पीएम मोदी के यूक्रेन पहुँचने पर वहाँ और रूस के मीडिया में कैसी चर्चा

पीएम नरेंद्र मोदी 23 अगस्त को यूक्रेन दौरे पर हैं.

जुलाई में पीएम मोदी जब रूस के दौरे पर थे, तब यूक्रेन समेत कुछ पश्चिमी देशों ने इसे तिरछी निगाह से देखा था.

अब पीएम मोदी जब यूक्रेन पहुंचे हैं तो इसकी भी चर्चा हो रही है.

ये दौरा ऐसे वक़्त में भी हो रहा है, जब यूक्रेन ने रूस के अंदर कुछ इलाक़ों को अपने नियंत्रण में ले लिया है. माना जा रहा है कि रूस भी जल्द यूक्रेन पर बड़ी कार्रवाई कर सकता है.

ऐसे में पीएम मोदी के दौरे पर यूक्रेन और रूस का मीडिया भी कवर कर रहा है. इस रिपोर्ट में जानिए कि पीएम मोदी की यात्रा पर रूस और यूक्रेन का मीडिया क्या कुछ कह रहा है?

यूक्रेन का मीडिया क्या कह रहा

कीएव इंडिपेंडेंट न्यूज़ वेबसाइट के मुताबिक़, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को गले लगाने के बाद पीएम मोदी यूक्रेन आ रहे हैं. क्या यूक्रेन पुतिन और मोदी के साथ में दरार डाल सकेगा?

पीएम मोदी ने मॉस्को में पुतिन को गले लगाया था. तब इसकी आलोचना ज़ेलेंस्की ने भी की थी और कहा था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का ऐसे गले लगना शांति वार्ताओं की कोशिशों को झटका है.

जिस दिन पीएम मोदी रूस गए थे, उसी दिन रूस ने यूक्रेन में बच्चों के एक अस्पताल पर हमला किया था.

कीएव इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट में कहा गया है कि 30 साल के रिश्तों में ये पहली बार है, जब कोई भारतीय पीएम यूक्रेन आ रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत भू-राजनीतिक स्तर पर तेज़ी से ताक़तवर बन रहा है. रूस के यूक्रेन पर आक्रमण शुरू होने के बाद से भारत अब तक किसी एक तरफ़ नज़र नहीं आया है.

कुछ लोगों का मानना है कि यूक्रेन दौरे के ज़रिए पीएम मोदी रूस दौरे के बाद हुई आलोचनाओं की भरपाई करना चाह रहे हैं.

फ़रवरी 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से संबंधों को कायम रखा है और दोनों देशों के बीच कारोबार नई ऊंचाइयों तक पहुंच गया है.

ठीक इसी समय में भारत ने रूस का खुलकर समर्थन नहीं किया और पश्चिमी देशों से अपने संबंधों को भी बनाए रखा. पश्चिमी देशों ने भी भारत पर बहुत ज़्यादा दबाव नहीं डाला या डालने की कोशिश की तो भारत झुका नहीं.

यूक्रेनी मीडिया में कहा गया है कि भारत की भूमिका रूस और पश्चिमी देशों के बीच रस्सी पर चलने जैसी है.

मार्च 2024 में यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा भारत दौरे पर आए थे.

कीएव इंडिपेंडेंट से विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगलमैन ने कहा- भारत को रूस के सबसे भरोसेमंद साथी के तौर पर देखा जाता है.

भारत से आर्थिक सहयोग की बात की जाए तो रूस के मुकाबले यूक्रेन काफ़ी पीछे है.

कुगलमैन कहते हैं- भारत का रुख़ है ये कि रूस से वो सस्ता माल लिया जाए जो उसे दूसरी जगहों से नहीं मिल पाता. भारत हथियारों के मामले में भी रूस पर निर्भर है.

भारत के हित क्या है?

कीएव इंडिपेंडेंट में कुलेबा के एक पुराने इंटरव्यू को भी जगह दी गई है.

कुलेबा ने कहा था- युद्ध ख़त्म होने के बाद यूक्रेन दुनिया की सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन साइट बन सकता है और इसके लिए भारतीय कंपनियों को भी बुलाया जा सकता है.

वो कहते हैं- यूक्रेन भारत के साथ व्यापार को बढ़ाना चाहता है. यूक्रेन के पास भारत के लिए मेडिकल संस्थान हैं. 2021 में करीब 19 हज़ार भारतीय स्टूडेंट यूक्रेन में पढ़ाई कर रहे थे.

वेबसाइट के मुताबिक़- भारत फ़िलहाल दोनों तरफ़ से खेल रहा है. जब पुतिन दोबारा राष्ट्रपति बने तो लोकतांत्रिक तरीकों से चुने नेताओं में सिर्फ़ पीएम मोदी ही थे, जिन्होंने उनको बधाई दी थी.

जब यूक्रेनी विदेश मंत्री भारत आए थे तो उससे कुछ दिन पहले ही जयशंकर ने सिंगापुर में कहा था- अपने अनुभव मुझे ये बताते हैं कि रूस से हमारे रिश्ते हमेशा सकारात्मक रहे हैं.

कुलेबा ने कहा- रूस के साथ बने रहकर भारत चीन से मंडराते ख़तरे को भी दरकिनार कर रहा है. भारत के लिए डर है कि चीन रूस पर ऐसे दबाव डाल सकता है जो भारत के ख़िलाफ़ जा सकते हैं.

कीएव इंडिपेंडेंट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मोदी के यूक्रेन दौरे को पश्चिमी देश सकारात्मक लेंगे और यूक्रेन को भी ये रास आएगा. लेकिन इस दौरे से कुछ पुख्ता निकलकर आएगा, इसकी संभावनाएं कम हैं.

कीएव पोस्ट की एक रिपोर्ट में पीएम मोदी के उस बयान को जगह दी गई है, जिसमें उन्होंने शांति की अपील की थी.

पीएम मोदी ने पोलैंड दौरे पर कहा था- किसी भी संघर्ष को लड़ाई के मैदान में नहीं सुलझाया जा सकता.

यूक्रेन की न्यूज़ वेबसाइट यूरोमेडन प्रेस ने कांग्रेस नेता शशि थरूर से एक लेख लिखवाया है. इस लेख में कहा गया है कि मोदी का यूक्रेन दौरा भारत की छवि को बेहतर करने की कोशिश है.

रूस का मीडिया क्या कह रहा है

द मॉस्को टाइम्स ने अपनी वेबसाइट पर एक विश्लेषण छापा है.

पीएम मोदी के दौरे को शायद कीएव के समर्थन के तौर पर भले देखा जाए, पर ये याद रखने की ज़रूरत है कि तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी रूस दौरे पर गए थे.

मोदी के तब पुतिन से गले लगने को ज़ेलेंस्की ने शांति की कोशिशों को झटका बताया था.

रिपोर्ट में लिखा है कि मोदी कीएव मध्यस्थ की तरह नहीं, संदेशवाहक की तरह जा रहे हैं. मोदी के दौरे से पश्चिमी देशों को उम्मीद हो सकती है कि भारत अपनी दोस्ती का इस्तेमाल इस संघर्ष को ख़त्म करने के लिए करे.

रिपोर्ट में रूस भारत संबंधों को भी विस्तार से बताया गया है.

कुर्स्क में यूक्रेन के हमले के बाद पुतिन ने ज़ेलेंस्की से किसी तरह की बातचीत करने से इनकार किया था. ऐसे में शांति समझौतों के मामले में मोदी की भूमिका बढ़ सकती है.

रिपोर्ट में लिखा है कि यूक्रेन से मोदी का खाली हाथ लौटना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच सवाल बन सकता है. ख़ासकर तब जब समरकंद में पीएम मोदी ने पुतिन से कहा था- ये युद्ध का दौर नहीं है.

भारत और शांति समझौता

रूसी न्यूज़ एजेंसी ताश ने भी पीएम मोदी के दौरे पर रिपोर्ट की है.

रिपोर्ट में थिंक टैंक इमेजइंडिया इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष रॉबिन्दर सचदेव ने लिखा है- पीएम मोदी कीएव के सामने कोई शांति प्रस्ताव लेकर नहीं जाएंगे बल्कि वो शांति समझौतों के लिए ख़ुद के तैयार रहने और सहमति को व्यक्त करेंगे.

वो कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि भारत अपनी ओर से कोई नया शांति योजना लेकर जाएगा, पर हां वो ये ज़रूर इशारा करेगा कि शांति वार्ता में वो भूमिका निभाने को तैयार है. भारत इस बातचीत में निश्चित तौर पर अहम भूमिका निभा सकता है.''

ताश की रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी के तीसरी बार पीएम बनने के बाद रूस जाने के कदम को अहम बताया गया.

रॉबिन्दर सचदेव ने कहा- मोदी का यूक्रेन जाना ये बताता है कि भारत वैश्विक भू-राजनीतिक में बड़ी भूमिका अदा करना चाहता है और वो पश्चिम-रूस के बीच पुल का काम करना चाहता है.

मोदी के दौरे से अमेरिका ख़ुश

रूस की न्यूज़ वेबसाइट आरटी ने पीएम मोदी के यूक्रेन दौरे पर ''अमेरिका की ख़ुशी'' को जगह दी है.

रिपोर्ट में लिखा है कि एक शीर्ष अमेरिकी अधिकारी ने पीएम मोदी के दौरे पर खुशी ज़ाहिर की है.

अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट रिचर्ड वर्मा ने कहा- हम भारत के रूस से पुराने रिश्तों को समझते हैं और ये भारत पर है कि वो किस तरफ रहना चाहता है.

पीएम मोदी जब रूस गए थे तो अमेरिका ने इसे मुश्किल और असहज करने वाला बताया था.

इस रिपोर्ट में ब्लूमबर्ग के हवाले से बताया गया कि मोदी यूक्रेन और रूस के बीच बातचीत शुरू करने के पक्ष में तो होंगे लेकिन वो संघर्ष ख़त्म करने की कोशिश नहीं करेंगे.

भारत के रूस और यूक्रेन से संबंध

बीते 25 सालों में भारत और यूक्रेन के व्यापारिक संबंधों में इजाफा देखने को मिला है.

भारत के विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, 2021-22 वित्तीय वर्ष में दोनों देशों के बीच 3.3 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था.

वहीं रूस और भारत के बीच क़रीब 50 अरब डॉलर से ज़्यादा का व्यापार हुआ.

साल 2030 तक भारत-रूस के बीच 100 अरब डॉलर का कारोबार होने की उम्मीद जताई जा रही है. रूस के साथ भारत का व्यापार यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद बढ़ा है.

भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले की कभी निंदा नहीं की और न ही संयुक्त राष्ट्र में रूस के ख़िलाफ़ लाए गए प्रस्तावों का समर्थन किया है. लेकिन भारत यूक्रेन में मानवीय मदद पहुँचाता रहा है.

भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, भारत से मदद के तौर पर क़रीब 135 टन सामान यूक्रेन भेजे गए हैं. इनमें दवाएं, कंबल, टेंट, मेडिकल उपकरण से लेकर जनरेटर तक शामिल हैं.

रूस यूक्रेन के बीच जब युद्ध शुरू हुआ था, तब वहां भारतीय छात्र भी फँस गए थे.

भारत रूस और यूक्रेन युद्ध में किसी एक तरफ़ नहीं दिखता है. एक तरफ़ भारत रूस से संबंध बनाए रखता है, दूसरी तरफ वो यूक्रेन की मदद भी जारी रखता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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