें उपकरणों में गड़बड़ी और ऑडियो संपर्क की नाकामी तक शामिल है.

सुज़ैन बेल का कहना है कि यह जांचना ज़रूरी है कि दल के सदस्य अकेले में तनाव की स्थिति में आने पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं.

इस प्रयोग में हिस्सा लेने के लिए स्वयंसेवकों के पास कम से कम नेचुरल साइंस में मास्टर्स की डिग्री के साथ-साथ हवाई जहाज़ चलाने का अनुभव या मिलिट्री ट्रेनिंग का मुकम्मल होना ज़रूरी था.

केली हैस्टन इस मिशन की कमांडर थीं. वह एक ट्रेंड डॉक्टर हैं जो विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी में महारत रखती हैं.

ब्रोकवेल एक डिज़ाइन इंजीनियर हैं जबकि जोन्स फ़ौजी डॉक्टर हैं जिन्होंने एम्बुलेंस सर्विस में काम किया है.

सेलारिऊ माइक्रोबायोलॉजिस्ट है जिन्होंने अमेरिकी नौसेना के साथ काम किया है.

इस बात को सुनिश्चित बनाने के लिए कि चुने हुए लोग शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर अंतरिक्ष यात्रा के लिए फ़िट है, उन्हें पेशेवर अंतरिक्ष यात्रियों की तरह कई टेस्टों से गुज़ारा गया.

आलोचकों का क्या कहना है?

वह लोग जो मंगल पर मानव मिशन भेजने का समर्थन करते हैं, उनकी राय है कि इस मिशन से मिलने वाला डेटा अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेनिंग देने के लिए नई टेक्नोलॉजी और नए तरीक़ों में मददगार साबित होगा. उनकी राय है कि इससे लंबी अवधि की अंतरिक्ष यात्रा को सुरक्षित और प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी.

लेकिन बहुत से आलोचकों लगता है कि इस मिशन से कुछ ज़्यादा ही उम्मीद बांधी जा रही है. वह मंगल के लिए उड़ानों को बहुत ख़तरनाक और महंगा समझते हैं और इसकी ज़रूरत पर सवाल उठाते हैं.

उन्हें लगता है कि भविष्य में नई आबादी बसाने वालों को जो काम सौंपे जाएंगे उनमें से अक्सर काम कहीं कम क़ीमत पर और मानव जीवन को ख़तरे में डाले बिना रोबोट के ज़रिए भी अंजाम दिए जा सकते हैं.

स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर और रूसी साइंस एकेडमी के उपाध्यक्ष लियू ज़ेलेनी कहते हैं कि यह प्रोग्राम इस सवाल का जवाब नहीं देता कि आप लोगों को सुरक्षित ढंग से मंगल तक कैसे पहुंचाएंगे.

पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटिक फ़ील्ड) के बाहर मौजूद ख़तरनाक विकिरण मंगल की यात्रा पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन को ख़तरे में डाल सकता है.

ज़ेलेनी का कहना है कि अंतरिक्ष यात्रियों को हानिकारक किरणों से बचने के लिए तकनीकी हल अभी तक नहीं खोजा जा सका है और इसलिए वह मंगल पर रहने के इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के बारे में आशंकाओं में घिरे हुए हैं.

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