वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के ख़िलाफ़ भारत मलेशिया और अन्य देशों की तरह खुलकर क्यों नहीं बोला?

अमेरिका ने गुज़रे शनिवार को जब वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस को राजधानी काराकास से पकड़ा, तो पूरी दुनिया अमेरिका की इस कार्रवाई को लेकर दो खेमे में बँटी हुई नज़र आई.

एक तरफ़ कई देश ऐसे रहे, जो अमेरिका की ओर से की गई कार्रवाई की घोर आलोचना कर रहे हैं, तो वहीं एक पक्ष ऐसा है, जो इसका समर्थन कर रहा है.

मगर भारत दोनों में से किसी खेमे में नहीं था. यानी भारत उस गुटनिरपेक्ष नीति के साथ रहा, जिसकी बुनियाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी.

भारत के बयान में किसी का विरोध या समर्थन जैसा भाव नहीं था. मलेशिया और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों ने हमले पर खुलकर वेनेज़ुएला के प्रति एकजुटता दिखाई और अमेरिकी कार्रवाई का कड़े शब्दों में विरोध जताया.

सवाल किया जा रहा है कि भारत ने क्यों मलेशिया या दक्षिण अफ़्रीका की तरह कठोर प्रतिक्रिया नहीं दी. वो भी तब जब वह ख़ुद को ग्लोबल साउथ के नेता के तौर पर पेश करता है.

हालांकि, कई जानकार भारत की प्रतिक्रिया को किसी भी देश के दूसरे मुल्क पर हमले के समय उसके पुराने रुख़ की तरह ही देख रहे हैं, जिसमें वह किसी एक पक्ष के साथ या ख़िलाफ़ नहीं दिखा.

लेकिन दक्षिण एशिया में केवल भारत ही नहीं बल्कि लगभग देशों की प्रतिक्रिया बहुत संतुलित रही. दक्षिण एशिया के किसी भी देश ने वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले की निंदा नहीं की.

दक्षिण एशिया की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले विश्लेषक माइकल कुगलमैन ने लिखा है, ''दक्षिण एशियाई सरकारों की वेनेज़ुएला में अमेरिकी कार्रवाइयों पर सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ संतुलित रही हैं. यह उनका मौन समर्थन नहीं है बल्कि ऐसे क्षेत्र में, जहाँ कई अर्थव्यवस्थाएँ संवेदनशील हैं, यह व्यवहारिकता और सावधानी की ज़रूरत को दर्शाता है.''

''ख़ासकर अमेरिकी टैरिफ़ और संवेदनशील व्यापार वार्ताओं जैसे पहलुओं को देखते हुए. यह भी तर्क दिया जा सकता है कि कुछ मामलों में यह पहले की नीति को ही जारी रखने का मामला है. ऐसे कई सैन्य आक्रमण/हस्तक्षेप रहे हैं, जिनका भारत ने निजी तौर पर विरोध किया लेकिन सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की. इसका सबसे प्रमुख हालिया उदाहरण रूस का यूक्रेन पर हमला है.''

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भारत की प्रतिक्रिया ऐसी क्यों?

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के अगले दिन यानी रविवार को भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से इस घटनाक्रम पर पहला बयान आया.

इसमें कहा गया, "वेनेज़ुएला में हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय है. हम वहां की बदलती स्थिति पर क़रीबी नज़र रखे हुए हैं."

इसके बाद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने लक्जबर्ग में मंगलवार को यही रुख़ दोहराते हुए कहा कि सभी संबंधित पक्षों को वेनेज़ुएला के लोगों की भलाई और सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और इस पर बात करनी चाहिए.

जयशंकर ने कहा, "हम इन घटनाक्रमों को लेकर चिंतित हैं लेकिन हम सभी पक्षों से अपील करते हैं कि वे बैठकर ऐसी स्थिति पर पहुंचें, जो वेनेज़ुएला के लोगों की भलाई और सुरक्षा के हित में हो."

उन्होंने कहा कि भारत की मुख्य चिंता यही है कि इस संकट से वेनेज़ुएला के लोग सुरक्षित और बेहतर स्थिति में बाहर निकलें.

भारत ने अमेरिकी कार्रवाई की निंदा क्यों नहीं की?

काउंसिल फॉर स्ट्रैटिजिक एंड डिफ़ेंस रिसर्च (सीएसडीआर) के संस्थापक हैपीमोन जैकब कहते हैं कि भारत का यह रुख़ नया नहीं है.

उन्होंने एक्स पर सिलसिलेवार पोस्ट में भारत की इस तरह की प्रतिक्रिया के पीछे पांच कारण गिनाते हुए लिखा, "काराकास पर भारत की चुप्पी को लेकर बहुत शोर है."

उन्होंने लिखा, "भारत ने रूस के यूक्रेन पर हमले की भी निंदा नहीं की, इसलिए इसकी भी संभावना कम है कि वह अमेरिका की वेनेज़ुएला पर कार्रवाई की निंदा करे. मुझे लगता है कि भारत में ये आम धारणा है कि जो बड़ी महाशक्तियां होती हैं वो अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में इसी तरह से काम करती हैं. नई दिल्ली को ये बात पसंद नहीं है कि किसी एक पक्ष की निंदा करने के लिए दबाव बनाया जाए जबकि दूसरा पक्ष भी वही करे."

हैपीमोन जैकब ने लिखा, "क्या ये दोहरा रवैया है? अगर भारत ने सिर्फ़ एक पक्ष की निंदा की होती और दूसरे की नहीं तो ये होता. ट्रंप की ऐसी नीति के बावजूद, वॉशिंगटन और मॉस्को दोनों भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से अहम सहयोगी बने हुए हैं. जब अहम साझीदार कोई क़दम उठाते हैं, भले ही वह कोई बड़ी क़ानूनी ग़लती ही क्यों न हो, तो आप उसका ढोल नहीं पीटते. बल्कि अपने हितों और संवाद के रास्ते खुले रहने के लिए कई बार चुप रहना ही बेहतर समझा जाता है."

उन्होंने लिखा, "भारत की अपनी विदेश नीति और घरेलू मसलों में विदेशी दखलअंदाज़ी रोकने से जुड़ा लंबा इतिहास रहा है. हम उन सहयोगियों को तवज्जो देते हैं जो हमसे निजी तौर पर बात करते हैं. हम 'मेगाफोन डिप्लोमैसी' में भरोसा नहीं रखते."

जैकब लिखते हैं, "ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिका की ओर से कोई ठोस मदद न मिलने के बाद, भारत अच्छी तरह समझ चुका है कि वॉशिंगटन का रवैया कितना लेन-देन वाला हो सकता है. अगर हम अभी अमेरिका की निंदा करते हैं, तो यह लगभग तय है कि अगली किसी संकट की घड़ी में वह हमारे विरोधियों के साथ खड़ा हो सकता है."

जैकब ने ये भी कहा कि यूक्रेन हो या वेनेज़ुएला, दोनों ही देश भारत के लिए रणनीतिक रूप से उतने महत्वपूर्ण नहीं, जितना उसके एकदम पड़ोस वाले देश. इसलिए अमेरिका की अवैध कार्रवाइयों की निंदा करना, उससे मिलने वाले फ़ायदे की तुलना में कहीं अधिक महंगा पड़ सकता है.

उठ रहे सवाल भी

मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम और दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा की प्रतिक्रियाओं की भारत में ख़ूब चर्चा है.

अनवर इब्राहिम ने एक्स पर लिखा, "इस तरह के एक्शन अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है और ये किसी संप्रभु राष्ट्र के ख़िलाफ़ ग़लत तरीक़े से बल इस्तेमाल करने जैसा है. राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी को बिना देरी के रिहा कर दिया जाना चाहिए. वजह कुछ भी हो लेकिन एक सरकार के प्रमुख को बाहरी ताकतों द्वारा बलपूर्वक हटाना ख़तरनाक नज़ीर स्थापित करता है."

उन्होंने लिखा, "वेनेज़ुएला के लोग अपना राजनीतिक भविष्य ख़ुद तय करेंगे. जैसा कि इतिहास में देखा गया है, जब-जब बाहरी ताक़तों के ज़रिए अचानक सत्ता परिवर्तन हुआ, इसने फ़ायदे से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया है."

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू ने अनवर इब्राहिम के इसी पोस्ट को कोट करते हुए लिखा, "भारत ने वैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी जैसी मलेशिया ने दी है? वाह मलेशियन पीएम."

वहीं, सिरिल रामाफोसा ने एक वीडियो संदेश में अमेरिका की कार्रवाई को ख़ारिज करते हैं.

उनके इस बयान की सराहना करते हुए एक यूज़र ने लिखा, "दक्षिण अफ़्रीका एक बार फिर ग्लोबल साउथ में उस तरह का नेतृत्व दिख रहा है, जिसका दावा कभी भारत किया करता था."

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस घटनाक्रम पर लिखा, "एक उभरती हुई शक्ति होने के नाते, जो अगुवा बनने की आकांक्षा रखती है, जो ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनने का दावा करती है और जो संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति की वकालत करती है, उस भारत से वेनेज़ुएला में अमेरिकी दख़ल पर बयान अपेक्षित था."

उन्होंने लिखा कि हमने यूक्रेन में रूस के सैन्य हस्तक्षेप की निंदा नहीं की, हमने संवाद और कूटनीति का आह्वान किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि आज का दौर युद्ध का नहीं है.

कंवल सिब्बल ने कहा, "इसी को ध्यान में रखते हुए और निरंतरता दिखाते हुए हमें निंदा की भाषा इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन हम सभी संबंधित पक्षों से ज़्यादा से ज्यादा संयम बरतने की ज़रूरत याद दिला सकते हैं. देशों की संप्रभुता, समानता और स्वतंत्रता का सम्मान करने की अनिवार्यता पर ज़ोर दे सकते हैं. एकतरफ़ा कार्रवाइयों से बचने, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करने और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन न करने की बात कह सकते हैं."

"हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे उदाहरण स्थापित करने के ख़िलाफ़ सलाह दे सकते हैं जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मूल नींव को कमज़ोर करते हों. हम मतभेदों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति का आह्वान कर सकते हैं और दोहरे मानदंडों से बचने की बात कह सकते हैं. हम सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर बढ़ती वैश्विक अनिश्चतताओं के प्रति विकासशील देशों की विशेष संवेदनशीलता को लेकर भी चिंता ज़ाहिर कर सकते हैं."

भारत की गुटनिरपेक्ष नीति है पुरानी

फ़रवरी 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, तब भी भारत का रुख़ तटस्थ था.

भारत ने अब तक खुलकर इस हमले के लिए रूस की निंदा नहीं की. जबकि वह समय-समय पर यूक्रेन में शांति बहाली और कूटनीतिक-बातचीत के ज़रिए समाधान खोजने की बात दोहराता रहा है. भारत के किसी एक गुट के साथ न दिखने की ये नीति हाल की नहीं है.

भारत की विदेश नीति में इस गुटनिरपेक्षता की बुनियाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही रखी थी. उसके बाद की जितनी सरकारें आईं सबने इस नीति का पालन अपने-अपने हिसाब से किया है.

हंगरी में सोवियत यूनियन के हस्तक्षेप के एक साल बाद 1957 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में बताया था कि भारत ने क्यों इस मामले में यूएसएसआर की निंदा नहीं की.

नेहरू ने कहा था, "दुनिया में साल दर साल और दिन ब दिन कई चीज़ें घटित होती रहती हैं, जिन्हें हम व्यापक रूप से नापसंद करते हैं. लेकिन हमने इनकी निंदा नहीं की है क्योंकि जब कोई समस्या का समाधान खोज रहा होता है तो उसमें निंदा से कोई मदद नहीं मिलती है."

द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा था कि नेहरू की यह नीति भारत को टकराव की स्थिति में राह दिखाती रही है. ख़ासकर तब जब टकराव भारत के साझेदारों के बीच होता है.

सोवियत यूनियन का चाहे 1956 में हंगरी में हस्तक्षेप हो या 1968 में चेकोस्लोवाकिया में या फिर 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में सब में भारत की लाइन कमोबेश यही रही है.

2003 में जब अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया तब भी भारत का रुख़ इसी तरह का था. स्टैनली जॉनी ने लिखा था कि यूक्रेन पर हमले में रूस की निंदा नहीं करना और संयुक्त राष्ट्र के निंदा प्रस्ताव में वोटिंग से बाहर रहना मौलिक रूप से भारत के तटस्थता वाले ऐतिहासिक रुख़ से अलग नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.