संसद से 141 सांसद निलंबित, 'विपक्ष मुक्त' संसद के आरोपों में कितना दम है?

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय संसद से सांसदों का निलंबन जारी है. मौजूदा शीतकालनीन सत्र के दौरान मंगलवार को लोकसभा के 49 सांसदों को निलंबित कर दिया गया. सोमवार को 78 सांसदों को निलंबित किया गया था.

मंगलवार को निलंबित किए गए सांसदों को मिलाकर अब तक निलंबित हुए सांसदों की संख्या 141 पर पहुंच गई है. इनमें 95 लोकसभा और 46 राज्यसभा के सांसद हैं.

इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का निलंबन कभी नहीं हुआ था. इसलिए इस निलंबन को अभूतपूर्व कहा जा रहा है.

इससे पहले 15 मार्च 1989 को लोकसभा से 63 सांसदों को निकाला गया था. ये सांसद इंदिरा गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले आयोग की रिपोर्ट सदन में पेश करने की मांग को लेकर हंगामा कर रहे थे.

फिलहाल मौजूदा सत्र में जिन सांसदों को निलंबित किया गया है, उनमें महुआ माजी जैसी नई सांसद से लेकर मनोज झा, जयराम रमेश, रणदीप सिंह सुरजेवाला, प्रमोद तिवारी में फ़ारूक़ अब्दुल्ला, शशि थरूर, मनीष तिवारी, डिंपल यादव जैसे पुराने और दिग्गज सांसद शामिल हैं.

निलंबन की कार्रवाई के बाद सांसदों ने कहा कि मोदी सरकार 'विपक्ष मुक्त' संसद देखना चाहती है. इसीलिए उसने ये कदम उठाया है.

विपक्षी सांसदों का कहना है कि सरकार अधिनायकवादी रवैया अपना रही है.

विपक्षी सांसदों कहना है ऐसा करके मोदी सरकार ने 'लोकतंत्र का गला घोंटा' है. दरअसल विपक्षी सांसद संसद में दो लोगों के घुस आने की घटना के बाद इस पर सदन की बहस की मांग कर रहे थे.

संसद में 'सुरक्षा चूक' को लेकर वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मौजूदगी में गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे. कुछ सांसदों ने अमित शाह से इस्तीफा देने की भी मांग की थी.

'मनमानी करना है इसलिए उन्हें विपक्ष मुक्त संसद चाहिए'

सरकार का कहना है कि इन सांसदों ने अपनी मांग के समर्थन में संसद में हंगामा किया और कामकाज में अड़ंगा डाला.

सदन का कामकाज न होने देने की वजह से इन सांसदों को निलंबित किया गया है.

हालांकि विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार 'मनमानी' पर उतर आई है. वो बेहद अहम बिलों को बगैर बहस के मनमाने ढंग से पारित कराना चाहती है. इसीलिए वो सदन में विपक्षी सांसदों को नहीं देखना चाहती है.

मोदी सरकार 'विपक्ष मुक्त' देश की बात इसीलिए करती है ताकि अपनी 'मनमानी' कर सके. कांग्रेस ने इसे संसद और लोकतंत्र पर 'हमला' बताया है.

विपक्ष का कहना है कि सरकार 'विपक्ष मुक्त' संसद चाहती है ताकि अहम बिलों को मनमाने ढंग से पारित करा सके. सरकार संसद की सुरक्षा को नजरअंदाज कर लोगों का ध्यान भटकाने का काम कर रही है.

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि ये सरकार को अहम बिलों को पारित करने से रोकने के लिए विपक्ष की 'सोची-समझी' साजिश है.

उसने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के अध्यक्ष का अपमान करने का आरोप लगाया है.

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सांसदों के निलंबन पर कहा कि मोदी सरकार बेहद अधिनायकवादी रवैया दिखा रही है. उसे सदन चलाने का कोई नैतिक अधिकार अब नहीं रह गया है. सरकार डरी हुई है.''

उन्होंने कहा, ''अगर उनके पास बहुमत है तो वो विपक्ष से क्यों डर रहे हैं. सांसदों के न रहने पर लोगों की आवाज़ कौन उठाएगा. सरकार इस तरह के कदम उठा कर जनता का गला घोंट रही है.''

सांसदों के निलंबन के फैसले के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा,'' मोदी और गृह मंत्री अमित शाह देश भर में दौरे कर रहे हैं लेकिन सदन में नहीं आ रहे. ये सदन की गरिमा का अपमान है. मोदी और शाह लोगों को डराकर लोकतंत्र खत्म करना चाहते हैं.''

वहीं मंगलवार को निलंबित किए गए फारूक अब्दुल्ला ने कहा,"मुझे बताइए कि पुलिस किसके पास है, गृह मंत्रालय के ही अंतर्गत आती है. क्या हो जाता अगर गृह मंत्री पांच मिनट के लिए सदन में आ कर बोल देते कि जनाब चूक हुई है और मामले की जांच हो रही है."

उन्होंने कहा, "जब तक सदन में विपक्ष का एक भी आदमी रहेगा तब तक ये मांग जारी रहेगी.''

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा,'' अगर आप इसके समांतर देखें तो हिटलर ने भी यही रास्ता अपनाया था. वो संसद में चुन कर आया था. गठबंधन की सरकार बनाई थी और फिर संसद जल गई. अब हम देख रहे हैं कि संसद को अप्रासंगिक बनाने के लिए ये कोशिश हो रही है. ''

कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने विपक्षी सांसदों को निलंबन पर कहा '' डिंपल यादव का मामला नज़ीर है. वो तो अपनी सीट से भी हिली थीं. वो सिर्फ वहां खड़ी थीं लेकिन उन्हें निलंबित कर दिया गया.''

उन्होंने कहा, ''यह संसद में विपक्षी आवाज़ों को ख़त्म करने की सरकार की मैकेनिकल कवायद है. यह जल्द ही उत्तर कोरियाई संसद जैसी दिखे. अब यहां एक चीज होना बाकी है. और वो करतल ध्वनि के साथ ताली बजाना.''

समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव ने कहा, "जिस तरीके से संसद सदस्यों को निलंबित किया जा रहा है, उससे यह लगता नहीं है कि उनके दिमाग में विपक्ष का कोई औचित्य है. जो लोग कह रहे हैं कि 'इंडिया' गठबंधन में दम नहीं रहा वे मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं."

सबसे तीखी प्रतिक्रिया पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप में पहले से ही निलंबन झेल रहीं तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने दी.

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा,''अब तक 141 सांसद निलंबित किए जा चुके हैं. अब अदानी के शेयरहोल्डरों की वार्षिक बैठक लोकसभा के चैंबर में होगी.''

विपक्ष के आरोप और सरकार का जवाब

विपक्षी सांसद ये दिखाना चाहते हैं कि सरकार संसद में सुरक्षा चूक पर भी बोलने के लिए तैयार नहीं है.

वहीं सरकार ये साबित करना चाहती है कि विपक्षी सांसद इस मुद्दे के जरिये संसद का कामकाज रोकना चाहते हैं.

बीजेपी का ये भी कहना है कि विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है. लिहाजा 'इंडिया' गठबंधन अपनी राजनीतिक गोलबंदी के लिए संसद में सुरक्षा के मुद्दे को उछाल कर हंगामा करना चाहता है ताकि पूरे देश का ध्यान उस पर जाए.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं,''संसद की सिक्योरिटी का उल्लंघन एक बहुत बड़ा मुद्दा है. अगर सांसद और विपक्ष इस मुद्दे को नहीं उठाते हैं तो फिर उनके संसद में रहने का कोई मतलब ही नहीं है. उनको जनता ने भेजा ही है ऐसे मुद्दे उठाने के लिए.''

उन्होंने कहा, '' अगर सांसदों का व्यवहार विघ्न डालने वाला था भी, तो भी ये मुद्दा ऐसा था कि सरकार को कड़वा घूंट पीते हुए उनकी बातें सुननी चाहिए थी. चाहते तो कुछ घंटों के लिए सस्पेंड भी कर देते. लेकिन उन्हें पूरी तरह सस्पेंड कर ​देना अच्छा नहीं है."

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं ''लगता है कि विपक्षी सांसद संवाद नहीं चाहते हैं.इतनी बड़ी तादाद में विपक्षी सांसदों के निलंबन ने सरकार का काम आसान बना दिया है. लेकिन ये स्थिति अच्छी नहीं है. संसद संवाद के लिए होती है. इसलिए इस पर चोट नहीं पड़नी चाहिए.''

विपक्ष की मांग कितनी अहम, क्या है संवैधानिक मान्यता?

विश्लेषकों का कहना है संसदीय लोकतंत्र में सरकार संसद के प्रति जिम्मेदार होती है. वो संसद जिसमें जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बैठे हुए हैं.

इसलिए सांसद अगर संसद में सरकार से सवाल करता है तो उसे इसका जवाब देना होगा. फिर संसद में 'सुरक्षा चूक' का मामला तो बेहद संवेदनशील है.

संवैधानिक नियमों के मुताबिक सरकार अपने काम के लिए सामूहिक रूप से संसद के प्रति जिम्मेदार है. लोकसभा और राज्यसभा सरकार को इसके कदमों के लिए जिम्मेदार ठहरा सकती है और इसके कामों की जांच कर सकती है.

ये काम बिल पर बहस, प्रश्नकाल में सवालों या संसदीय कमेटी में सवाल उठा कर हो सकता है. लेकिन इस मामले में जवाब न देकर सरकार संसद के प्रति अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और संवैधानिक कानूनों के विशेषज्ञ नीतिन मेश्राम ने बीबीसी हिंदी से कहा,'' विपक्ष का बहस के लिए मांग करना संसदीय विमर्श का अहम पहलू है. यह देश की सुरक्षा का मामला है क्योंकि ये संसद पर हमले जैसा है. इसलिए ये सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वो इस पर विपक्ष के सवालों का जवाब दे.''

क्या इन बिलों को लेकर विपक्ष की आशंका सही साबित हो रही है?

देश में आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (एविडेंस एक्ट) की जगह संबंधित तीन नए क़ानूनों के लिए लाया जाने बिल मंगलवार को संसद में पेश कर दिया गया.

भारतीय न्याय संहिता विधेयक 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023 और भारतीय साक्ष्य विधेयक 2023 को पेश करने के दौरान लगभग 95 विपक्षी सांसद मौजूद नहीं थे.

इन सांसदों की गैर मौजूदगी में बिल पेश किए जाने के बाद ये सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या ये बिल बगैर बहस के ही आनन-फानन में पारित करा दिए जाएंगे. विपक्ष पहले ही ये आशंका जाहिर कर चुका है.

इससे पहले सोमवार को सरकार ने भारतीय दूरसंचार विधेयक (टेलीकॉम बिल) 2023 पेश किया था. नया टेलीकॉम बिल भारत के 138 साल पुराने टेलीग्राफ एक्ट में बदलाव करेगा.

नया टेलीकॉम बिल 2023 सरकार को किसी आपात स्थिति में किसी भी टेलीकम्यूनिकेशन सर्विस या फिर टेलीकॉम नेटवर्क को अस्थायी तौर पर अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार देता है

ये सरकार को टेलीकम्यूनिकेशन नेटवर्क को सस्पेंड करने का अधिकार देता है. नए टेलीकॉम बिल 2023 में सरकार ने सैटेलाइड ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए नीलामी न कराने का फैसला लिया है.

नया कानून लागू होने पर सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए फ्री में स्पेक्ट्रम मुफ्त में आवंटन दिए जाएंगे.

इस सत्र में जब इस बिल पर बहस होगी तो जाहिर है कि निलंबित सांसद सदन में मौजूद नहीं होंगे. सरकार को विपक्षी सांसदों से कोई चुनौती नहीं मिलेगी.

नीतिन मेश्राम ने कहा,''सरकार तीन बिलों के जरिये पूरे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में बदलाव लाने की कोशिश कर रही है. इसलिए इस पूरी संसद में बहुत अच्छी तरह से बहस की जरूरत है. इससे 200 साल पुराने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम पूरा बदलाव हो जाएगा. इसलिए इस तरह के अहम बिल का बगैर बहस के पास होना ठीक नहीं होगा.''

उन्होंने कहा, ''टेलीकम्यूनिकेशन बिल के जरिये इंटरनेट का रेगुलेशन होगा. ये बहुत ही पेचीदा मामला है. इसलिए इस पर भी पूरी बहस के बाद बिल पास होना चाहिए. ''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)