‘डूबते जहाजों की मलिका’ क्यों कही जाती थी 20वीं सदी की ये महिला

    • Author, अनघा पाठक
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

टाइटैनिक डूब रहा था. सबसे पहले महिलाओं और बच्चों को लाइफ़ बोट्स में डाला जा रहा था. ऐसी ही एक नाव में एक नन्हा बच्चा, एक कम उम्र का लड़का और एक औरत बैठी हुई थी.

नाव को पानी में उतारने से पहले नाव पर सवार अफ़सर ने आवाज़ लगाई, "क्या जहाज़ के ऊपरी हिस्से में कोई महिला रह गई है?"

कोई सामने नहीं आया.

एक और अफ़सर ने फिर पूछा, "क्या कोई महिला रह गई है?"

फिर एक महिला सामने आई और कहने लगी, "मैं इस जहाज़ की मुसाफ़िर नहीं हूं बल्कि यहां काम करती हूं."

अफ़सर ने एक लम्हे के लिए उसकी तरफ़ देखा और कहा, "कोई बात नहीं. तुम एक महिला हो, नाव में तुम्हारे लिए जगह है."

उस महिला का नाम वॉयलेट था जिसकी क़िस्मत आखिरी क्षणों में बदल गई. उसे लाइफ़ बोट में जगह मिल गई और इस वजह से उसकी जान बच गई.

लेकिन यह पहली बार नहीं था कि वह किसी समुद्री जहाज़ हादसे में ज़िंदा बच गई थी और ना ही आख़िरी बार ऐसा हो रहा था.

टाइटैनिक अप्रैल 1912 में डूबा था. यह घटना टाइटैनिक जहाज़ हादसे के एक साल बाद छपने वाली किताब 'द ट्रुथ अबाउट टाइटैनिक' में लिखी गई है.

कुछ जगहों पर यह उल्लेख भी मिलता है कि टाइटैनिक पर अश्वेत लोगों ने जहाज़ के अफ़सरों से कहा था कि वह नर्स वॉयलेट को लाइफ़ बोट में बिठाएं.

वॉयलेट को इतिहास में मिस इनसिंकेबल (जो डूब न सके) या क्वीन ऑफ़ सिंकिंग शिप यानी 'डूबते हुए जहाज़ों की मलिका' के नाम से जाना जाता है.

वॉयलेट एक नर्स थीं और वह उस दौर के आश्चर्यजनक और सबसे बड़े जहाज़ पर सफर कर रही थीं.

वह शानदार जहाज़ तो डूब गया लेकिन वॉयलेट को कुछ नहीं हुआ. यह वॉयलेट जोसेफ़ की कहानी है.

वॉयलेट जोसेफ़ कौन थीं?

वॉयलेट की जीवनी 1998 में प्रकाशित हुई थी जिसे जॉन मैकिस्टन ग्राहम ने लिखा था.

इसके बाद ही दुनिया को मालूम हुआ कि वॉयलेट न केवल टाइटैनिक बल्कि तीन बड़े समुद्री जहाज़ हादसों में बच निकली थीं.

वॉयलेट एक सामान्य आयरिश परिवार में पैदा हुई थीं जो अर्जेंटीना में बस गया था.

परिवार में सबसे बड़ी बेटी होने के नाते वॉयलेट पर जल्द ही छह भाई-बहनों की परवरिश की ज़िम्मेदारी आ गई थी.

वॉयलेट जब छोटी थीं तभी उनके पिता का देहांत हो गया था.

उस समय उनकी मां एक जहाज़ पर नर्स के रूप में काम करती थीं. कुछ अर्से के बाद उनकी मां बीमार पड़ीं और उनकी भी मौत हो गई.

वॉयलेट ने 21 साल की उम्र में जहाज़ पर बतौर स्टीवर्डेस (परिचारिका) काम करना शुरू किया.

इस नौकरी में वॉयलेट की ज़िम्मेदारी थी कि वह जहाज़ पर सफ़र करने वाले पैसे वाले यात्रियों के लिए खाना-पानी व मनोरंजन की व्यवस्था करें और उनके कमरों की सफ़ाई का ध्यान रखें.

जब टाइटैनिक डूबा तो वॉयलेट उस समय केवल पच्चीस साल की थीं.

उन्होंने अपने जीवन में कुल चालीस साल तक समुद्री जहाज़ों पर काम किया और इस अर्से में उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.

वह रात जब टाइटैनिक डूबा

आज से लगभग 111 साल पहले टाइटैनिक एक अंधेरी रात में एक आइसबर्ग से टकरा गया था. उस समय जहाज़ पर सवार अधिकतर यात्री गहरी नींद में थे.

हादसे के समय टाइटैनिक 41 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से इंग्लैंड के शहर साउथंप्टन से अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की ओर बढ़ रहा था और केवल तीन घंटे के अंदर 14 और 15 अप्रैल 1912 के बीच की रात टाइटैनिक अटलांटिक महासागर में डूब गया था.

वह जहाज़, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह कभी नहीं डूबेगा, न केवल कुछ घंटों में समुद्र में समा गया बल्कि इस दुर्घटना में लगभग डेढ़ हज़ार लोग भी डूब गए.

आज 111 साल बाद भी इसे सबसे बड़ा समुद्री हादसा माना जाता है.

टाइटैनिक पर सुरक्षा की सख़्त व्यवस्था की गई थी. इस दुर्घटना में इतने अधिक लोगों की मौत की एक वजह यह भी थी कि जहाज़ में लाइफ़ बोट्स की कमी थी.

दुर्घटना की रात का विस्तृत ब्योरा 'टाइटैनिक सर्वाइवर्स: न्यूली डिस्कवर्ड मेमोरीज़ ऑफ़ वॉयलेट जोसफ़ में' दर्ज है.

इसमें वॉयलेट कहती हैं, "एक क्षण के लिए पूरी शांति थी. चारों और गहरा काला अंधियारा था और फिर अचानक एक ज़ोरदार धमाका हुआ. मैं इसे कभी नहीं भूलूंगी. हमारा जहाज़ बर्फ़ीले समुद्र में डूब रहा था."

"एक अफ़सर ने मुझे एक बच्चा दिया और मुझे लाइफ़ बोट में सवार होने को कहा. उस समय मैं अश्वेत पर्यटकों को समझा रही थी कि लाइफ़ जैकेट कैसे पहननी है और लाइफ़ बोट में कैसे सवार होना है. मैं उस बच्चे के साथ लाइफ़ बोट में सवार हुई जो मुझे सौंपा गया था."

"जहाज़ पर हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री थी. इसलिए बच्चे की मां का पता नहीं चल सका."

वॉयलेट ने लिखा कि हादसे के बाद एक दूसरे जहाज़ ने लाइफ़ बोट्स में सवार कुछ लोगों को बचाया और हमें न्यूयॉर्क ले आया. वहां एक औरत ने मेरे हाथ से बच्चा छीना और कुछ कहे बिना रोते हुए वहां से भाग गई.

अगर ऐसी घटना किसी और के साथ होता तो वह जहाज़ की यात्रा सदा के लिए छोड़ देता, लेकिन वॉयलेट ने ऐसा नहीं किया.

टाइटैनिक के डूबने से एक साल पहले वॉयलेट एक और जहाज़ की तबाही के दौरान पर उस पर मौजूद थीं.

ओलंपिक की दुर्घटना

टाइटैनिक अकेला जहाज़ नहीं था. इस जहाज़ को चलाने वाली व्हाइट स्टारलाइन कंपनी ने बेलफ़ास्ट शहर के हारलैंड और वोल्फ़ शिपयार्ड को बीसवीं सदी की शुरुआत में तीन जहाज़ बनाने का आदेश दिया था.

ओलंपिक भी उसी कंपनी का जहाज़ था. टाइटैनिक के निर्माण से पहले यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे भव्य यात्री जहाज़ था.

यह जहाज़ 30 सितंबर 1911 को ब्रिटेन के दक्षिणी हैम्पटन के समुद्री किनारे से रवाना हुआ और कुछ ही देर बाद ब्रिटेन के युद्धपोत एचएमएस हॉक से टकरा गया.

सौभाग्य से इस तबाही में किसी की जान नहीं गई लेकिन जहाज़ को बड़ा नुक़सान पहुंचा और डूबने से किसी तरह बच गया.

इसके बाद जहाज़ को वापस समुद्र के किनारे लाया गया क्योंकि वहां से किनारा दूर नहीं था.

जहाज़ को कुछ दिनों की मरम्मत के बाद दोबारा लॉन्च किया गया.

वॉयलेट ने आठ महीने तक ओलंपिक पर काम किया और फिर उन्हें टाइटैनिक पर भेज दिया गया.

टाइटैनिक की तबाही के बाद वॉयलेट ने अपने जीवन में अधिक से अधिक लोगों को बचाने का फ़ैसला किया. उन्होंने नर्सिंग की ट्रेनिंग हासिल की.

ब्रिटैनिक जहाज़ टूट गया

सन 1916 में टाइटैनिक के डूबने के चार साल बाद वॉयलेट ब्रिटेन की रेड क्रॉस सोसायटी के लिए नर्स के तौर पर काम करने लगी थीं.

उस समय प्रथम विश्व युद्ध ज़ोरों पर था. बहुत से यात्री विमान सैनिकों को लाने- ले जाने और उनके इलाज के लिए मोबाइल अस्पताल के तौर पर इस्तेमाल हो रहे थे.

व्हाइट स्टार कंपनी के ब्रिटैनिक जहाज़ को भी मोबाइल अस्पताल में बदल दिया गया था.

युद्ध के कारण समुद्र में कई जगह सुरंगे बिछा दी गई थीं. ब्रिटैनिक ऐसी ही एक एक सुरंग से टकराने के बाद डूब गया.

वॉयलेट के लिए यह अनुभव और भी ख़ौफ़नाक था.

अपने अनुभव को वॉयलेट ने इस तरह बताया: "ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे खाई में फेंक दिया था. मैं कुछ नहीं देख सकती थी. मैं किसी तरह पानी से ऊपर आई और मैंने सांस लेने की कोशिश की. मेरी नाक और मुंह से पानी बह रहा था."

इस जहाज़ पर एक हज़ार से अधिक लोग सवार थे और उनमें से 32 की मौत हो गई.

टाइटैनिक के हादसे के बाद एक नीति बनाई गई थी कि हर जहाज़ के पास पर्याप्त लाइफ़ बोट्स होनी चाहिए.

ब्रिटैनिक पर सवार दो लाइफ़ बोट्स को समय से पहले लॉन्च कर दिया गया था.

जहाज़ को चलाने वाले पंखे (प्रोपेलर्स) पानी के अंदर नहीं रुके. ऐसे में नाव में सवार लोग प्रोपेलर की ओर खिंचते चले गए और उनसे टकराकर टुकड़े- टुकड़े हो गए.

ब्रिटैनिक की लाइफ़ बोट में भी तीन लोग सवार थे. इत्तेफ़ाक़ से तीनों टाइटैनिक पर भी थे और बच गए थे.

वॉयलेट, आर्ची जुवल और जॉन प्रिस्ट, सब इस बार भी बच गए.

अपनी बहन को लिखे एक पत्र में आर्ची जुवल ने उस क्षण के अनुभव को बताया जब लाइफ़ बोट को प्रोपेलर खींच रहे थे.

उन्होंने लिखा, "हममें से बहुत से लोगों ने पानी में छलांग लगा दी लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ क्योंकि प्रोपेलर इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने पानी की पूरी लहरों को अपनी ओर खींच लिया."

उन्होंने लिखा, "मैंने आंखें बंद कीं और दुनिया को अलविदा कहा लेकिन मुझे जहाज़ के टूटे हुए हिस्से से झटका लगा. मुझे पानी में फेंक दिया गया. मैंने पानी से बाहर निकलने की जद्दोजहद की लेकिन जहाज़ के दूसरे हिस्से गिर रहे थे. इसे धकेलना संभव नहीं था."

"अंधेरा हो रहा था. अचानक ऊपर से किसी ने मलबा को एक ओर धकेल दिया और मुझे पानी के ऊपर जाने का मौक़ा मिला लेकिन नीचे से किसी ने मेरी टांग पकड़ ली. वह आदमी भी डूब रहा था. मुझे अपनी टांग को झटका देना पड़ा और वह आदमी डूब गया."

ब्रिटैनिक केवल 55 मिनट में डूब गया. उस पत्र को पढ़कर कोई अंदाज़ा लगा सकता है कि उन 55 मिनट में क्या हुआ होगा.

वॉयलेट भी लाइफ़ बोट में थीं और उनकी जान को भी ख़तरा था लेकिन उन्होंने तुरंत स्थिति भांप ली थी और लाइफ़ बोट से छलांग लगा दी.

इसकी वजह से वह जहाज़ के प्रोपेलर्स के पंखों में फंसने से बच गईं, बल्कि पानी की तेज़ धार से नीचे गिर गईं. वह इस दौरान लकड़ी की एक बड़ी बल्ली उनके सिर से टकरा गई थी जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई थीं.

भाग्य ने एक बार फिर उनका साथ दिया. वॉयलेट को एक और लाइफ़ बोट ने पानी से निकाला और वह जीवित बच निकलीं.

तीनों बार वॉयलेट को ऐसा लगा जैसे उनका आख़िरी वक़्त आ चुका था, लेकिन उनकी मौत का वक़्त नहीं आया था.

सन 1920 में उन्होंने दोबारा व्हाइट स्टारलाइन के लिए काम करना शुरू किया. जीवन में इतनी ख़तरनाक घटनाओं के बावजूद उन्होंने समुद्र को कभी नहीं छोड़ा.

वे 40 साल तक समुद्री जहाज़ पर सेवाएं देने के बाद 62 साल की उम्र में रिटायर हुईं और 1971 में 83 साल की उम्र में उनकी मौत हुई.

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