ट्रंप ने कहा, 'हम जल्द करेंगे परमाणु परीक्षण', किस देश के पास हैं सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका के पास किसी भी अन्य देश के मुक़ाबले ज़्यादा परमाणु हथियार हैं.

उन्होंने अपने सोशल मीडिया एकाउंट ट्रुथ सोशल पर लिखा, "यह उपलब्धि मेरे पहले कार्यकाल के दौरान हासिल हुई, जब मौजूदा हथियारों को पूरी तरह आधुनिक और नया किया गया."

उन्होंने कहा कि परमाणु हथियारों की "भारी विनाशकारी ताक़त" के कारण वे ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन "उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था."

उनके मुताबिक, रूस इस सूची में दूसरे स्थान पर है और चीन तीसरे स्थान पर है, लेकिन चीन अगले पांच साल में बराबरी पर पहुंच सकता है.

उन्होंने कहा कि अन्य देशों के परमाणु परीक्षण कार्यक्रमों को देखते हुए उन्होंने "डिपार्टमेंट ऑफ वॉर" को अमेरिकी परमाणु हथियारों के परीक्षण शुरू करने के निर्देश दिए हैं. उनके अनुसार, यह प्रक्रिया तुरंत शुरू होगी.

इससे पहले रविवार, 26 अक्तूबर को रूसी सेना के सबसे बड़े जनरल ने कहा था कि रूस ने परमाणु ऊर्जा से संचालित बुरेवेस्तनिक क्रूज़ मिसाइल का परीक्षण किया है.

चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ जेरासिमोव ने टेलीविज़न पर प्रसारित एक बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बताया, "हमने परमाणु ऊर्जा से संचालित मिसाइल की कई घंटे लंबी उड़ान संचालित की. इस मिसाइल ने 14 हज़ार किलोमीटर (8,700 मील) की दूरी तय की, जो कि इसकी अधिकतम सीमा नहीं है."

यह कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइल है. इसकी घोषणा पहली बार साल 2018 में की गई थी. इसे एक असीमित क्षमता वाली और मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को चकमा देने वाली मिसाइल बताया गया है.

जनरल जेरासिमोव ने कहा कि यह मिसाइल 21 अक्तूबर को हुए परीक्षण के दौरान 15 घंटे तक हवा में रही.

पश्चिमी देशों के विशेषज्ञों ने पहले इस मिसाइल के सामरिक महत्व और रूस के सफल परीक्षण के दावों पर संदेह जताया था.

पुतिन ने साल 2023 में इस मिसाइल के सफल परीक्षण का दावा किया था. लेकिन इस दावे की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं हो सकी.

रूस को लेकर अमेरिका की आशंका

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के पास सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार होने की बात कही है लेकिन 2022 के आंकड़ों को देखें तो रूस इस मामले में पहले नंबर पर है.

पिछले साल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नीति में बदलाव को मंज़ूरी दी थी.

रूस की इस परमाणु नीति में कहा गया था कि कोई ऐसा देश जिसके पास खुद परमाणु हथियार न हों, लेकिन वो देश किसी परमाणु हथियार संपन्न देश के साथ मिलकर हमला करता है, तो इसे रूस संयुक्त हमला मानेगा.

यूक्रेन के साथ जारी युद्ध में रूस को आशंका थी कि अमेरिका और ब्रिटेन दोनों ही मिलकर यूक्रेन का साथ दे सकते हैं.

साथ ही 32 देशों का सैन्य गठबंधन नेटो भी यूक्रेन को समर्थन दे रहा है.

रूस की परमाणु नीति में ये भी कहा गया है कि अगर रूस को पता चला कि दूसरी तरफ़ से रूस पर मिसाइलों, ड्रोन और हवाई हमले हो रहे हैं तो वो परमाणु हथियारों से जवाब दे सकता है.

इसके अलावा कुछ और स्थितियों की बात रूस की परमाणु नीति में की गई है.

इसमें कहा गया है कि अगर किसी ने नया सैन्य गठबंधन बनाया, पुराने गठबंधन को और बढ़ाया, रूस की सीमा के करीब कोई सैन्य बुनियादी ढांचे को लाया गया या रूस की सीमा के आस-पास कोई सैन्य गतिविधियां की, तो परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

रूस ने जब अमेरिका को किया था आगाह

रूस परमाणु हमले को लेकर पहले भी अमेरिका और बाक़ी देशों को आगाह कर चुका है.

पिछले साल मार्च में पुतिन ने कहा था कि रूस तो परमाणु हमले के लिए तैयार है. अगर अमेरिका ने अपनी सेना यूक्रेन में भेजी, तो मामला बहुत बढ़ सकता है.

देखा जाए तो रूस के पास ही सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार भी हैं. वैसे तो कोई देश अपने हथियारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं देते हैं.

लेकिन, फ़ेडरेशन ऑफ़ अमेरिकन साइंटिस्ट्स नामक संस्था के मुताबिक 2022 तक रूस के पास ही सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार थे. इनकी संख्या लगभग 5,977 बताई गई थी.

ये अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के परमाणु हथियारों को मिलाने के बाद भी उससे कुछ ज़्यादा ही हैं. इनमें कुछ टैक्टिकल हथियार भी हैं.

टैक्टिकल हथियार छोटे परमाणु हथियार होते हैं, जिन्हें किसी ख़ास क्षेत्र को निशाना बनाने के लिए बनाया जाता है. इन टैक्टिकल हथियार को मिसाइलों के ज़रिए दागा जा सकता है.

जैसे क्रूज़ मिसाइल. इससे बहुत दूर तक रेडियोएक्टिव नुक़सान नहीं होता. इसमें एक किलोटन तक का परमाणु विस्फोटक हो सकता है.

अमेरिका ने जो हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था, वो 15 किलो टन का था.

अभी तक इन टैक्टिकल हथियारों का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है.

लेकिन पुतिन की इन बातों को मीडिया और पश्चिम में रेटरिक कहा जाता है, यानी कि वे बस बोलने के लिए बोलते हैं. तो इस बात की कितनी आशंका है कि वे जो बोल रहे हैं वो वैसा कर भी सकते हैं.

चीन पर रूस काफ़ी निर्भर है.

चीन की परमाणु नीति है कि वो कभी पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा और रूस ने अगर पहले इस्तेमाल किया तो फिर शायद चीन भी उसका साथ छोड़ दे.

कुछ जानकार इसे ऐसे देख रहे हैं कि पुतिन इस नई नीति से फिर से सबको चिंता में डालना चाहते हैं. उनका मानना है कि पुतिन इससे दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित