उत्तराखंड: चमोली में हिमस्खलन के बाद 50 लोग बचाए गए, 5 को बचाने की कोशिश जारी

इमेज स्रोत, SuryaCommand_IA
- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, उत्तराखंड से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड के चमोली ज़िले में बद्रीनाथ धाम के पास ग्लेशियर टूटने से 55 मज़दूर बर्फ़ में दब गए, इनमें से 50 लोगों को बाहर निकाल लिया गया है.
सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि इनमें से चार की मौत हो गई है.
बाकी लोगों को बचाने के लिए सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है, जिसका नेतृत्व सेना की आईबीईएक्स ब्रिगेड कर रही है. घायल लोगों को पहले बाहर निकाला जा रहा है.
सेना के प्रवक्ता के अनुसार फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने के लिए 6 हेलीकॉप्टरों को तैनात किया गया है. इनमें इंडियन आर्मी एविएशन से तीन चीता हेलीकॉप्टर, इंडियन एयर फ़ोर्स से 2 चीता हेलीकॉप्टर और इंडियन आर्मी द्वारा लिया गया एक सिविल हेलीकॉप्टर शामिल है.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

ताज़ा जानकारी देते हुए एक्स पर राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बताया है कि बाकी फंसे लोगों को भी निकालने की कोशिशें जारी हैं.
उन्होंने लिखा, "माणा के निकट हुए हिमस्खलन में फंसे हुए श्रमिकों को निकालने के लिए चलाए जा रहे राहत एवं बचाव अभियान के क्रम में 14 अन्य श्रमिकों को भी सकुशल बाहर निकाल लिया गया है."
"बाहर निकाले गए श्रमिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं. गंभीर रूप से घायल 3 श्रमिकों को आर्मी चिकित्सालय, ज्योतिर्मठ में उपचार हेतु भेज दिया गया है. अभी तक कुल 47 श्रमिकों का सफल रेस्क्यू किया जा चुका है. फंसे हुए अन्य श्रमिकों को भी जल्द से जल्द सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कार्य किया जा रहा है."
शुक्रवार शाम चमोली डीएम संदीप तिवारी ने बताया था कि माणा गांव और माणा पास के बीच सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के क़रीब हिमस्खलन की सूचना मिली थी जिसके बाद कई एजेंसियों को राहत और बचाव के काम में लगाया गया.
उन्होंने कहा था, "यहां सेना की आवाजाही के लिए सड़क निर्माण में 57 मज़दूरों के होने की जानकारी मिली थी. बचाव कार्य के लिए सेना के साथ ही आईटीबीपी, एनडीआरफ़, एसडीआरफ़ की रेस्क्यू टीम को लगाया गया है."
समाचार एजेंसियों और सेना की ओर जो तस्वीरें सामने आई थीं उनमें घुटनों तक बर्फ़ के बीच राहत और बचाव कर्मी जूझते दिख रहे हैं.
उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर लिखा था, "हिमस्खलन की वजह से कई मज़दूरों के दबने का दुःखद समाचार प्राप्त हुआ. आईटीबीपी, बीआरओ और अन्य दल राहत एवं बचाव में शामिल हैं. भगवान बदरी विशाल से सभी श्रमिक भाइयों के सुरक्षित होने की प्रार्थना करता हूं."
शनिवार को उत्तराखंड के राज्य आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार ने बताया है कि बद्रीनाथ के पास ग्लेशियर टूटने के बर्फ में फंसे मज़दूरों को निकालने का प्रयास फिर से शुरू कर दिया गया है.
चमोली डीएम ने बीबीसी को क्या बताया

इमेज स्रोत, @suryacommand
इससे पहले शुक्रवार को चमोली डीएम संदीप तिवारी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "ये लोग बीआरओ के सड़क निर्माण कार्य में करने वाले मज़दूर थे. इनका काम सेना के मूवमेंट के लिए सड़क तैयार करना होता है."
उनके अनुसार, "जहाँ हिमस्खलन हुआ है वहीं आस पास उनके रहने के लिए उनके कैंप बने हैं, जहाँ वे कंटेनर्स में रहते हैं. जब सुबह अचानक एवलांच आया होगा तब शायद वे ख़ुद को बचाने के लिए इधर उधर भागे होंगे."
संदीप तिवारी ने कहा, "उनमें से 10 लोग सेना या आईटीबीपी के कैंप की तरफ़ भागे थे, जो सुबह ही मिल गए थे. बाक़ी 22 लोग जोशीमठ की ओर भागे जहाँ उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से एक होटल मिला, वे वहाँ रुक गए. इन 22 लोगों को भी उस होटल से निकाला गया है."
उन्होंने बताया कि कुल मिलाकर अभी तक 32 लोगों को निकाला जा सका है, "बाक़ी 25 लोगों का अभी कुछ पता नहीं चल पा रहा है, क्योंकि मौसम बहुत ख़राब है."
संदीप तिवारी ने बताया, "अगर कल अगर मौसम ठीक रहा तो हेलीकॉप्टर के द्वारा रेसक्यू अभियान चलाया जाएगा."
उन्होंने कहा कि रेस्क्यू अभियान चलाने के लिए सिंगल इंजन और डबल इंजन मिलाकर चार चॉपर रेसक्यू के लिए भेजे जाएंगे, इसके अलावा "एमआई 17 के लिए भी रिक्वेस्ट भेज दी गई है."
मौजूदा स्थिति के बारे में उन्होंने कहा, "हमारी एनडीआरएफ़ की टीम भी जोशीमठ पहुँच चुकी है, वह भी मौके की ओर मूव करेगी."
भारी बर्फ़बारी, बचाव कार्य में मुश्किलें

इमेज स्रोत, @suryacommand
इससे पहले चमोली के डीएम संदीप तिवारी ने बताया था कि वहां लगातार बारिश और बर्फ़बारी हो रही है इसलिए बचाव कार्य में मुश्किलें आ रही हैं और इस वजह से हेलीकॉप्टर सर्विस का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
उन्होंने बताया, "मूवमेंट कठिन है. वहां कोई सैटेलाइट फ़ोन या अन्य उपकरण उपलब्ध न होने के कारण हमारा उन लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है. अभी तक हमारे पास किसी कैज़ुअल्टी की सूचना नहीं है."
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, एसडीआरएफ़ के आईजी पुलिस रिद्धिम अग्रवाल ने कहा कि संगठन की टीम जोशीमठ के लिए रवाना हो चुकी है लेकिन लामबागड़ में सड़क बंद होने की वजह से मुश्किलें आ रही हैं और इसे खुलवाने के लिए सेना से संपर्क किया गया है.
उन्होंने कहा, "एक दूसरी टीम को सहस्रधारा हेलीपैड पर अलर्ट रखा गया है. घटना स्थल के बारे में सटीक जानकारी मिल चुकी है. जैसे ही मौसम ठीक होता है, ऊंची जगहों पर काम करने में दक्ष एसडीआरएफ़ की टीम को हेलीकॉप्टर के माध्यम से पैराशूट से गिराया जाएगा."
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घटना को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, आईटीबीपी और एनडीआरएफ़ के डीजी से बात की.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "हादसे में फँसे लोगों को सुरक्षित निकालना हमारी प्राथमिकता है. स्थानीय प्रशासन बचाव कार्यों में पूरी तत्परता से लगा हुआ है. एनडीआरएफ़ की दो टीमें भी जल्द ही घटना स्थल पर पहुँच रही हैं."
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक्स पर लिखा, "माणा इलाक़े में हिमस्खलन की दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी है जिसमें बीआरओ का जीआरईएफ़ कैंप प्रभावित हुआ है. प्रशासन प्रभावित लोगों की मदद की पूरी कोशिश कर रहा है."
"सेना की स्थानीय यूनिटें भीं बचाव कार्य में जुटी हैं. बर्फ़ में फंसे हुए सभी लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए सभी संभव संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है."
अब तक क्या पता

इमेज स्रोत, @suryacommand
शुक्रवार शाम को भारतीय सेना ने एक बयान जारी कर कहा कि 'मौके पर मौजूद सेना के डॉक्टरों ने गंभीर घायलों की जान बचाने के लिए सर्जरी की है.'
बयान के अनुसार, माणा में ख़राब मौसम और जारी बर्फ़बारी के बीच सेना का बचाव अभियान जारी है. घायलों को निकालने और अन्य रेस्क्यू टीमों को मौके पर भेजने के लिए सड़क को खोलने की कोशिशें जारी हैं.
सेना ने बीआरओ के हवाले से बताया कि हिमस्खलन के बाद 22 मज़दूर खुद बचकर निकलने में सफल रहे जिन्हें बाद में सुरक्षित स्थान पर पहुंचा गया है.
इससे पहले समाचार एजेंसी एएनआई ने भारतीय सेना के हवाले से बताया था कि शुक्रवार को सुबह 7.15 मिनट पर माणा और बद्रीनाथ के बीच स्थित बीआरओ लेबर कैंप हिमस्खलन की चपेट में आ गया था.
इस लेबर कैंप में आठ कंटेनर और एक शेड था. यहां कुल 55 मज़दूर थे, जिन्हें सड़क निर्माण के काम पर लगाया गया था. हिमस्खलन के बाद ये सभी बर्फ़ में दब गये.
घटना के तुरंत बाद सेना की एक स्विफ़्ट रिस्पांस टीम आईबेक्स ब्रिगेड के 100 से अधिक जवानों को डॉक्टरों, एंबुलेंस और अन्य उपकरणों के साथ तुरंत राहत और बचाव कार्य में लगाया गया.
सेना के अनुसार, यह टीम सुबह क़रीब 11.50 बजे तक पांच कंटेनरों को तलाशने में क़ामयाब रही जिनमें 10 लोगों को बचाया गया, सभी ज़िंदा थे, जिनमें चार की हालत गंभीर बताई जा रही है.
बाकी तीन कंटेनरों की तलाश जारी है, हालांकि इलाक़े में भारी बर्फबारी जारी है और जोशीमठ और माणा के बीच की सड़क को साफ़ करने की कोशिश की जा रही है.
जोशीमठ से अतिरिक्त मेडिकल टीमों को माणा में इकट्ठा किया जा रहा है ताकि बचाव कार्य और मेडिकल सहायता में मदद मिल सके.
''ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था''
बीते दो दिनों से उत्तराखंड के सभी जिलों में भारी बारिश हो रही है, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में जमकर बर्फबारी हुई है.
देहरादून मौसम विज्ञान केंद्र ने पहले ही भारी बारिश और बर्फबारी का अलर्ट जारी किया था, जिसके तहत सीमांत क्षेत्रों में तैनात टीमों को सतर्क रहने को कहा गया था.
मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह का कहना है, "अत्यधिक बारिश और भारी बर्फबारी की आशंका को देखते हुए तीन दिन पहले ही राज्य सरकार को आरेंज अलर्ट भेजा गया था."
उन्होंने बताया कि "आईटीबीपी को भी पिछले शुक्रवार को प्रेस रिलीज़ के जरिए आरेंज अलर्ट जारी कर दिया गया था."
"ऐसे में हिमस्खलन की संभावना भी बढ़ जाती है, जिससे प्रभावित इलाकों में काम कर रहे मजदूरों और उनके ठेकेदारों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए."
"यह अलर्ट शनिवार, 1 मार्च तक प्रभावी रहेगा, जबकि शुक्रवार शाम से शनिवार तक चमोली, रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ जिलों को रेड अलर्ट पर रखा गया है."
हिमस्खलन पर भूवैज्ञानिकों की राय
इससे पहले 7 फरवरी 2021 को जोशीमठ के तपोवन क्षेत्र में रैणी गांव के ऊपर ग्लेशियर फटने से भारी तबाही मची थी, जिससे ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में बाढ़ आ गई थी..
इस आपदा में ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट और तपोवन में स्थित एनटीपीसी प्रोजेक्ट तबाह हो गया था, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी.
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के पूर्व भूवैज्ञानिक, डॉ. अजय पॉल बताते हैं, "ग्लेशियर एवलांच यानी हिमस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है, जिसमें बर्फ, चट्टानें और मिट्टी का बड़ा हिस्सा तेजी से नीचे की ओर गिरता है. यह घटना ज्यादातर पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में होती है, जहां ग्लेशियर मौजूद होते हैं."
उन्होंने बताया कि "फरवरी में ही ऐसा होगा, यह ज़रूरी नहीं है. नवंबर और दिसंबर में जब ठंड बढ़ती है, तो फरवरी में यह प्रभाव और तेज़ हो जाता है. नतीजतन, मैदानी इलाकों में बारिश और पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी होती है."
"जब फरवरी में बर्फ का जमाव बड़े भूभाग पर अत्यधिक बढ़ जाता है, तो वर्षा का पानी अंदर रिसने से स्लिप सर्फेस सक्रिय हो जाता है, जिससे हिमखंड की गति तेज़ हो जाती है और हिमस्खलन की घटना होती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















