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इसराइल और हमास के बीच युद्धविराम समझौते का भारत पर क्या होगा असर
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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अमेरिका और मध्यस्थ क़तर ने कहा है कि इसराइल और हमास ग़ज़ा में चल रहे युद्ध को ख़त्म करने के लिए राजी हो गए हैं.
समझौते की शर्तों के मुताबिक़ हमास इसराइली बंधकों को छोड़ देगा. इसके बदले इसराइल भी फ़लस्तीनी कैदियों को रिहा कर देगा. पिछले सवा साल से चल रहे इसराइल हमास युद्ध को देखते हुए इसे एक अहम कामयाबी माना जा रहा है.
7 अक्टूबर 2023 को हमास के चरमपंथियों ने दक्षिणी इसराइल हमले किए थे. इसके बाद इसराइल ने ग़ज़ा में हमले शुरू कर दिए थे.
हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ इसराइली हमलों में अब तक 46,700 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें से अधिकतर नागरिक हैं.
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विश्लेषकों को मुताबिक़ इसराइल और हमास के बीच चल रहे युद्ध की वजह से न सिर्फ मध्यपूर्व में अस्थिरता फैली है बल्कि इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई है.
भारत भी इससे अछूता नहीं है. यही वजह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने ग़ज़ा में सीजफ़ायर और बंधकों की रिहाई के लिए हुए समझौते का स्वागत किया है.
भारत के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ''भारत को उम्मीद है कि इस समझौते से ग़ज़ा के लोगों तक बिना रुकावट के मानवीय मदद पहुंचती रहेगी. हम लगातार सभी बंधकों की रिहाई, युद्धविराम, बातचीत और कूटनीति के जरिये इस मामले को सुलझाने की वकालत करते रहे हैं.''
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के मुताबिक़ तीन चरणों में लागू होने वाले इस समझौते के तहत युद्धविराम, बंधकों की रिहाई और ग़ज़ा के पुनर्निर्माण से जुड़े कदम उठाए जाएंगे.
इसराइल और हमास के बीच समझौते से भारत को भी कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है.
इसराइल और हमास के बीच संघर्ष की वजह से अस्थिरता के दौर से गुजर रहे मध्यपूर्व से भारत के गहरे आर्थिक और सामरिक हित जुड़े हैं.
ऐसे में ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि इसराइल और हमास के बीच अब तक चले आ रहे युद्ध ने भारत के हितों को किस तरह प्रभावित किया है और अब युद्धविराम से उसे कहां-कहां राहत मिलेगी.
ऊर्जा सुरक्षा
भारत, अमेरिका और चीन के बाद कच्चे तेल का तीसरा बड़ा आयातक देश है. भारत अपनी तेल जरूरत का 85 फीसदी आयात से पूरा करता है.
यूक्रेन पर हमले के बाद भारत ने रूस से तेल का आयात काफी बढ़ा दिया था. लेकिन अभी भी इसके तेल आयात में मध्यपूर्व के देशों की बड़ी हिस्सेदारी है.
रूस से तेल खरीद में तेजी के बावजूद अप्रैल से सितंबर , 2023 के बीच भारत ने मध्यपूर्व और अफ्रीकी देशों से अपनी जरूरत का 44 फ़ीसदी तेल खरीदा था.
इसके एक साल पहले तक ये आंकड़ा 60 फ़ीसदी था.
साल 2024 के अप्रैल महीने में जब इसराइल ने ईरान पर हमला किया था तो कच्चे तेल के दाम में अचानक तेजी आ गई थी और ये 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था.
इसी तरह जब 13 जनवरी 2025 को अमेरिका के बाइडन प्रशासन ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाए तो भी तेल के दाम एक बार फिर बढ़ गए थे.
अगर मध्यपूर्व में अशांति बढ़ती है तो भारत का आयात बिल बढ़ता जाएगा. महंगा तेल भारत में उत्पादन लागत बढ़ाएगा. जाहिर है इससे महंगाई पर काबू करने की भारत की कोशिश को झटका लगेगा.
इसराइल और हमास के बीच संघर्ष विराम से निश्चित तौर पर मध्यपूर्व में स्थिरता आएगी और तेल आयात के मोर्चे पर भारत को राहत मिलेगी.
कच्चे तेल की ब्रेंट फ्यूचर्स कीमतों में हर दस डॉलर की बढ़ोतरी भारत के चालू खाते का घाटा आधा फ़ीसदी तक बढ़ा देती है. तेल की बढ़ी कीमतें भारत की तेल रिफाइनिंग कंपनियों की लागत भी बढ़ा देती हैं.
चूंकि रिफाइंड तेल (पेट्रोल) भारत की ओर से निर्यात किया जाने वाले प्रमुख आइटमों में से एक है, इसलिए कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी भारत का निर्यात महंगा कर सकता है.
इसलिए मध्यपूर्व में शांति से कच्चा तेल सस्ता होता है तो निश्चित तौर पर भारत राहत महसूस करेगा.
व्यापार के मोर्चे पर राहत
हमास और इसराइल के के बीच जंग के बाद हमास समर्थक हूती विद्रोहियों ने लाल सागर से होकर इसराइल जाने वाले जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया था.
हूती विद्रोहियों ने यहां रॉकेट और ड्रोन से कई व्यापारिक जहाज़ों को निशाना बनाया था.
यमन के समुद्री तटों और हिंद महासागर के पश्चिम भारतीय नाविकों की सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो गया था और भारतीय जहाजों से व्यापार में भी रुकावटों की आशंका जताई जा रही थी.
भारतीय नौसेना ने यहां समुद्री जहाजों को हमलों से बचाने के लिए कई अभियान छेड़े थे.
हूती विद्रोहियों के हमलों की वजह से इस मार्ग पर शिपिंग लागतें बढ़ा दी गई थीं. जाहिर है अगर इस समुद्री मार्ग पर शांति रहती है तो शिपिंग कंपनियों को राहत मिलेगी और समुद्री व्यापार की अड़चनें ख़त्म होगी.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स से जुड़े सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान ने इस पहलू को समझाते हुए कहा, ''लाल सागर यूरोप अफ्रीका और एशिया के बीच व्यापार का अहम समुद्री रास्ता है. अमेरिका, यूरोप और उत्तरी अफ्रीकी देशों की भारत की आयात-निर्यात में हिस्सेदारी 37 फीसदी से ज्यादा है. और ये व्यापार ज्याद़ातर लाल सागर और स्वेज नहर से होता है. इसलिए इस रूट पर शांति की अहमियत आप समझ सकते हैं.''
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मध्यपूर्व के देशों से कमाई
सरकार के अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक़ 1.34 करोड़ एनआरआई में से लगभग 90 लाख भारतीय खाड़ी देशों में रहते हैं जो हर साल करीब 50 से 55 लाख डॉलर की राशि भारत भेजते हैं.
साल 2020-21 में यूएई, सऊदी अरब, कुवैत और क़तर की भारत के बाहर से भेजी जाने वाली आय में 29 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.
इसके बाद अमेरिका का नंबर है, जहां रहने वाले भारतीयों की ओर से देश भेजी जाने वाली रकम में 23.4 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.
डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, ''अगर मध्यपूर्व में शांति रहती है तो वहां काम करने वाले भारतीयों की सुरक्षा को लेकर भारत निश्चित रह सकता है. अगर हमास और इसराइल का युद्ध इन क्षेत्रों में फैलता तो भारत को अपने कामगारों को यहां से निकालने में बड़ी रकम ख़र्च करनी पड़ती. ये भारत पर अतिरिक्त बोझ होता. ''
1990 के दशक में भारत को सुरक्षा कारणों की वजह से इराक और कुवैत से अपने एक लाख दस हजार नागरिकों को निकालने के लिए काफी बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी थी.
रक्षा क्षेत्र को फ़ायदा
युद्धविराम के समझौते के बाद इसराइल भारत के साथ रुके रक्षा सौदों पर ध्यान दे सकेगा.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक़ 2012 से 2022 तक इसराइल ने भारत को 2.9 अरब डॉलर के हथियारों का निर्यात किया है.
इस दौरान भारत इसराइली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बना रहा. 2017 में भारत ने इसराइल से 60 करोड़ डॉलर से अधिक के हथियार ख़रीदे थे.
2022 में भारत ने इसराइल से 24 करोड़ डॉलर से अधिक के हथियार खरीदे. इसराइल के रक्षा निर्यात का ये 30 फीसदी था.
इस दौरान इसराइल ने भारत को सेंसर, फायर कंट्रोल सिस्टम, मिसाइल (एयर डिफेंस सिस्टम) , यूएवी जैसे रक्षा उपकरण बेचे थे.
बराक एयर डिफेंस सिस्टम, हेरन और स्पाइस सिरीज के गाइडेड बम भी भारत ने खरीदे थे.
हालांकि इस बात के सूबूत नहीं है कि इसराइल और हमास के युद्ध की वजह से भारत और इसराइल के बीच रक्षा सहयोग धीमा पड़ा है. लेकिन युद्धविराम के बाद रक्षा सहयोग और रफ़्तार पकड़ेगा.
हाल के कुछ सालों में मध्यपूर्व के देशों की भारत में और भारत की मध्यपूर्व देशों में दिलचस्पी बढ़ी है.
दोनों ओर से आर्थिक सहयोग बढ़ा है. भारत और मध्यपूर्व के देशों में एक दूसरे के यहां निवेश भी बढ़ा है.
फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, '' युद्धविराम के बाद आई2यू2 यानी भारत, इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के बीच सहयोग और बढ़ेगा. इसके साथ इंडिया मिडिल ईस्ट कॉरिडोर का काम भी आगे बढ़ेगा.''
बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि युद्धविराम से इंडिया मिडिल ईस्ट कॉरिडोर अब वास्तविकता में बदल सकता है.
इंडिया मिडिल ईस्ट कॉरिडोर को चीन के वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव का जवाब माना जा रहा है.
इस समझौते पर भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, यूरोपियन यूनियन, फ्रांस, जर्मनी और इटली ने हस्ताक्षर किए हैं.
नई दिल्ली में इस पर हस्ताक्षर हुए थे. इसके जरिये यूरोप और एशिया के बीच रेल और शिपिंग नेटवर्क से यातायात और कम्यूनिकेशन लिंक स्थापित किए जाएंगे.
7 अक्टूबर 2023 को इसराइल पर हमास के हमले की वजह से इंडिया मिडिल ईस्ट कॉरिडोर का काम आगे नहीं बढ़ पाया है.
भारत की सॉफ्ट पावर
युद्धविराम का तीसरा चरण ग़ज़ा में पुर्नर्निर्माण है. इसमें भारत भी हिस्सेदार हो सकता है.
भारतीय कंपनियों को यहां काम मिल सकता है. इसराइल में पहले ही भारत के कामगार भेजे जा रहे हैं. सुरक्षा कारणों की वजह से यह रफ़्तार धीमी पड़ गई थी.
युद्धविराम के बाद ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय कामगार इसराइल जा सकेंगे.
जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के फ़ैकल्टी मेंबर डॉ. प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं,'' ग़ज़ा में मानवीय सहायता बढ़ाने के काम में भी अब तेजी आएगी. भारत इसमें अहम भूमिका निभाएगा और शांति कायम करने की कोशिश में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा. यह भारत की सॉफ्ट पावर की मिसाल होगी.''
प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं कि इसराइल और हमास के बीच युद्धविराम भारत के लिए सहूलियत भरा हो सकता है. हालांकि ये इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्धविराम किस तरह लागू होता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित