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वर्क फ़्रॉम होम से क्या कामकाज ठीक से चल रहा है? - दुनिया जहान
कोविड- 19 महामारी के दौरान दुनिया में करोड़ों लोगों ने दफ्तर का काम घर से करना शुरू किया था यानि कि वर्क फ्रॉम होम. उस समय यह एक सामान्य बात थी.
तीन साल बाद अब गूगल, मेटा और अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जेपी मॉर्गन चेज एंड कंपनी जैसी कई बड़ी कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम के मॉडल पर दोबारा सोचना शुरू कर दिया है.
ये कंपनियां अपने कर्मचारियों से पूरे सप्ताह या हफ्ते के कुछ दिन ऑफिस आकर काम करने के लिए कह रही हैं.
भारत में भी कई कंपनियां अपने कर्मचारियों से यही आग्रह कर रही हैं.
इस सप्ताह हम दुनिया जहान में जानेंगे कि क्या वर्क फ्रॉम होम से काम ठीक चल रहा है?
कोरोना में बदली धारणा
होजे मारिया बरेरो मैक्सिको की आयटैम यूनिवर्सिटी में फाइनेंस के सहायक प्रोफेसर हैं. उन्होंने डब्लूएफएच (वर्क फ्रॉम होम) रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया.
इसमें रिमोट वर्किंग या वर्क फ्रॉम होम के बारे में जानकारी जमा की जा रही है.
वो कहते हैं कि कोविड महामारी के दौरान लॉकडाउन की वजह से लोग घर से काम करने पर मजबूर हो गए थे.
उस स्थिति ने हमें प्रयोग करके देखने पर मजबूर किया कि ऑफिस के कई काम घर में बैठ कर किए जा सकते हैं.
वो कहते हैं, ''कोविड महामारी से पहले यह धारणा थी कि अगर आप घर में रह कर काम कर रहे हैं तो अपने मैनेजरों या बॉस की नज़र से दूर हैं. आप काम करने से बच रहे हैं. आप उतनी मेहनत और ईमानदारी से काम नहीं कर रहे हैं, जैसा कि आप ऑफिस में आकर करते हैं.''
''लेकिन महामारी के दौरान जब अधिकांश लोगों को घर से काम करने पर मजबूर होना पड़ा तो यह धारणा भी बदल गई.''
वर्क फ्रॉम होम पर शोध के दौरान अमेरिका में हज़ारों लोगों से उनके काम और उनके हालात को लेकर सवाल किए गए.
इस शोध में 34 देशों में वर्क फ्रॉम होम को लेकर सर्वे किया गया. इसके नतीजे बताते हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे अंग्रेज़ी बोलने वाले देशों में यूरोप के दूसरे विकसित देशों की तुलना में वर्क फ्रॉम होम का स्तर अधिक है.
यह स्तर एशिया और लातिन अमेरिकी देशों में कम है. इसकी वजह यह है कि कई एशियाई देशों ने कोविड महामारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया. इससे वहां लॉकडाउन का दौर लंबा नहीं चला. लोगों को घर से काम करने की आदत कम लगी.
अमेरिका में 60 फीसद लोग अपना काम घर से नहीं कर सकते. क्योंकि दुकानों या कारखानों में काम करने वाले लोगों के लिए यह संभव नहीं है.
उन्हें दुकान या कारखाने में जाकर ही काम करना पड़ता है. मगर कई लोग अपना कुछ काम ऑफिस जाकर करते हैं तो कुछ लोग घर से काम करते हैं. इसे काम का हाईब्रिड या मिला-जुला तरीका कहते हैं.
होजे बरेरो कहते हैं, ''अब हाईब्रिड वर्क मॉडल ही काम करने का प्रमुख तरीका है. लगभग 30 फीसद लोग हाईब्रिड मॉडल में ही काम करते हैं.''
''कुल कर्मचारियों का छोटा हिस्सा ही रिमोट वर्क यानि घर से काम करता है. खासतौर पर ऐसे व्यवसायों के लोग जिनका काम घर से भी हो सकता है. मिसाल के तौर पर आईटी सपोर्ट के कई कर्मचारी घर से काम कर रहे हैं.''
जिन लोगों ने होजे बरेरो के सर्वेक्षण में भाग लिया, उनमें से अधिकांश लोग घर बैठ कर काम करना चाहते हैं. इसके कई कारण हैं. एक तो यह कि घर से काम करने में ऑफिस आने-जाने का समय और खर्च बचता है. अधिक आरामदेह तरीके से काम किया जा सकता है.
कंपनियां इस बारे में उतनी सहज नहीं हैं, क्योंकि उन्हें संदेह है कि कर्मचारी घर से प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रहे हैं. मगर धीरे-धीरे उनका रुख बदला भी है.
होजे मारिया बरेरो कहते हैं कि आमतौर पर कर्मचारियों का कहना है कि वो घर में बैठ कर बेहतर तरीके से काम कर पाते हैं और काम भी ज़्यादा करते हैं.
मगर कंपनियों का कहना है कि अगर कर्मचारी ऑफिस आकर काम करें तो ज़्यादा काम हो पाएगा.
होजे बरेरो का मानना है कि कोविड महामारी ने कामकाज के तरीके का एक नया रास्ता दिखाया. इसके चलते घर बैठे काम करना कई जगहों पर सामान्य हो गया. मगर यह दुनिया में हर जगह लागू नहीं होता.
कैसे काम करते हैं जापान की कंपनियों के कर्मचारी
डॉक्टर साओरी सुगेनो सरे यूनिवर्सिटी में कार्पोरेट गवर्नेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की प्रोफेसर हैं. वो जापान में 20 साल बिता चुकी हैं और वहां काम भी कर चुकी हैं. वो कहती हैं कि जापान में वर्क फ्रॉम होम को वैसे नहीं अपनाया गया, जैसा कई अन्य विकसित देशों में अपनाया गया, क्योंकि जापान का कॉर्पोरेट कल्चर अन्य देशों से अलग है.
वो कहती हैं, ''जापान में लोग जहां काम करते हैं, उस टीम के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं. वहां कंपनियों में आम सहमति से फैसले किए जाते हैं. यह काम लोगों के आमने-सामने होने से आसान हो जाता है. इसलिए लोग ऑफिस जा कर काम करना पसंद करते हैं.''
साओरी सुगेनो कहती हैं कि जापान में कंपनियों में देर तक काम करना और काम खत्म होने के बाद अपनी टीम के कर्मचारियों और बॉस के साथ बाहर जाकर शराब पीना, घुलना मिलना जरूरी माना जाता है. यह जापान के कॉर्पोरेट कल्चर का हिस्सा है.
"यह भी एक वजह है कि वहां लोग ऑफिस जाकर काम करना चाहते हैं. यह सभी छोटी-बड़ी कंपनियों में दिखाई भी देता है. इसका असर कर्मचारियों के सामाजिक बर्ताव पर पड़ता है. लोग अपनी टीम का हिस्सा बने रहना चाहते हैं. इसलिए वो घर से काम करने की बजाय ऑफिस जाकर काम करना ज़्यादा पसंद करते हैं.''
जब कोरोना दुनियाभर में कहर बरपा रहा था तो भी जापान में घर में बैठ कर काम करने को ज़्यादा पसंद नहीं किया गया था.
साओरी सुगेनो कहती हैं , ''महामारी के दौरान दूसरे देशों की तरह जापान में लॉकडाउन को कड़ाई से लागू नहीं किया गया था. सरकार ने कुछ दिशा-निर्देश और सुझाव जारी किए थे. एक निर्देश यह था कि कंपनी के 70 फीसद कर्मचारी घर से काम करें. मगर ऐसा नहीं हुआ.''
''महामारी के दौरान टोक्यो में 50 फीसद से भी कम कर्मचारी घर से काम कर रहे थे. इससे पता चलता है कि जापानी लोग ऑफिस जाकर काम करना ज्यादा पसंद करते हैं.''
मई 2023 में जापान ने कोविड संबंधी आखिरी नियंत्रण भी हटा दिया. इसके बाद कामकाज वैसे ही शुरू हो गया जैसा महामारी से पहले होता था. इससे यह भी साफ हो गया कि अन्य देशों के मुकाबले जापान में वर्क फ्रॉम होम का प्रचलन बहुत कम है.
साओरी सुगेनो का मानना है कि हो सकता है नई पीढ़ी के कर्मचारियों का रवैया पिछली पीढ़ी से अलग हो. वो अपने मां-बाप की तरह ज़िंदगीभर एक ही कंपनी में काम करने की मंशा ना रखें और काम और निजी ज़िंदगी में संतुलन बनाने के लिए काम करने का हाईब्रिड मॉडल पसंद करें. मगर ऐसा होने में 15-20 साल लग सकते हैं.
वर्क फ्रॉम होम में जोखिम क्या है?
रोमन गिल सैगरडॉय लॉ फर्म में भागीदार हैं. वो श्रम कानून विशेषज्ञ भी हैं. उनकी कंपनी के वकील कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों को श्रमिकों के कांट्रेक्ट संबंधी कानूनी सलाह देते हैं. वो बताते हैं कि कई कंपनियों ने बाज़ार में बने रहने के लिए अपने कर्मचारियों को घर से काम करने को कह दिया है. लेकिन रिमोट वर्किंग यानि ऑफिस से बाहर रह कर काम करने को लेकर कई नियम और दिशा-निर्देश भी हैं.
इनका पालन करना ज़रूरी है. मिसाल के तौर पर ऑनलाइन काम करने वालों को एक निर्धारित समय के बाद कंप्यूटर बंद करके लॉग आउट करने का अधिकार है.
वर्क फ्रॉम होम का एक जोखिम यह भी है कि कई बार लोग तय समय से अधिक काम करते हैं और हमेशा ऑनलाइन के ज़रिए जुड़े रहते हैं. लेकिन अब उनके पास डिसकनेक्ट करने का अधिकार है. इसे फ्रांस, इटली, फिलीपींस और कनाडा जैसे देशों में अमल में लाया जा रहा है.
इसका मतलब यह हुआ कि काम का समय खत्म होने के बाद अगर कर्मचारी चाहे तो ऑनलाइन कनेक्शन बंद कर सकता है. वो कंपनी का फोन उठाने से भी मना कर सकता है. वो तय समय के बाद दिए गए काम को करने से भी मना कर सकता है. ऐसे में कंपनी उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती.
एक पेचीदा मसला यह भी है कि कई कंपनियां घर से काम करने वाले कर्मचारियों की तनख्वाह घटाने के बारे में भी सोच रही हैं.
रोमन गिल बताते हैं , ''यह बात तो शुरू हो गई है. अमेरिका के वित्तीय क्षेत्र में कई कंपनियों ने तनख्वाह घटा दी है. मिसाल के तौर पर अगर उनका कोई कर्मचारी साउथ कैरोलाइना में रहता है, जहां रहने का खर्च न्यूयॉर्क से कम है तो वो उसे न्यूयॉर्क शहर के खर्च के मुताबिक तनख्वाह नहीं देना चाहते हैं''
वर्क फ्रॉम होम से जुड़े कानूनों की कमी
सवाल यह है कि जो लोग घर से काम करते हैं, उनके घर का बिजली, एयरकंडीशनिंग और इंटरनेट का बिल भी तो बढ़ जाता है. उसके लिए कंपनियां क्या कर रही हैं?
रोमन गिल कहते हैं, ''इस बारे में कई नियम बने हुए हैं. यानि अगर घर से काम करने से बिजली या गैस बिल का बढ़ता है तो वह अतिरिक्त खर्च कंपनी उठाती है. काम करने के लिए आवश्यक कंप्यूटर, सही किस्म की कुर्सी, मेज, लाइटिंग और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों का खर्च भी कंपनियों को उठाना पड़ता है.
कर्मचारियों को किस पोजिशन में बैठ कर काम करना चाहिए और कब काम से ब्रेक लेकर चलना-फिरना चाहिए. कंपनी को यह ट्रेनिंग भी देनी पड़ती है.''
हालांकि अमेरिका और यूके में घर से काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या सबसे ज़्यादा है, मगर वर्क फ्रॉम होम संबंधी कानून अभी कम हैं.
रोमन गिल कहते हैं कि नीदरलैंड्स और स्पेन ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं. नीदरलैंड्स में एक कानून पर विचार हो रहा है. इसमें कोई कर्मचारी अपनी कंपनी से घर से काम करने की मांग कर सकता है.
कंपनी अगर उसे इजाज़त नहीं देती है तो वो अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता है. ऐसे में कंपनी को यह साबित करना होगा कि उस कर्मचारी के ऑफिस की जगह घर से काम करने से कंपनी को नुक़सान होगा. फिर जज उस पर अपना फैसला सुना सकते हैं.
वर्क फ्रॉम होम की चुनौतियां
कोविड महामारी के बाद भी कई लोग घर से काम कर रहे हैं और अपने सहयोगियों के साथ वीडियों कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक कर रहे हैं. व्लैड रिवकिन डब्लिन में ट्रिनीटी बिज़नेस स्कूल में ऑर्गनाइजेशनल बिहेवियर यानि संगठनात्मक व्यवहार के प्रोफेसर हैं.
वो कहते हैं कि कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ता है. शोध से यह पता चला है कि आमने-सामने बैठ कर मीटिंग की तुलना में वीडियो के ज़रिए मीटिंग से अधिक थकान होती है. कर्मचारियों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है
व्लैड रिवकिन कहते हैं कर्मचारियों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ेगा तो उनमें काम के प्रति लगाव खत्म होगा, अवसाद होगा, वो बीमार पड़ेंगे और छुट्टी पर चले जाएंगे. ऐसे में कंपनी को उनकी जगह दूसरों से काम लेना पड़ेगा जो महंगा साबित होता है.
वर्क फ्रॉम होम की एक समस्या यह भी है कि इससे कर्मचारियों के व्यावसायिक जीवन और निजी जीवन के बीच का फर्क धुंधला पड़ जाता है. ऑफिस में काम करने का एक फायदा यह होता है कि एक निश्चित समय पर काम खत्म होता है और लोग घर चले जाते हैं. घर से काम करते समय इस तरह काम को समेटना मुश्किल हो जाता है.
वर्क फ्रॉम होम के दौरान कैसे कपड़े पहनें?
व्लैड रिवकिन ने कहा कि इसका उपाय है. हमने अपनी रिसर्च में पाया कि अगर रिमोट वर्कर कुछ रूटीन अपनाएं तो मदद हो सकती है. मिसाल के तौर पर सुबह काम शुरू करने से पहले वैसे कपड़े पहनें जैसे ऑफिस के लिए पहनते हैं और शाम को घर के कपड़े पहन लें. घर के काम के लिए बाहर निकलें. हमने अपने शोध में पाया कि इससे व्यावसायिक जीवन और घरेलू जीवन के बीच सीमा तय करने में मदद मिलती है.
काम करने का हाईब्रिड मॉडल यानि हफ्ते के कुछ दिन घर से काम करना और बाकी दिन ऑफिस जाकर काम करना बेहतर पाया गया है. मगर ऑफिस की बजाय घर से काम करने से लोगों के करियर पर भी असर पड़ सकता है.
रिमोट कर्मचारियों को ग्लास सीलिंग का सामना करना पड़ सकता है. ग्लास सीलिंग का मतलब है, एक सीमा के बाद नौकरी में तरक्की बंद हो जाना.
व्लैड रिवकिन कहते हैं, ''महिला कर्मचारियों को अक्सर इस ग्लास सीलिंग का सामना करना पड़ता है. हो सकता है रिमोट कर्मचारियों को भी इस ग्लास सीलिंग का सामना करना पड़े. नौकरी में तरक्की और प्रमोशन के लिए अच्छे काम के साथ सहयोगियों और वरिष्ठों के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण होता है.''
''लोगों की नज़र के सामने रहना ज़रूरी होता है. इसलिए जो लोग ऑफिस से बाहर रहकर काम करते हैं उनकी तरक्की पर असर पड़ सकता है.''
तो क्या वर्क फ्रॉम होम से काम ठीक से हो रहा है? कई लोग जो घर से काम करते हैं उनका जवाब तो 'हां' है. लेकिन ऐसे लोग भी हैं जिनके पास तेज़ इंटरनेट कनेक्शन नहीं है या घर में जगह कम है और प्रायवेसी की कमी है, उनके लिए यह तनावपूर्ण है. इसका लोगों की नौकरी में तरक्की पर बुरा असर पड़ने का खतरा है.
अभी भी कई कंपनियों को संदेह है कि उनके कर्मचारी घर से ईमानदारी से काम नहीं करते. मगर इन समस्याओं का हल निकाल कर इस तरीके को सफल बनाने के लिए अभी काफी काम करना बाकी है और इसे नियंत्रित करने के लिए नए नियम-कानूनों की भी ज़रूरत है.
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